“जिस फाइल पर सालों तक धूल जमती रही, वह अब फिर खुलने जा रही है। कभी सड़क के बिलों का भुगतान, कभी दो करोड़ रुपये की कथित रिश्वत और कभी एक विदेशी परियोजना अधिकारी की आत्महत्या—अब इन सबके बीच खड़े हैं देश के मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। केरल सरकार ने उनके पुराने कार्यकाल से जुड़े आरोपों की जांच के लिए मंजूरी दे दी है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि आरोप सही हैं या गलत, बल्कि यह भी है कि आखिर सरकारी फाइलों को अपनी मंजिल तक पहुंचने में इतना वक्त क्यों लगता है?”
तिरुवनंतपुरम। सरकारी दफ्तरों में फाइलें अक्सर इतनी लंबी यात्रा करती हैं कि उनके भीतर दर्ज सवालों की उम्र ही बदल जाती है। कभी एक मेज से दूसरी मेज, कभी कानूनी राय के इंतजार में, कभी किसी अधिकारी के हस्ताक्षर की प्रतीक्षा में और कभी उस व्यवस्था की खामोशी में, जहां जवाबदेही का रास्ता कागजों के ढेर के नीचे दब जाता है। लेकिन केरल में अब एक ऐसी ही पुरानी फाइल ने फिर से करवट ली है, जिसके केंद्र में देश के मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं।
केरल सरकार ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उनके पुराने प्रशासनिक कार्यकाल से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच का रास्ता खोल दिया है। राज्य के मंत्री रमेश चेन्निथला ने बताया कि उन्होंने राज्य के सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (VACB) को जांच की अनुमति दे दी है। मामला उस समय का है, जब ज्ञानेश कुमार केरल में लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव थे।
राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज होना स्वाभाविक है। एक तरफ देश के चुनावी तंत्र के शीर्ष पद पर बैठे अधिकारी का नाम है, दूसरी तरफ एक पुरानी सड़क परियोजना, कथित रिश्वत की मांग और एक ऐसी शिकायत, जिसकी कहानी वर्षों बाद फिर सरकारी जांच के दरवाजे तक पहुंची है।
लेकिन यहां एक बात साफ रहनी चाहिए—जांच की अनुमति मिलना आरोपों के साबित होने के बराबर नहीं है। यह उस प्रक्रिया की शुरुआत है, जिसमें शिकायतों, दस्तावेजों और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर यह पता लगाया जाना है कि आरोपों में कितना दम है।
दो करोड़ रुपये का आरोप और सड़क के बिलों की कहानी
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर हिस्सा दो करोड़ रुपये की कथित रिश्वत की मांग है।
मंत्री रमेश चेन्निथला के मुताबिक, ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दो शिकायतें प्राप्त हुई हैं। इनमें एक एमवी अनूप गोपाल और दूसरी सज्जन कुमार की ओर से दाखिल की गई है। सज्जन कुमार ने आरोप लगाया है कि जब ज्ञानेश कुमार केरल में PWD सचिव थे, तब उन्होंने सड़क परियोजना से जुड़े भुगतान जारी करने के बदले दो करोड़ रुपये की मांग की थी।
यह आरोप PATI-BEL नाम के कंसोर्टियम से जुड़ा है। इस कंसोर्टियम में मलेशिया और केरल की दो कंपनियां शामिल थीं। परियोजना के तहत तिरुवनंतपुरम से अंगमाली तक मेन सेंट्रल रोड का निर्माण किया जा रहा था। इस सड़क परियोजना को एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) से वित्तीय सहायता मिल रही थी।
सड़क निर्माण का काम केवल डामर, पत्थर और मशीनों की कहानी नहीं होता। इसके पीछे ठेके, भुगतान, सरकारी मंजूरियां और करोड़ों रुपये की वित्तीय जिम्मेदारियां भी होती हैं। जब किसी परियोजना का भुगतान रुकता है, तो उसका असर केवल ठेकेदार की जेब तक सीमित नहीं रहता। मजदूरों की मजदूरी, कंपनी की आर्थिक स्थिति और परियोजना की गति भी प्रभावित हो सकती है।
शिकायतकर्ता सज्जन कुमार का दावा है कि परियोजना से जुड़े बिलों का भुगतान नहीं किया गया और तत्कालीन PWD सचिव ज्ञानेश कुमार ने बिल पास करने के लिए दो करोड़ रुपये की मांग की थी।
यही वह आरोप है, जिसकी अब विस्तृत जांच होनी है।
यहां सरकारी व्यवस्था से एक सीधा सवाल भी उठता है—यदि किसी परियोजना के भुगतान में अनियमितता या अनुचित मांग की शिकायत सामने आती है, तो उसकी जांच तत्काल और पारदर्शी तरीके से क्यों नहीं होनी चाहिए? आखिर किसी सड़क का बिल सरकारी खजाने से निकलने से पहले कितनी मेजों से गुजरता है और उन मेजों पर बैठे लोगों की जवाबदेही किस तरह तय होती है?
