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#सुपरटेक इकोविलेज-1 AOA चुनाव पर हाईकोर्ट की सख्ती, घोषणा-पत्र की त्रुटि सुधारे बिना प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर आपत्ति

“15 अक्टूबर के आदेश में त्रुटिपूर्ण डीड ऑफ डिक्लेरेशन का मुद्दा अहम; 16 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे फिर सुनवाई, चुनाव अधिकारी से प्रक्रिया आगे न बढ़ाने की अपेक्षा”

ग्रेटर नोएडा वेस्ट। सुपरटेक इकोविलेज-1 में अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) के प्रस्तावित चुनाव को लेकर विवाद अब इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचने के बाद निर्णायक कानूनी मोड़ पर आ गया है। मामला केवल चुनाव कराने या न कराने का नहीं, बल्कि चुनाव में मतदान के अधिकारों का आधार बनने वाले डीड ऑफ डिक्लेरेशन (घोषणा-पत्र) की कथित त्रुटि और उसे सुधारे बिना चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाने के औचित्य से जुड़ा है। हाईकोर्ट में 15 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के बाद अब सभी की निगाहें 16 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका संख्या 40951/2026 पर सुनवाई के दौरान घोषणा-पत्र की त्रुटि का मुद्दा प्रमुखता से उठा। अदालत के 15 अक्टूबर 2026 के आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ताओं की ओर से यह पक्ष रखा गया कि प्रतिवादी संख्या 2 की ओर से भी घोषणा-पत्र के त्रुटिपूर्ण होने की बात स्वीकार किए जाने का उल्लेख है। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने अपने तर्क के समर्थन में हाईकोर्ट के पूर्व निर्णय राजीव पुरी एवं तीन अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं चार अन्य, रिट-सी संख्या 194494/2022, का भी हवाला दिया।

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से उपस्थित स्टैंडिंग काउंसिल ने अदालत को बताया कि वह अगले दिन तक यह जानकारी प्राप्त कर सकेंगे कि घोषणा-पत्र में बताई गई त्रुटि का सुधार हुआ है या नहीं। इस पर अदालत ने मामले को 16 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2 बजे दोबारा सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया, ताकि याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता आवश्यक निर्देश प्राप्त कर सकें।

आदेश के छठे पैराग्राफ में अदालत ने स्पष्ट अपेक्षा व्यक्त की कि चुनाव अधिकारी घोषणा-पत्र की त्रुटि सुधारे बिना चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाएंगे। यह टिप्पणी मामले की गंभीरता को रेखांकित करती है। हालांकि, उपलब्ध आदेश के संबंधित पृष्ठ में चुनाव पर स्पष्ट अंतरिम रोक लगाने अथवा चुनाव रद्द करने का निर्देश दर्ज नहीं है। इसलिए इस घटनाक्रम को अदालत की ओर से चुनाव रद्द किए जाने के बजाय, घोषणा-पत्र की त्रुटि और चुनाव प्रक्रिया के संबंध में न्यायिक हस्तक्षेप तथा अगली सुनवाई में अपेक्षित स्पष्टीकरण के रूप में देखना अधिक सटीक होगा।

विवाद की जड़: छोटे-बड़े फ्लैटों के लिए समान वोटिंग प्रतिशत

सुपरटेक इकोविलेज-1 में चुनाव को लेकर विवाद का मूल कारण डीड ऑफ डिक्लेरेशन में दर्ज मतदान हिस्सेदारी है। याचिकाकर्ता निवासियों के अनुसार, सोसाइटी के छोटे और बड़े फ्लैटों के लिए समान वोटिंग प्रतिशत दर्शाया गया है, जबकि मतदान हिस्सेदारी निर्धारित करने में फ्लैट के आकार के अनुपात को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

निवासियों की आपत्ति है कि जब फ्लैटों का आकार अलग-अलग है, तो मतदान हिस्सेदारी तय करने के लिए लागू कानून और घोषणा-पत्र में निर्धारित वैध मानकों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उनके अनुसार, यदि दस्तावेज में दर्ज मतदान प्रतिशत लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं है, तो पहले उसे दुरुस्त किया जाना चाहिए और उसके बाद ही चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए।

