“टूटा गद्दा पहुंचा तो विक्रेता गायब, शिकायत की तो ऐप ने चैटबॉट के हवाले कर दिया! डिजिटल बाजार में कंपनियों की चमकदार मार्केटिंग के पीछे छिपी मनमानी का जवाब देने के लिए भारत में कानून मौजूद है। सवाल यह है कि जब ग्राहक को उसके अधिकार ही नहीं मालूम, तो कंपनियों की जवाबदेही तय कौन करेगा?
कल्पना कीजिए, आपने अपनी मेहनत की कमाई से ऑनलाइन एक महंगा गद्दा खरीदा। विज्ञापन में आराम का वादा था, तस्वीरों में शानदार गुणवत्ता दिखाई गई थी और भुगतान करते समय कंपनी की वेबसाइट पर ग्राहक को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया जा रहा था। लेकिन जैसे ही डिलीवरी हुई, गद्दा टूटा हुआ निकला। आपने तस्वीरें भेजीं, शिकायत दर्ज कराई, विक्रेता को संदेश भेजे और ग्राहक सेवा से संपर्क किया। कुछ दिन तक जवाब का इंतजार किया। फिर विक्रेता ने चुप्पी साध ली। कंपनी का ऐप आपको उसी चैटबॉट के पास भेजता रहा, जिसके पास हर सवाल का जवाब है, सिवाय आपकी समस्या का समाधान करने के।
कभी जवाब मिलता है कि आपकी शिकायत दर्ज कर ली गई है, कभी कहा जाता है कि संबंधित विभाग से संपर्क किया जाएगा और कभी आपको फिर से वही प्रक्रिया दोहराने की सलाह दी जाती है। यानी सामान खराब कंपनी का, पैसा आपका, परेशानी आपकी और जवाबदेही का पता पूछिए तो सामने एक मशीन खड़ी है।
आखिरकार ग्राहक थककर हार मान लेता है। वह सोचता है कि कुछ हजार रुपये का नुकसान हुआ है, अब कौन अदालतों के चक्कर लगाएगा। दोस्तों को कंपनी के बारे में बता देगा और आगे से वहां से खरीदारी नहीं करेगा।
यही वह जगह है जहां कंपनियों की असली जीत होती है। उन्हें ग्राहक का पैसा वापस न करने के साथ-साथ यह भरोसा भी मिल जाता है कि परेशान होकर ग्राहक खुद ही चुप हो जाएगा। लेकिन भारतीय कानून की किताब में इस कहानी का अंत इतना आसान नहीं है।
दरअसल, भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 मौजूद है। यह कानून उस दौर की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया, जिसमें बाजार सिर्फ दुकानों और शोरूम तक सीमित नहीं रहा। अब खरीदारी मोबाइल स्क्रीन पर होती है, भुगतान कुछ सेकंड में हो जाता है और सामान बेचने वाला व्यक्ति किसी दूसरे शहर या राज्य में बैठा होता है। ग्राहक और विक्रेता के बीच की दूरी डिजिटल तकनीक ने कम जरूर की है, लेकिन शिकायत के समय यही दूरी कई बार पहाड़ बन जाती है।
1986 के पुराने उपभोक्ता कानून की जगह 2019 का कानून इसी बदलती बाजार व्यवस्था को ध्यान में रखकर लाया गया। इसमें ई-कॉमर्स, अनुचित व्यापार व्यवहार, उत्पाद की जिम्मेदारी और उपभोक्ता शिकायतों के निपटारे के लिए कई अहम प्रावधान जोड़े गए।
ग्राहक को अपने ही शहर में इंसाफ मांगने का अधिकार
इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ग्राहक को शिकायत दर्ज कराने के लिए विक्रेता के शहर में जाकर माथापच्ची करने की मजबूरी नहीं है। उपभोक्ता अपने निवास या काम करने की जगह के अधिकार क्षेत्र वाले उपभोक्ता आयोग में शिकायत कर सकता है।
यानी नोएडा में बैठा व्यक्ति अगर किसी दूसरे राज्य की कंपनी से सामान खरीदता है और उसे खराब उत्पाद मिलता है, तो उसे केवल इस वजह से दूसरे राज्य की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी कि कंपनी का कार्यालय वहां है।
यह बदलाव कागज पर छोटा दिखाई दे सकता है, लेकिन आम आदमी के लिए इसकी अहमियत समझना मुश्किल नहीं है। एक तरफ बड़ी कंपनियों के पास कानूनी विभाग, वकीलों की टीम और शिकायतों को संभालने वाले कर्मचारी हैं। दूसरी तरफ एक आम ग्राहक है, जो अपनी नौकरी, परिवार और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के बीच कुछ हजार रुपये के नुकसान की भरपाई के लिए संघर्ष कर रहा है।
पुरानी व्यवस्था में दूरी भी एक तरह की सजा बन सकती थी। नए कानून ने कम से कम इस बहाने को कमजोर किया है।
कितने रुपये का विवाद, किस आयोग में होगी सुनवाई?
उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था में जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तीन तरह के आयोग हैं। लेकिन इनके अधिकार क्षेत्र को लेकर भी एक अहम तथ्य समझना जरूरी है।
वर्तमान में 2021 के संशोधित क्षेत्राधिकार नियमों के अनुसार, आयोग का स्तर सामान या सेवा के लिए चुकाई गई कीमत के आधार पर तय होता है, न कि केवल ग्राहक द्वारा मांगे गए मुआवजे के आधार पर।
जिला उपभोक्ता आयोग 50 लाख रुपये तक के भुगतान मूल्य वाले मामलों की सुनवाई कर सकता है। 50 लाख रुपये से अधिक और दो करोड़ रुपये तक के मामलों का अधिकार राज्य आयोग के पास है। दो करोड़ रुपये से अधिक के भुगतान मूल्य वाले मामले राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
इसका सीधा अर्थ है कि टूटे गद्दे, खराब मोबाइल, खराब इलेक्ट्रॉनिक सामान, गलत बिलिंग, सेवा में कमी या ऑनलाइन खरीदारी से जुड़े अधिकांश व्यक्तिगत विवाद जिला आयोग के दायरे में आ सकते हैं।
कंपनियों के लिए यह समझना जरूरी है कि ग्राहक की शिकायत छोटी रकम की हो सकती है, लेकिन इससे कंपनी की जवाबदेही छोटी नहीं हो जाती।
कंपनियों का अपना चैटबॉट अदालत नहीं है!
डिजिटल कंपनियों ने ग्राहक सेवा के नाम पर एक नया चलन विकसित कर लिया है। हर समस्या का समाधान ऐप में खोजिए, हर शिकायत चैटबॉट पर कीजिए और हर जवाब के लिए कुछ घंटे इंतजार कीजिए। लेकिन जब वही सिस्टम समस्या सुलझाने के बजाय ग्राहक को गोल-गोल घुमाने लगे, तब सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ग्राहक सेवा का मतलब सिर्फ ग्राहक को व्यस्त रखना रह गया है?