इन सवालों का जवाब जांच के दौरान सामने आने वाले दस्तावेजों और बयानों से ही मिल सकेगा।
एक आत्महत्या, एक कथित सुसाइड नोट और अधूरी रह गई पड़ताल
इस मामले को और गंभीर बनाता है मलेशियाई कंपनी के परियोजना अधिकारी ली सी बीन की आत्महत्या का प्रसंग।
मंत्री रमेश चेन्निथला के अनुसार, उस समय आरोप लगाए गए थे कि PWD की ओर से परियोजना के बिलों का भुगतान नहीं किए जाने के कारण कंपनी पर आर्थिक दबाव बढ़ गया था। ली सी बीन की मौत के बाद उनके परिवार की ओर से कंपनी के कर्मचारियों को कथित तौर पर बताया गया था कि उनके सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार का जिक्र था।
यह विवरण अपने आप में बेहद गंभीर है। हालांकि, किसी सुसाइड नोट में किसी व्यक्ति का कथित उल्लेख होना भी अपने आप में अपराध साबित नहीं करता। ऐसे दावों की पुष्टि दस्तावेजों, संबंधित लोगों के बयान और स्वतंत्र जांच से ही हो सकती है।
लेकिन इस घटना ने उस समय परियोजना से जुड़े भुगतान और प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल खड़े किए थे।
एक विदेशी परियोजना अधिकारी की मौत, करोड़ों रुपये की सड़क परियोजना और भुगतान को लेकर उठे आरोप—इन सबके बीच यह जानना जरूरी हो जाता है कि उस समय सरकारी विभाग ने क्या कदम उठाए थे। क्या भुगतान में देरी के कारणों का रिकॉर्ड तैयार किया गया था? क्या संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया था? क्या कंपनी की शिकायतों की स्वतंत्र जांच हुई थी?
ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि किसी भी सरकारी परियोजना में प्रशासनिक निर्णय केवल फाइलों पर दर्ज औपचारिकताएं नहीं होते। उनके वास्तविक परिणाम जमीन पर काम करने वाले लोगों और संस्थाओं तक पहुंचते हैं।
धारा 17A की मंजूरी: फाइल ने आखिरकार दरवाजा कैसे खोला?
इस मामले में जांच की अनुमति भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत दी गई है।
इस प्रावधान के तहत किसी लोक सेवक के आधिकारिक निर्णय या सिफारिश से जुड़े कथित अपराध की जांच शुरू करने से पहले निर्धारित परिस्थितियों में सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी जरूरी होती है।
मंत्री रमेश चेन्निथला ने बताया कि विजिलेंस विभाग ने कानूनी राय लेने के बाद सरकार से अनुमति मांगी थी। कानूनी राय में कहा गया कि आवश्यक सरकारी मंजूरी मिलने पर जांच की जा सकती है।
इसके बाद मुख्यमंत्री से चर्चा हुई और मंगलवार शाम जांच की अनुमति दे दी गई।
यहां सरकारी प्रक्रिया का एक दिलचस्प पहलू सामने आता है। आरोप पुराने हैं, शिकायतें सामने हैं, कानूनी राय भी ली गई और अब जाकर जांच का रास्ता खुला है। यानी आरोपों की पड़ताल का रास्ता खुद कई प्रशासनिक चरणों से होकर गुजर रहा है।
सरकारी तंत्र में मंजूरी की प्रक्रिया का अपना कानूनी महत्व है। लेकिन जनता के लिए सवाल यह भी है कि ऐसी प्रक्रियाएं जांच को निष्पक्ष बनाने का माध्यम हैं या कभी-कभी जांच में देरी का कारण भी बन जाती हैं?
