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फडणवीस सरकार का हाई कोर्ट में बड़ा दावा—‘शहरी माओवादी गतिविधियों का केंद्र’ बना महाराष्ट्र, इसी आधार पर विशेष सुरक्षा कानून का बचाव

पर्दाफाश न्यूज़: मुंबई :महाराष्ट्र में सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकार की असाधारण कानूनी शक्तियों को लेकर बहस अब सीधे बॉम्बे हाई कोर्ट के दरवाजे तक पहुंच चुकी है। महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा कानून यानी Maharashtra Special Public Security Act की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर राज्य सरकार ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए ऐसा दावा किया है, जिसने पूरे मामले को और अधिक गंभीर और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना दिया है।

देवेंद्र फडणवीस सरकार ने 6 अक्टूबर 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामे में दावा किया कि महाराष्ट्र में 64 सक्रिय माओवादी फ्रंटल संगठन मौजूद हैं और यह संख्या देश में सबसे अधिक है। सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य में शहरी माओवादी नेटवर्क की मौजूदगी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।

सरकार का तर्क है कि जब गैरकानूनी, विध्वंसक और चरमपंथी गतिविधियों के नेटवर्क शहरी क्षेत्रों तक पहुंचने की आशंका हो, तब उनसे निपटने के लिए सामान्य कानूनों के साथ-साथ एक विशेष कानूनी ढांचे की जरूरत पड़ सकती है।

लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—सुरक्षा के नाम पर सरकार को कितनी अतिरिक्त शक्ति दी जा सकती है और उस शक्ति की संवैधानिक सीमा कौन तय करेगा?

यही सवाल अब बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने है।


64 संगठनों का दावा, लेकिन अदालत में असली परीक्षा कानून की

राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में महाराष्ट्र को कथित तौर पर शहरी माओवादी गतिविधियों का केंद्र बताते हुए विशेष कानून का बचाव किया है। सरकार के मुताबिक केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों में महाराष्ट्र में 64 सक्रिय फ्रंटल संगठनों की मौजूदगी दर्ज है।

सरकार का कहना है कि यह संख्या देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक है। उसके मुताबिक, माओवादी गतिविधियों का स्वरूप केवल जंगलों और दूरदराज के इलाकों तक सीमित नहीं माना जा सकता, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी कथित नेटवर्क और फ्रंटल गतिविधियों की मौजूदगी से सुरक्षा संबंधी नई चुनौतियां पैदा हुई हैं।

हालांकि, अदालत के सामने केवल यह सवाल नहीं है कि सुरक्षा चुनौती कितनी बड़ी है। उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उस चुनौती से निपटने के लिए बनाया गया कानून संविधान की कसौटी पर कितना खरा उतरता है।

यानी सरकार के सुरक्षा संबंधी दावों और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े सवालों—दोनों की न्यायिक जांच होना इस मामले का केंद्रीय बिंदु है।


कानून पर सवाल क्यों?

महाराष्ट्र विशेष सार्वजनिक सुरक्षा कानून को कांग्रेस, CPI और अन्य याचिकाकर्ताओं ने बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से कानून के कुछ प्रावधानों पर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं। उनका आरोप है कि कानून सरकार को किसी संगठन को गैरकानूनी घोषित करने तथा उससे जुड़ी संपत्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने जैसी व्यापक शक्तियां देता है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि ऐसी शक्तियों के इस्तेमाल के लिए पर्याप्त सुरक्षा-प्रावधान और स्पष्ट सीमाएं नहीं हों, तो इनके दुरुपयोग की आशंका पैदा हो सकती है।

यहीं पर मामला सिर्फ ‘माओवादी गतिविधियों’ का नहीं रह जाता। मामला इस बड़े संवैधानिक सवाल में बदल जाता है कि राज्य की सुरक्षा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन आखिर कैसे कायम किया जाए।

सरकार का जवाब है कि कानून का उद्देश्य किसी वैध राजनीतिक विचार, असहमति या लोकतांत्रिक गतिविधि को दबाना नहीं, बल्कि गैरकानूनी, विध्वंसक और चरमपंथी गतिविधियों पर अंकुश लगाना है।

