“रामपुर से रिहाई, गेट पर गिरफ्तारी और अगले ही दिन गाजियाबाद की अदालत में पेशी… आजम खान के लिए जेल से बाहर आने का रास्ता खुला, लेकिन आजादी की दहलीज पर एक नया कानूनी मोर्चा उनका इंतजार कर रहा था। 494.46 करोड़ रुपये के निर्माण मूल्यांकन, 416.14 करोड़ रुपये के कथित बेहिसाब खर्च और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े सवालों ने यूपी की सियासत में फिर हलचल बढ़ा दी है। आजम का सवाल है- अब क्या बोलें? लेकिन असली सवाल यह है कि इस पूरे मामले में अब अदालत क्या कहेगी?”
गाजियाबाद/रामपुर, 1 नवंबर 2026।
राजनीति में कभी-कभी घटनाएं इतनी तेजी से करवट लेती हैं कि जश्न की तैयारी करने वालों को भी समझ नहीं आता कि आखिर हुआ क्या है। रामपुर की जिला जेल के बाहर शनिवार शाम कुछ ऐसा ही दृश्य दिखाई दिया। महीनों से जेल में बंद समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खान की रिहाई की खबर से समर्थकों में उत्साह था। जेल के बाहर भीड़ जुटी थी, नारों की आवाजें थीं और समर्थकों को उम्मीद थी कि उनका नेता अब उनके बीच लौटेगा।
लेकिन कहानी में एक ऐसा मोड़ आया, जिसकी पटकथा जेल के बाहर जुटे समर्थकों ने शायद नहीं सोची थी। आजम खान जेल से बाहर निकले, मगर आजादी की सांस लेने का मौका भी पूरी तरह नहीं मिला था कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। उनके साथ जेल से बाहर आए बेटे अब्दुल्ला आजम घर चले गए, जबकि पिता को एक नए मामले में हिरासत का सामना करना पड़ा।
यानी एक मामले में जमानत मिली तो दूसरे मामले की कार्रवाई दरवाजे पर खड़ी मिली। कानून की प्रक्रिया का यह घटनाक्रम अपने आप में राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बन गया है।
रिहाई के दरवाजे पर गिरफ्तारी का नया अध्याय
आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को दो पैन कार्ड से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से 29 अक्टूबर को राहत मिली थी। अदालत ने उनकी सजा निलंबित करते हुए जमानत मंजूर की थी। इसके बाद शनिवार, 31 अक्टूबर को दोनों की रामपुर जेल से रिहाई हुई।
लेकिन ईडी की टीम इस घटनाक्रम से पहले ही जेल परिसर पहुंच चुकी थी। आजम खान के बाहर आते ही एजेंसी ने उन्हें मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार कर लिया।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। पैन कार्ड का मामला और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़ी ईडी की जांच दो अलग-अलग कानूनी मामले हैं। पहले मामले में मिली जमानत का अर्थ दूसरे मामले में गिरफ्तारी से स्वतः सुरक्षा मिलना नहीं था।
यही वजह है कि जिस रिहाई को समर्थक राहत का क्षण मान रहे थे, वह कुछ ही देर में एक नए कानूनी घटनाक्रम में बदल गई।
रविवार को गाजियाबाद की अदालत में पेशी
शनिवार को रामपुर से हिरासत में लिए जाने के बाद रविवार को ईडी की टीम आजम खान को गाजियाबाद स्थित विशेष पीएमएलए अदालत लेकर पहुंची। अदालत में उनकी पेशी हुई। इस दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे।
पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि क्या वह आज कुछ कहना चाहेंगे, तो आजम खान का जवाब था, ‘क्या बोलें, अब क्या बचा है बोलने के लिए।’
यह छोटा-सा वाक्य उनके मौजूदा कानूनी संघर्ष और सार्वजनिक प्रतिक्रिया के बीच चर्चा का केंद्र बन गया। हालांकि इस बयान को उनकी ओर से व्यक्त की गई प्रतिक्रिया के रूप में ही देखा जाना चाहिए, किसी कानूनी निष्कर्ष के रूप में नहीं।
अब इस मामले का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव ईडी की जांच और अदालत के सामने रखे जाने वाले साक्ष्य हैं। एजेंसी की ओर से पूछताछ और हिरासत में लेकर जांच आगे बढ़ाने की मांग इस कार्रवाई का अहम हिस्सा है।
494 करोड़ की कहानी में असली सवाल 416 करोड़ का
इस पूरे प्रकरण के केंद्र में है मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और उसके अंतर्गत संचालित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी।
ईडी की जांच में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, आयकर विभाग की मूल्यांकन रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी परिसर की इमारतों का निर्माण मूल्य लगभग 494.46 करोड़ रुपये आंका गया। दूसरी ओर, वित्त वर्ष 2013-14 से 2024-25 तक ट्रस्ट की आयकर विवरणियों में पूंजीगत व्यय लगभग 78.32 करोड़ रुपये घोषित किया गया।
दोनों आंकड़ों के बीच अंतर करीब 416.14 करोड़ रुपये का बताया गया है।
यहीं से जांच का सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है- आखिर इतनी बड़ी राशि का अंतर कैसे पैदा हुआ? यूनिवर्सिटी के निर्माण में पैसा कहां से आया? किन स्रोतों से भुगतान हुआ? क्या निर्माण कार्य में शामिल ठेकेदारों और ट्रस्ट के बीच हुए वित्तीय लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है? और यदि रिकॉर्ड में अंतर है, तो उसके पीछे वास्तविक वजह क्या है?