इस मामले में इसका जवाब फिलहाल किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि जांच की गति और उसके निष्कर्षों से ही मिलेगा।
राजनीतिक पर्दे के पीछे की कहानी: पद बड़ा हो तो सवाल भी बड़े होते हैं
ज्ञानेश कुमार आज देश के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। चुनाव आयोग का पद भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता, राजनीतिक दलों के बीच समान अवसर और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के भरोसे की जिम्मेदारी इसी संस्था से जुड़ी है।
ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त के पुराने प्रशासनिक कार्यकाल से संबंधित आरोपों की जांच का घटनाक्रम स्वाभाविक रूप से राजनीतिक महत्व रखता है।
लेकिन इस पूरे मामले को केवल राजनीतिक टकराव के चश्मे से देखना भी अधूरा होगा।
यदि आरोपों में तथ्य हैं, तो उनकी जांच होनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं, तो जांच के बाद यह बात भी स्पष्ट होनी चाहिए। दोनों ही स्थितियों में सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता के लिए पारदर्शिता जरूरी है।
राजनीति में अक्सर आरोपों का समय भी चर्चा का विषय बनता है। कोई पुराना मामला अचानक सामने आए तो उसके पीछे राजनीतिक मंशा तलाशने की कोशिश होती है। वहीं, जांच की मांग उठे तो उसे दबाने या टालने के आरोप भी लगाए जाते हैं।
लेकिन इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आरोप लगाने वाले की राजनीतिक स्थिति नहीं, बल्कि आरोपों के समर्थन में मौजूद दस्तावेज हैं।
सरकारी पद पर बैठे किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है। उसी तरह, किसी बड़े पद पर पहुंच जाने के बाद पुराने आरोपों की जांच से बचने का रास्ता भी नहीं होना चाहिए।
लोकतंत्र में पद की प्रतिष्ठा और जांच की स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बल्कि किसी पद की प्रतिष्ठा तभी मजबूत होती है, जब उससे जुड़े सवालों का जवाब नियमों के अनुसार दिया जाए।
2006 की जांच और फिर बंद हुई कहानी
यह मामला पहली बार सामने नहीं आया है।
ज्ञानेश कुमार के PWD सचिव रहते हुए सड़क परियोजनाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर पहले भी सवाल उठे थे। वर्ष 2006 में मलेशियाई इंजीनियर ली सी बीन की मौत के बाद विजिलेंस जांच शुरू की गई थी।
हालांकि, आरोपों की पुष्टि नहीं होने के आधार पर आगे की कार्रवाई रोक दी गई थी।
अब नई शिकायतों के आधार पर जांच को आगे बढ़ाया जा रहा है।
यहीं से इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक परत खुलती है। यदि पहले जांच हुई थी, तो उसके निष्कर्ष क्या थे? क्या सभी संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए गए थे? क्या शिकायतकर्ता और परियोजना से जुड़े अधिकारियों से पूछताछ की गई थी? क्या भुगतान से संबंधित दस्तावेजों की जांच हुई थी?