इस विवाद का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि AOA केवल पदाधिकारियों के चयन का माध्यम नहीं है। इसके जरिए सोसाइटी के सामूहिक हितों, रखरखाव, साझा सुविधाओं और निवासियों से जुड़े अनेक प्रशासनिक विषयों पर निर्णय लिए जाते हैं। ऐसे में मतदान के अधिकारों को लेकर किसी भी प्रकार की अस्पष्टता भविष्य में चुनाव की वैधता और एसोसिएशन के निर्णयों पर सवाल खड़े कर सकती है।

हालांकि, फ्लैट के आकार और मतदान हिस्सेदारी के बीच कानूनी संबंध का अंतिम निर्धारण संबंधित घोषणा-पत्र, लागू कानून, नियमों और न्यायिक निर्णयों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। निवासियों की ओर से उठाई गई आपत्ति और अदालत में प्रस्तुत तर्कों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

अगस्त 2025 में शुरू हुई चुनाव प्रक्रिया, फिर उठे सवाल

उपलब्ध घटनाक्रम के मुताबिक, सुपरटेक इकोविलेज-1 में AOA चुनाव कराने के लिए गाजियाबाद के डिप्टी रजिस्ट्रार ने अगस्त 2025 में आदेश जारी किया था। इसके बाद चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई। इसी दौरान कुछ निवासियों ने डिप्टी रजिस्ट्रार और नामित निर्वाचन अधिकारी के सामने मतदान प्रतिशत को लेकर आपत्ति दर्ज कराई।

निवासियों का कहना था कि चुनाव कराने से पहले डीड ऑफ डिक्लेरेशन में दर्ज मतदान हिस्सेदारी की समीक्षा की जाए और जरूरत पड़ने पर उसे लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप संशोधित कराया जाए। उनका आरोप है कि इस मांग के बावजूद चुनाव प्रक्रिया को मौजूदा दस्तावेज के आधार पर आगे बढ़ाने की बात कही गई।

निवासियों के अनुसार, संबंधित अधिकारियों ने यह कहते हुए सुधार की जिम्मेदारी लेने से इनकार किया कि घोषणा-पत्र में संशोधन कराना उनके कार्यक्षेत्र का हिस्सा नहीं है। इसके बाद विवाद ने न्यायिक रूप ले लिया और याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अब 15 अक्टूबर के आदेश के बाद घोषणा-पत्र की त्रुटि और उसके सुधार की स्थिति मामले के केंद्र में आ गई है। राज्य की ओर से अदालत को अगले दिन जानकारी उपलब्ध कराने की बात कहे जाने के कारण 16 अक्टूबर की सुनवाई विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गई है। अदालत के सामने यह स्पष्ट होना है कि संबंधित दस्तावेज में सुधार हुआ है या नहीं और चुनाव प्रक्रिया को लेकर आगे क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

‘चुनाव का विरोध नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया की मांग’

याचिकाकर्ता निवासियों का कहना है कि उनकी आपत्ति चुनाव कराने के विचार से नहीं, बल्कि चुनाव की वैधता और निष्पक्षता से जुड़ी है। वे चाहते हैं कि AOA का गठन हो, लेकिन मतदान के अधिकारों का निर्धारण लागू कानून और वैध दस्तावेजों के अनुसार किया जाए।

उनकी दलील है कि यदि घोषणा-पत्र में त्रुटि है और उसी के आधार पर चुनाव कराया जाता है, तो भविष्य में चुनाव परिणाम को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकता है। ऐसी स्थिति में न केवल सोसाइटी के निवासियों का समय और संसाधन खर्च होंगे, बल्कि नवगठित एसोसिएशन के कामकाज पर भी कानूनी अनिश्चितता का असर पड़ सकता है।

दूसरी ओर, चुनाव प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना भी सोसाइटी के प्रशासनिक हित में नहीं होगा। इसलिए जरूरी है कि संबंधित प्राधिकारी दस्तावेज की स्थिति स्पष्ट करें, लागू नियमों के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करें और चुनाव की वैधता को लेकर बनी अनिश्चितता दूर करें।

