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जांच की रिपोर्ट में ही छिप गया सच! गाजियाबाद के DM से हाईकोर्ट ने पूछा सवाल, आखिर किसे बचाने की थी इतनी जल्दबाजी?

तीन सदस्यीय जांच समिति बनी, रिपोर्ट भी तैयार हो गई, जिलाधिकारी ने हलफनामा भी दाखिल कर दिया, लेकिन जिस रिपोर्ट को जांच का नतीजा बताकर अदालत के सामने रखा गया, उसी पर सवाल खड़े हो गए। समिति के तीन सदस्यों में से दो के हस्ताक्षर गायब! हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी और टिप्पणी की कि पूरे मामले में शिकायत को दबाने का स्पष्ट प्रयास दिखाई दे रहा है। अब 19 नवंबर को जिलाधिकारी को खुद अदालत में पेश होकर जवाब देना होगा।

कभी-कभी किसी शिकायत की जांच में सामने आने वाले तथ्य उतने चौंकाने वाले नहीं होते, जितने चौंकाने वाले उस शिकायत की जांच करने का तरीका होता है। गाजियाबाद से जुड़े एक मामले में भी कुछ ऐसा ही घटनाक्रम सामने आया है। यहां शिकायत की जांच के लिए बाकायदा तीन सदस्यीय समिति गठित की गई, समिति ने रिपोर्ट तैयार की और जिलाधिकारी ने उस रिपोर्ट को अपने व्यक्तिगत हलफनामे के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेश कर दिया। कागजों पर देखने में सब कुछ सरकारी प्रक्रिया के मुताबिक होता दिखाई दिया, लेकिन अदालत ने जब रिपोर्ट के पन्ने पलटे तो कहानी में एक ऐसा पेंच सामने आया, जिसने पूरी जांच प्रक्रिया को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया।

सवाल यह नहीं था कि जांच समिति बनाई गई या नहीं, सवाल यह था कि जिस समिति के तीन सदस्यों को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उसकी रिपोर्ट पर आखिर केवल एक सदस्य के हस्ताक्षर क्यों थे? बाकी दो सदस्य कहां थे? क्या उन्होंने रिपोर्ट देखी थी? क्या वे उसके निष्कर्षों से सहमत थे? और अगर सहमत थे तो उनके हस्ताक्षर कहां हैं?

सरकारी व्यवस्था में कागजों का अपना अलग महत्व होता है। किसी अधिकारी की एक टिप्पणी, एक हस्ताक्षर या एक आदेश कई बार पूरे मामले की दिशा बदल देता है। लेकिन जब जांच रिपोर्ट में ही जरूरी औपचारिकताएं गायब हों तो फिर उस जांच की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। गाजियाबाद के इस मामले में हाईकोर्ट की नाराजगी की वजह भी यही बताई जा रही है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान जिस तरह जांच रिपोर्ट पर सवाल उठाए, उससे साफ है कि अदालत महज औपचारिक जवाब से संतुष्ट होने के मूड में नहीं है। अदालत ने मामले में शिकायत को दबाने का स्पष्ट प्रयास दिखाई देने जैसी गंभीर टिप्पणी की है। यह टिप्पणी किसी सामान्य प्रशासनिक चूक की ओर इशारा भर नहीं करती, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती है, जिसके जरिए शिकायत की जांच किए जाने का दावा किया गया।

तीन सदस्यीय समिति, लेकिन रिपोर्ट पर एक ही हस्ताक्षर!

मामले की सुनवाई बिजेंद्र कुमार की याचिका पर हुई। सुनवाई के दौरान गाजियाबाद के जिलाधिकारी और आईएएस अधिकारी रवींद्र कुमार मंदार ने व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर अदालत को बताया कि शिकायत की जांच के लिए फरवरी 2026 में तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी।

इस समिति को मामले की जांच कर अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी। जिलाधिकारी के हलफनामे के मुताबिक समिति ने 17 फरवरी 2026 को अपनी रिपोर्ट उन्हें सौंप दी थी। यानी प्रशासन की ओर से अदालत को यह बताया गया कि जांच की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और समिति अपना निष्कर्ष दे चुकी है।

लेकिन अदालत के सामने जब इस जांच रिपोर्ट को खोला गया तो एक ऐसी कमी सामने आई, जिसने प्रशासन के पूरे दावे को कठघरे में खड़ा कर दिया।