मंत्री चेन्निथला के अनुसार, अब यह भी देखा जा सकता है कि पहले की पड़ताल में शिकायतकर्ता और अन्य संबंधित लोगों के बयान लिए गए थे या नहीं।
यानी इस बार केवल आरोपों की जांच ही नहीं, बल्कि पुरानी जांच की प्रक्रिया और उसके दायरे को भी परखा जा सकता है।
सरकारी जांच का उद्देश्य केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ आरोपों की पुष्टि करना नहीं होना चाहिए। यह भी पता लगाना जरूरी है कि कहीं प्रशासनिक स्तर पर कोई महत्वपूर्ण तथ्य छूट तो नहीं गया था।
यदि पहले की जांच पूरी थी, तो उसके निष्कर्षों को सामने रखा जाना चाहिए। यदि कोई महत्वपूर्ण पहलू अधूरा रह गया था, तो उसका कारण स्पष्ट होना चाहिए।
क्योंकि सरकारी फाइलों में दर्ज निष्कर्षों का महत्व तभी है, जब वे तथ्यों पर आधारित हों और उनकी प्रक्रिया पर भरोसा किया जा सके।
अब विजिलेंस के सामने असली परीक्षा
मंत्री रमेश चेन्निथला ने कहा है कि आरोपों की विस्तृत जांच करना विजिलेंस ब्यूरो की जिम्मेदारी है। एजेंसी शिकायतों में लगाए गए आरोपों और उनसे जुड़े तथ्यों की पड़ताल करेगी।
अब जांच के सामने कई अहम सवाल होंगे।
क्या परियोजना के बिल वास्तव में लंबित थे? यदि थे, तो भुगतान में देरी के आधिकारिक कारण क्या थे? क्या किसी अधिकारी की ओर से अनुचित मांग किए जाने के आरोप की पुष्टि करने वाला कोई दस्तावेज या गवाही मौजूद है? क्या परियोजना से जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड इन आरोपों का समर्थन करते हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या वर्ष 2006 में हुई जांच के निष्कर्षों और अब सामने आई शिकायतों के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर है?
इन सवालों का जवाब जांच एजेंसी को निष्पक्षता से तलाशना होगा।
इस मामले में किसी भी तरह की जल्दबाजी न्याय के हित में नहीं होगी। लेकिन अनावश्यक देरी भी उतनी ही नुकसानदेह हो सकती है। पुराने मामलों में दस्तावेजों की उपलब्धता, गवाहों की स्थिति और घटनाओं की समयरेखा जांच को कठिन बना सकती है।
इसीलिए जांच की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी होगी, उसके निष्कर्षों पर भरोसा उतना ही मजबूत होगा।
फाइल खुलेगी तो सिर्फ आरोप नहीं, व्यवस्था भी कटघरे में होगी
केरल की इस पुरानी सड़क परियोजना से जुड़ा मामला अब एक बार फिर चर्चा में है। दो करोड़ रुपये की कथित रिश्वत, भुगतान में देरी, मलेशियाई परियोजना अधिकारी की आत्महत्या और पहले बंद हो चुकी जांच—ये सभी पहलू अब नई पड़ताल का हिस्सा बन सकते हैं।
यह मामला केवल एक अधिकारी के पुराने कार्यकाल से जुड़ी शिकायतों का नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा भी है, जिसमें सरकारी परियोजनाओं के भुगतान, प्रशासनिक निर्णयों और भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की जाती है।
राजनीति के पर्दे के पीछे अक्सर आरोपों और प्रत्यारोपों का शोर सुनाई देता है। लेकिन लोकतंत्र की असली मजबूती शोर से नहीं, बल्कि तथ्यों से तय होती है।
अब सवाल यह नहीं कि किसने किस पर आरोप लगाया। सवाल यह है कि जांच में क्या सामने आता है।
यदि आरोपों में तथ्य हैं, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि आरोपों की पुष्टि नहीं होती, तो शिकायतों के आधार पर किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को स्थायी नुकसान पहुंचाने से बचना भी जरूरी है।
फिलहाल, केरल सरकार की मंजूरी के बाद विजिलेंस ब्यूरो के सामने रास्ता खुल चुका है। पुरानी फाइल फिर मेज पर है। इस बार जनता की नजर सिर्फ फाइल के खुलने पर नहीं, बल्कि उसके भीतर से निकलने वाले सच पर होगी।
क्योंकि सरकारी दफ्तरों में फाइलें कितनी भी पुरानी क्यों न हो जाएं, जवाबदेही की तारीख कभी खत्म नहीं होनी चाहिए।