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए भी जवाबदेही तय की गई है। उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 के तहत संबंधित ई-कॉमर्स संस्थाओं को शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त करना होता है। शिकायत मिलने के 48 घंटे के भीतर उसकी प्राप्ति स्वीकार करने और एक महीने के भीतर उसका निपटारा करने का प्रावधान है।
इसलिए कोई कंपनी केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि विक्रेता अलग है या शिकायत किसी दूसरे विभाग को भेज दी गई है। ऑनलाइन बाजार में कौन किस भूमिका में जिम्मेदार है, यह संबंधित कारोबार के स्वरूप और कानून के प्रावधानों से तय होगा।
यहां एक और बात समझने की जरूरत है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और वास्तविक विक्रेता की कानूनी जिम्मेदारी हर मामले में एक जैसी नहीं होती। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि ग्राहक को शिकायत करने के लिए अंतहीन डिजिटल गलियारों में भटकाया जा सकता है।
केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण: कंपनियों की मनमानी पर निगरानी का नया पहरा
2019 के कानून की एक बड़ी उपलब्धि केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण यानी सीसीपीए की स्थापना है।
यह संस्था केवल किसी एक ग्राहक और कंपनी के बीच विवाद सुलझाने तक सीमित नहीं है। इसे व्यापक उपभोक्ता हितों की रक्षा के लिए बनाया गया है। खास बात यह है कि यह अपनी पहल पर भी अनुचित व्यापार प्रथाओं की जांच कर सकता है।
मान लीजिए, कोई कंपनी अपने उत्पाद को लेकर ऐसा विज्ञापन चलाती है जिसमें ऐसे दावे किए जाते हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। हजारों ग्राहक उस विज्ञापन पर भरोसा करके सामान खरीद लेते हैं। बाद में पता चलता है कि विज्ञापन में किए गए दावे भ्रामक थे।
अब हर ग्राहक को अलग-अलग शिकायत करने के लिए मजबूर होना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। सीसीपीए ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है। उसे अनुचित व्यापार व्यवहार रोकने, असुरक्षित वस्तुओं को वापस मंगाने, कीमत लौटाने और भ्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई करने जैसी शक्तियां दी गई हैं।
भ्रामक विज्ञापन के मामले में निर्धारित परिस्थितियों में निर्माता या विज्ञापनकर्ता पर 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। दोबारा उल्लंघन पर यह जुर्माना 50 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में विज्ञापन में शामिल सेलिब्रिटी या अन्य अनुमोदनकर्ता पर भी कार्रवाई संभव है।
यानी विज्ञापन में बड़े-बड़े दावे करना और शिकायत आने पर जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेना अब केवल मार्केटिंग की रणनीति नहीं रह सकता। इसके कानूनी परिणाम भी हो सकते हैं।
खराब सामान मिला तो सिर्फ रिफंड ही आखिरी रास्ता नहीं
इस कानून में उत्पाद दायित्व यानी प्रोडक्ट लायबिलिटी को भी स्पष्ट कानूनी मान्यता दी गई है।
इसका मतलब है कि अगर किसी उत्पाद की निर्माण संबंधी खामी, डिजाइन की खराबी, निर्धारित चेतावनी न देने या अन्य कानूनी रूप से मान्य कारणों से उपभोक्ता को नुकसान पहुंचता है, तो परिस्थितियों के अनुसार निर्माता, उत्पाद विक्रेता या सेवा प्रदाता को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। हर टूटा हुआ गद्दा अपने आप उत्पाद दायित्व का मामला नहीं बन जाता। यदि गद्दा खराब हालत में पहुंचा है, तो ग्राहक दोषपूर्ण सामान, अनुबंध के उल्लंघन या सेवा में कमी के आधार पर उचित राहत मांग सकता है। लेकिन अगर उत्पाद की खामी से शारीरिक चोट या अन्य ऐसा नुकसान हुआ है, जो कानून में उत्पाद दायित्व के तहत आता है, तो मामला और गंभीर हो सकता है।
यानी खराब सामान के मामले में केवल पैसे वापस मांगने का सवाल नहीं है। कानून के तहत उचित परिस्थितियों में मुआवजे और नुकसान की भरपाई का रास्ता भी खुला है।