अर्थात सरकार कानून को सुरक्षा का औजार बता रही है, जबकि याचिकाकर्ता इसके कुछ प्रावधानों को अत्यधिक सरकारी अधिकारों के नजरिये से देख रहे हैं।


सरकार बोली—मौलिक अधिकारों और सुरक्षा के बीच संतुलन

फडणवीस सरकार ने हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि कानून को इस तरह तैयार किया गया है कि सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा के साथ-साथ मौलिक अधिकारों का भी ध्यान रखा जा सके।

सरकार का कहना है कि गैरकानूनी और विध्वंसक गतिविधियों से निपटने के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों के कारण महसूस हुई।

लेकिन अदालत में सरकार के इस तर्क की असली परीक्षा कानून के शब्दों और उसके व्यावहारिक इस्तेमाल पर होगी।

क्योंकि लोकतंत्र में किसी संगठन या गतिविधि को प्रतिबंधित करना केवल प्रशासनिक कार्रवाई का विषय नहीं है। इसके साथ नागरिक स्वतंत्रता, संगठन बनाने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा जैसे संवैधानिक प्रश्न भी जुड़े होते हैं।

इसीलिए यह मामला महाराष्ट्र की सीमाओं से आगे जाकर एक व्यापक बहस को जन्म दे सकता है—क्या सुरक्षा संबंधी खतरे के आधार पर राज्य सरकारों को अतिरिक्त शक्तियां देना संवैधानिक रूप से उचित है और यदि हां, तो उन शक्तियों पर प्रभावी नियंत्रण कैसे सुनिश्चित होगा?


15 हजार से ज्यादा आपत्तियों का भी सरकार ने दिया हवाला

सरकार ने अपने हलफनामे में कानून की प्रक्रिया को लेकर भी अपना बचाव किया है।

राज्य सरकार के मुताबिक कानून बनने से पहले संयुक्त समिति के सामने 15,000 से अधिक लिखित आपत्तियां और सुझाव आए थे। सरकार का कहना है कि इन आपत्तियों पर विचार किया गया और इसके बाद कानून के कुछ प्रावधानों में बदलाव भी किए गए।

सरकार का यह तर्क इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिकाकर्ताओं की संवैधानिक आपत्तियों के बीच राज्य यह बताने की कोशिश कर रहा है कि कानून बिना विचार-विमर्श के जल्दबाजी में नहीं बनाया गया।

हालांकि, केवल आपत्तियों पर विचार किए जाने से किसी कानून की संवैधानिक वैधता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती। अंततः अदालत को यह देखना होगा कि कानून के प्रावधान संविधान की मूल गारंटियों के अनुरूप हैं या नहीं और सरकार को दी गई शक्तियों की सीमाएं पर्याप्त रूप से स्पष्ट हैं या नहीं।


सरकार की याचिकाकर्ताओं से सीधी आपत्ति—‘प्रत्यक्ष नुकसान कहां है?’

राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में याचिकाओं को खारिज करने की मांग करते हुए एक और महत्वपूर्ण तर्क रखा है।

सरकार का कहना है कि याचिकाकर्ताओं ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि कानून के कारण उन्हें प्रत्यक्ष कानूनी नुकसान किस प्रकार हुआ है।

यह तर्क अदालत में मामले की प्रारंभिक स्वीकार्यता और याचिकाकर्ताओं की स्थिति के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन इसके साथ-साथ कानून की संवैधानिक वैधता का व्यापक प्रश्न भी अदालत के सामने मौजूद है।

यानी बहस केवल इस पर नहीं है कि किसी खास व्यक्ति या संगठन को तत्काल नुकसान हुआ या नहीं। सवाल यह भी है कि क्या कानून के विवादित प्रावधान स्वयं संविधान के अनुरूप हैं।


दिसंबर 2025 में राष्ट्रपति की मंजूरी, अब अदालत में संवैधानिक कसौटी

महाराष्ट्र विधानसभा से पारित होने के बाद इस कानून को दिसंबर 2025 में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी और इसके बाद यह अधिनियम बना।

अब इसके प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है।

यह स्थिति महाराष्ट्र सरकार के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अदालत का फैसला यह तय करने में प्रभाव डाल सकता है कि राज्य इस कानून के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किस सीमा और किस प्रक्रिया के तहत कर सकता है।

दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं के लिए यह चुनौती इसलिए अहम है क्योंकि वे यह सवाल उठा रहे हैं कि सुरक्षा के नाम पर राज्य को दी जाने वाली शक्तियां कहीं नागरिक स्वतंत्रताओं की सीमा को पार तो नहीं कर रहीं।


‘माओवादी फ्रंटल संगठन’ की परिभाषा और कार्रवाई—सबसे संवेदनशील सवाल

सरकार का 64 सक्रिय फ्रंटल संगठनों का दावा इस पूरे मामले का सबसे चर्चित हिस्सा बन गया है। लेकिन अदालत के सामने केवल संख्या पर्याप्त नहीं होगी। महत्वपूर्ण सवाल यह भी होगा कि इन संगठनों की पहचान किस प्रक्रिया के आधार पर की गई, उनके खिलाफ किस प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं और किसी संगठन को प्रतिबंधित करने से पहले कौन-कौन से कानूनी सुरक्षा उपाय लागू होंगे।

यही वह क्षेत्र है जहां सरकार की सुरक्षा संबंधी जरूरत और नागरिक अधिकारों के बीच सबसे कठिन संतुलन बनता है।

यदि किसी संगठन पर वास्तव में हिंसक या विध्वंसक गतिविधियों से जुड़े होने के विश्वसनीय प्रमाण हैं, तो राज्य के लिए कार्रवाई का अधिकार होना सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन यदि किसी संगठन की गतिविधियों, विचारधारा या संबद्धता को लेकर विवाद हो, तो उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए स्पष्ट प्रक्रिया और स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।

इसीलिए इस मामले की असली लड़ाई केवल ‘माओवादी बनाम सरकार’ की नहीं है। यह सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमा की लड़ाई है।


अब हाई कोर्ट तय करेगा—सुरक्षा की जरूरत बड़ी या अधिकारों की सीमा?

महाराष्ट्र सरकार ने अपने हलफनामे के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि वह इस कानून को वापस लेने या कमजोर करने के पक्ष में नहीं है। सरकार का दावा है कि राज्य में कथित शहरी माओवादी नेटवर्क की मौजूदगी विशेष कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता को सही ठहराती है।

दूसरी तरफ याचिकाकर्ता कानून के उन प्रावधानों को चुनौती दे रहे हैं जिन्हें वे अत्यधिक व्यापक और संभावित रूप से मनमाना मानते हैं।

इसलिए बॉम्बे हाई कोर्ट के सामने चुनौती दोहरी है।

एक तरफ राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था का प्रश्न है।

दूसरी तरफ संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों की सुरक्षा का प्रश्न है।

और लोकतांत्रिक व्यवस्था में दोनों में से किसी एक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


13 अक्टूबर पर टिकी निगाहें

इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को होने की संभावना है। फिलहाल अदालत ने इस संवैधानिक चुनौती पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।

इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि कानून संवैधानिक है या असंवैधानिक। सरकार के 64 संगठनों वाले दावे और शहरी माओवादी नेटवर्क से जुड़े उसके तर्क भी अदालत के समक्ष उसके पक्ष का हिस्सा हैं—अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं।

लेकिन इतना साफ है कि महाराष्ट्र में विशेष सार्वजनिक सुरक्षा कानून को लेकर अब बहस सिर्फ विधानसभा की राजनीति तक सीमित नहीं रही।

एक तरफ सरकार कह रही है—खतरा गंभीर है, इसलिए कानून जरूरी है।

दूसरी तरफ याचिकाकर्ताओं का सवाल है—खतरे से निपटने के नाम पर सरकार को कितनी शक्ति दी जा सकती है?

और अब निगाहें अदालत पर हैं।

क्योंकि असली फैसला केवल यह नहीं होगा कि महाराष्ट्र में 64 कथित माओवादी फ्रंटल संगठन सक्रिय हैं या नहीं।

असली सवाल यह होगा कि राष्ट्रीय और सार्वजनिक सुरक्षा की रक्षा करते हुए संविधान की सीमारेखा कहां खींची जाए—और उस रेखा को पार करने की इजाजत किसी भी सरकार को कितनी दी जा सकती है।

पर्दाफाश न्यूज़ की नजर अब 13 अक्टूबर की सुनवाई पर है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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