ईडी की जांच का उद्देश्य कथित अपराध से प्राप्त धन के स्रोत, उसके हस्तांतरण और उसके इस्तेमाल का पता लगाना है। एजेंसी का आरोप है कि सरकारी ठेकों से जुड़े कुछ वित्तीय लेन-देन के जरिए धन ट्रस्ट और यूनिवर्सिटी तक पहुंचाया गया हो सकता है।
हालांकि, 494.46 करोड़ रुपये का मूल्यांकन अपने आप में 494 करोड़ रुपये के गबन का प्रमाण नहीं है। इसी तरह 416.14 करोड़ रुपये का अंतर जांच का विषय है, अदालत द्वारा स्थापित अपराध नहीं। इन सवालों का अंतिम जवाब जांच, दस्तावेजों और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा।
जौहर यूनिवर्सिटी: शिक्षा का सपना या वित्तीय जांच का केंद्र?
आजम खान की राजनीतिक पहचान में जौहर यूनिवर्सिटी का विशेष स्थान रहा है। रामपुर में स्थापित इस विश्वविद्यालय को उन्होंने शिक्षा और सामाजिक विकास की अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया था।
यूनिवर्सिटी के निर्माण को लेकर आजम खान पहले भी राजनीतिक विरोध और विवादों के केंद्र में रहे हैं। जमीन, सरकारी संसाधनों, ट्रस्ट की गतिविधियों और निर्माण संबंधी मामलों को लेकर उन पर कई आरोप लगते रहे हैं।
अब ईडी की मनी लॉन्ड्रिंग जांच ने उसी परियोजना को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।
सवाल केवल एक विश्वविद्यालय की इमारतों की कीमत और खर्च के दस्तावेजों तक सीमित नहीं है। जांच का दायरा यह भी देख रहा है कि कथित तौर पर सरकारी ठेकों से जुड़े धन का प्रवाह किस तरह हुआ और क्या उसका इस्तेमाल ट्रस्ट अथवा विश्वविद्यालय की संपत्तियों के निर्माण में किया गया।
आजम खान और उनसे जुड़े पक्षों के लिए यह आरोपों का सामना करने और अपना पक्ष दस्तावेजों के साथ रखने का मामला है। वहीं जांच एजेंसी के लिए चुनौती आरोपों को साक्ष्यों के आधार पर स्थापित करने की है।
‘मुसलमान होने की सजा है’ – आजम ने फिर उठाया पहचान का सवाल
रामपुर जेल से बाहर निकलने के बाद आजम खान ने अपनी गिरफ्तारी को लेकर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि अब कहने के लिए क्या बचा है। उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उन्हें मुसलमान होने की सजा मिल रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि उनका अपराध केवल इतना है कि एक मुसलमान ने विश्वविद्यालय बनाया और बच्चों के लिए स्कूल स्थापित किए।
यह बयान इस पूरे प्रकरण को एक नए राजनीतिक विमर्श में ले जाता है। एक तरफ ईडी की जांच वित्तीय अनियमितताओं और कथित मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों पर केंद्रित है, तो दूसरी तरफ आजम खान इसे अपनी धार्मिक पहचान और शैक्षणिक संस्थान से जोड़कर देख रहे हैं।
दोनों पक्षों के बीच यही बुनियादी अंतर इस मामले को राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाता है।
लेकिन यहां भी दो प्रश्न अलग-अलग रखना जरूरी है। क्या वित्तीय लेन-देन में अनियमितताएं हुईं? इसका जवाब जांच और अदालत को देना है। क्या कार्रवाई के पीछे राजनीतिक या धार्मिक पूर्वाग्रह है? यह आजम खान का आरोप है, जिसे स्वतंत्र साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।