यही वह बिंदु है जहां अदालत की टिप्पणी महत्वपूर्ण हो जाती है। घोषणा-पत्र में त्रुटि सुधारने से पहले चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाने की अपेक्षा ने संबंधित अधिकारियों के सामने दस्तावेज की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत को रेखांकित किया है। हालांकि, इस टिप्पणी को स्पष्ट अंतरिम स्थगनादेश या चुनाव रद्द करने के आदेश के रूप में प्रस्तुत करना उपलब्ध आदेश के आधार पर उचित नहीं होगा।

पूर्व न्यायिक फैसले का हवाला, कानूनी आधार पर जोर

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से राजीव पुरी एवं तीन अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं चार अन्य मामले का हवाला दिया जाना भी महत्वपूर्ण है। यह संदर्भ इस बात को दर्शाता है कि याचिकाकर्ता अपने पक्ष को पूर्व न्यायिक निर्णय के कानूनी सिद्धांतों के आधार पर स्थापित करना चाहते हैं।

हालांकि, इस पूर्व निर्णय में निर्धारित सिद्धांतों की इस मामले पर सटीक प्रयोज्यता का निष्कर्ष उसके पूर्ण पाठ, वर्तमान मामले के तथ्यों और संबंधित वैधानिक प्रावधानों के परीक्षण के बाद ही निकाला जा सकता है। केवल किसी फैसले का हवाला दिया जाना यह साबित नहीं करता कि वर्तमान विवाद में अदालत ने उसी आधार पर अंतिम निर्णय दे दिया है।

फिलहाल हाईकोर्ट के समक्ष तत्काल महत्वपूर्ण प्रश्न घोषणा-पत्र की त्रुटि के सुधार की स्थिति और चुनाव प्रक्रिया को लेकर संबंधित पक्षों से आवश्यक जानकारी प्राप्त करना है। इसी कारण अगली सुनवाई में राज्य की ओर से मिलने वाली जानकारी और याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता को प्राप्त होने वाले निर्देशों पर विशेष नजर रहेगी।

16 अक्टूबर की सुनवाई पर टिकी निगाहें

15 अक्टूबर 2026 के आदेश के बाद अब 16 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण हो गई है। राज्य की ओर से यह जानकारी सामने आनी है कि घोषणा-पत्र की त्रुटि सुधारी गई है या नहीं। इसके बाद अदालत मामले में आगे की कार्रवाई के संबंध में उचित निर्देश दे सकती है।

सुपरटेक इकोविलेज-1 के निवासियों के लिए यह विवाद मतदान के अधिकारों की स्पष्टता और AOA चुनाव की प्रक्रिया से जुड़ा है। वहीं संबंधित अधिकारियों के सामने दस्तावेज की स्थिति और चुनाव प्रक्रिया के संबंध में कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की चुनौती है।

फिलहाल कानूनी स्थिति यही है कि हाईकोर्ट ने घोषणा-पत्र में त्रुटि सुधारने से पहले चुनाव प्रक्रिया आगे न बढ़ाने की अपेक्षा व्यक्त की है और मामले को अगले दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। उपलब्ध आदेश के संबंधित पृष्ठ में चुनाव पर स्पष्ट अंतरिम रोक या चुनाव रद्द करने का निर्देश दर्ज नहीं है। इसलिए आगे की स्थिति का निर्धारण 16 अक्टूबर की सुनवाई, संबंधित दस्तावेजों और अदालत के अगले आदेश से होगा।

इस पूरे प्रकरण का केंद्रीय सवाल अब भी वही है—क्या मतदान हिस्सेदारी से जुड़े विवादित दस्तावेज की स्थिति स्पष्ट किए बिना चुनाव को कानूनी रूप से टिकाऊ बनाया जा सकता है? इस सवाल का जवाब संबंधित प्राधिकारियों की जानकारी और हाईकोर्ट की आगे की कार्यवाही से सामने आएगा।

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VIKAS TRIPATHI
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