रिपोर्ट पर समिति के अध्यक्ष के हस्ताक्षर तो मौजूद थे, लेकिन समिति के बाकी दो सदस्यों के हस्ताक्षर नदारद थे। इन दो सदस्यों में क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी, गाजियाबाद और थाना प्रभारी मुरादनगर शामिल थे।

अब सवाल यह है कि जब जांच समिति तीन सदस्यीय थी तो उसकी रिपोर्ट पर तीनों सदस्यों की सहमति या उनकी भूमिका का प्रमाण कहां है? क्या बाकी दोनों अधिकारियों ने जांच में हिस्सा लिया था? क्या उन्होंने रिपोर्ट के निष्कर्षों को स्वीकार किया था? क्या उन्हें रिपोर्ट की अंतिम प्रति दिखाई गई थी? या फिर समिति के नाम पर तैयार दस्तावेज वास्तव में केवल अध्यक्ष की राय थी?

इन सवालों का जवाब केवल एक हस्ताक्षर से नहीं मिलता, लेकिन हस्ताक्षर का न होना निश्चित रूप से जांच की प्रक्रिया पर गंभीर संदेह पैदा करता है।

जिलाधिकारी की सफाई: अध्यक्ष के हस्ताक्षर ही काफी हैं?

अदालत में रिपोर्ट पर सवाल उठने के बाद जिलाधिकारी ने अपनी ओर से सफाई पेश की। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट समिति के अध्यक्ष की ओर से प्रस्तुत की गई है और अध्यक्ष के हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट को ही समिति की रिपोर्ट माना जाना चाहिए।

यानी प्रशासन की दलील का सार यह था कि समिति के अध्यक्ष के हस्ताक्षर होने के बाद रिपोर्ट को समिति की रिपोर्ट मानने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है। अगर तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी तो फिर बाकी दो सदस्यों की भूमिका क्या केवल समिति के गठन के आदेश तक सीमित थी? क्या वे सिर्फ नाम के सदस्य थे? अगर जांच सामूहिक रूप से की गई थी तो सामूहिक जांच का दस्तावेज कहां है? और अगर रिपोर्ट केवल अध्यक्ष ने तैयार की थी तो क्या उसे तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट बताना उचित था?

सरकारी जांच कोई व्यक्तिगत राय लिखने की प्रक्रिया नहीं होती। खासकर तब, जब किसी शिकायत की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन स्वयं तीन अधिकारियों की समिति गठित करता है। ऐसी स्थिति में जांच की पारदर्शिता और प्रक्रिया का पालन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

बहरहाल, जिलाधिकारी की इस दलील के बावजूद हाईकोर्ट ने रिपोर्ट की वैधता और जांच प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। अदालत की नाराजगी ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल हलफनामा दाखिल कर देना या किसी दस्तावेज को जांच रिपोर्ट का नाम दे देना पर्याप्त नहीं है। अदालत यह भी देखेगी कि जांच वास्तव में किस तरह हुई और उसके निष्कर्षों के पीछे कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई।

शिकायत की जांच हुई या शिकायत को ही फाइलों में सुलाने की कोशिश?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू हाईकोर्ट की वह टिप्पणी है, जिसमें अदालत ने शिकायत को दबाने का स्पष्ट प्रयास दिखाई देने की बात कही।

यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी शिकायत की जांच का मूल उद्देश्य तथ्यों तक पहुंचना और शिकायत में उठाए गए सवालों का निष्पक्ष परीक्षण करना होता है। जांच समिति का गठन इसी भरोसे के साथ किया जाता है कि मामले को किसी एक अधिकारी की इच्छा या सुविधा के मुताबिक नहीं, बल्कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत परखा जाएगा।

लेकिन अगर जांच रिपोर्ट पर समिति के दो सदस्यों के हस्ताक्षर ही नहीं हैं तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि जांच की निष्पक्षता कितनी सुनिश्चित की गई थी।

यहां एक दिलचस्प विरोधाभास भी सामने आता है। प्रशासन की ओर से अदालत को यह बताया गया कि जांच पूरी हो चुकी है और रिपोर्ट सौंप दी गई है। दूसरी ओर, उसी रिपोर्ट में ऐसी कमी दिखाई दी, जिसने जांच की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया।

यानी जिस दस्तावेज के जरिए प्रशासन अपनी कार्रवाई को सही साबित करना चाहता था, वही दस्तावेज अब प्रशासन से जवाब मांगने की वजह बन गया है।