अब शिकायत के लिए अदालत के दरवाजे पर लाइन लगाने की भी जरूरत नहीं
डिजिटल शिकायत व्यवस्था ने उपभोक्ताओं के लिए एक और रास्ता खोला है। पहले ई-दाखिल पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने की सुविधा शुरू हुई थी। अब 1 जनवरी 2025 से ई-जागृति प्लेटफॉर्म ने ई-दाखिल समेत पुरानी डिजिटल व्यवस्थाओं को एकीकृत कर दिया है।
इस प्लेटफॉर्म के जरिए उपभोक्ता शिकायत दर्ज कराने, मामले की स्थिति देखने और उपलब्ध सुविधाओं के अनुसार ऑनलाइन सुनवाई में हिस्सा लेने जैसे काम कर सकते हैं।
यानी ग्राहक को केवल इसलिए शिकायत छोड़ने की जरूरत नहीं कि उसके पास अदालत जाने के लिए समय नहीं है या विक्रेता किसी दूसरे शहर में बैठा है।
यह डिजिटल न्याय व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर देना और विवाद का तुरंत समाधान हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं। दस्तावेज, भुगतान का प्रमाण, शिकायत का रिकॉर्ड और मामले से जुड़े तथ्य फिर भी अहम रहेंगे।
ग्राहक करे तो क्या करे? चुप रहने से बेहतर है रिकॉर्ड बनाना
मान लीजिए वही टूटा हुआ गद्दा आपके घर पहुंचा है। सबसे पहले डिलीवरी के समय और सामान की हालत की तस्वीरें तथा वीडियो सुरक्षित रखें। ऑर्डर नंबर, भुगतान की रसीद, बिल, डिलीवरी की जानकारी और कंपनी के साथ हुई बातचीत का रिकॉर्ड संभालकर रखें।
इसके बाद कंपनी और विक्रेता को लिखित शिकायत भेजें। शिकायत में साफ बताएं कि उत्पाद में क्या खराबी है और आप क्या समाधान चाहते हैं। रिफंड, प्रतिस्थापन या उचित मुआवजे की मांग तथ्यों के अनुसार करें।
यदि कंपनी जवाब नहीं देती, तो राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। इसके लिए 1915 नंबर और आधिकारिक ऑनलाइन माध्यम उपलब्ध हैं।
समाधान न मिलने पर संबंधित उपभोक्ता आयोग में ई-जागृति के माध्यम से शिकायत दर्ज कराने का रास्ता भी खुला है। आम तौर पर उपभोक्ता शिकायत के लिए कारण उत्पन्न होने की तारीख से दो वर्ष की समय-सीमा लागू होती है, हालांकि कानून में उचित कारण होने पर देरी माफ करने का प्रावधान भी है।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे जरूरी चीज है सबूत। केवल यह कहना कि कंपनी ने खराब सामान दिया, पर्याप्त नहीं हो सकता। लेकिन तस्वीरें, बिल, भुगतान का रिकॉर्ड और शिकायतों का क्रम आपके मामले को मजबूत बना सकते हैं।
कानून बना, पोर्टल बना, फिर भी ग्राहक क्यों परेशान?
यहां असली सवाल सरकार और व्यवस्था दोनों से है। जब कानून मौजूद है, उपभोक्ता आयोग मौजूद हैं, शिकायत पोर्टल मौजूद है और कंपनियों के लिए नियम भी तय हैं, तो फिर आम ग्राहक को अपनी ही खरीदी हुई वस्तु के लिए इतनी मशक्कत क्यों करनी पड़ती है?
उपभोक्ता आयोगों में लंबित मामलों की समस्या, जागरूकता की कमी और शिकायतों के निपटारे में लगने वाला समय ऐसे सवाल हैं, जिनसे इनकार नहीं किया जा सकता।
कानून बनाना एक काम है और उसे जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू कराना बिल्कुल दूसरा। कंपनियों के पास ग्राहकों तक पहुंचने के लिए करोड़ों रुपये के विज्ञापन बजट हैं, लेकिन ग्राहक की शिकायत सुनने के लिए कई बार एक जिम्मेदार इंसान तक उपलब्ध नहीं होता।
यही डिजिटल बाजार का सबसे बड़ा विरोधाभास है। सामान बेचने के लिए तकनीक बेहद आधुनिक है, भुगतान लेने की व्यवस्था बिजली की रफ्तार से चलती है, लेकिन ग्राहक की शिकायत का समाधान आज भी कई बार पुराने सरकारी दफ्तरों जैसी सुस्ती का शिकार दिखाई देता है।
बाजार में कंपनियों को मुनाफा कमाने का पूरा अधिकार है। उन्हें अपने कारोबार का विस्तार करने और नए ग्राहक जोड़ने की आजादी भी है। लेकिन इस आजादी का मतलब यह नहीं कि ग्राहक को पैसा लेने के बाद उसकी समस्या के साथ अकेला छोड़ दिया जाए।
उपभोक्ता संरक्षण कानून का असली मकसद केवल खराब सामान पर रिफंड दिलाना नहीं, बल्कि बाजार में जवाबदेही की ऐसी संस्कृति विकसित करना है जिसमें ग्राहक की आवाज को गंभीरता से सुना जाए।