इसे सरकारी कामकाज की विडंबना ही कहा जाएगा कि शिकायत का जवाब देने के लिए तैयार की गई रिपोर्ट अब खुद एक बड़े सवाल में बदल गई है।

हालांकि, अदालत की टिप्पणी और रिपोर्ट में सामने आई प्रक्रियात्मक कमी को किसी अधिकारी की अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। मामले की वास्तविक स्थिति, जांच की प्रक्रिया और अधिकारियों की जिम्मेदारी का निर्धारण आगे की न्यायिक सुनवाई में ही स्पष्ट होगा। लेकिन इतना जरूर है कि हाईकोर्ट ने इस मामले को सामान्य प्रशासनिक औपचारिकता मानकर छोड़ने के बजाय गंभीरता से लिया है।

अब फाइलों से बाहर आकर DM को देना होगा जवाब

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी रवींद्र कुमार मंदार को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है।

यह निर्देश अपने आप में महत्वपूर्ण है। आमतौर पर प्रशासनिक मामलों में अधिकारी हलफनामे, सरकारी पत्राचार और विभागीय रिपोर्टों के माध्यम से अदालत के सामने अपना पक्ष रखते हैं। लेकिन जब अदालत किसी मामले में व्यक्तिगत उपस्थिति का आदेश देती है तो इसका अर्थ होता है कि वह संबंधित अधिकारी से सीधे स्पष्टीकरण चाहती है।

अब जिलाधिकारी को अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट पर केवल अध्यक्ष के हस्ताक्षर क्यों हैं? बाकी दो सदस्यों की सहमति या असहमति का रिकॉर्ड कहां है? समिति ने किस प्रक्रिया के तहत जांच की? और प्रशासन ने इस रिपोर्ट को पूरी समिति की रिपोर्ट मानकर अदालत में किस आधार पर पेश किया?

इन सवालों के जवाब अब केवल फाइलों में दर्ज टिप्पणियों से नहीं चलेंगे। जिलाधिकारी को खुद अदालत में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखना होगा।

मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है। इस तारीख पर अदालत की निगाहें केवल जिलाधिकारी के हलफनामे पर नहीं, बल्कि उस पूरी जांच प्रक्रिया पर होंगी, जिसके आधार पर शिकायत के निस्तारण का दावा किया गया है।

असली कहानी अब 19 नवंबर को खुलेगी!

गाजियाबाद के इस मामले ने एक बार फिर प्रशासनिक जांच की कार्यशैली को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर किसी शिकायत की जांच में समिति गठित करने का उद्देश्य क्या है? क्या समिति के सभी सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी नहीं है? क्या जांच रिपोर्ट तैयार करने से पहले उसकी प्रक्रिया और निष्कर्षों की जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए?

और सबसे बड़ा सवाल यह कि अगर किसी शिकायत की जांच में ही ऐसी खामियां रह जाएं, जिन्हें देखकर हाईकोर्ट को शिकायत दबाने का प्रयास दिखाई देने लगे, तो आम नागरिक प्रशासन की निष्पक्षता पर भरोसा कैसे करे?

सरकारी तंत्र में जांच समितियां अक्सर जवाबदेही तय करने के लिए बनाई जाती हैं। लेकिन जब जांच के दस्तावेज ही जवाबदेही के सवाल पैदा करने लगें तो मामला और गंभीर हो जाता है। यहां मामला केवल दो हस्ताक्षरों का नहीं रह जाता, बल्कि यह भरोसे का सवाल बन जाता है कि शिकायत को वास्तव में सुना गया या उसे कागजी कार्रवाई के सहारे शांत करने की कोशिश हुई।

फिलहाल, इस पूरे प्रकरण में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। अदालत की अगली सुनवाई बाकी है और जिलाधिकारी का पक्ष भी सामने आना है। लेकिन हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि जांच रिपोर्ट को अंतिम सच मानकर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अब देखना यह है कि 19 नवंबर को अदालत में जिलाधिकारी की सफाई सामने आती है या जांच की कहानी में कुछ और ऐसे पन्ने खुलते हैं, जिनका जवाब प्रशासन के पास फिलहाल नहीं है।

क्योंकि सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि रिपोर्ट पर दो हस्ताक्षर क्यों नहीं हैं। सवाल यह है कि जिस शिकायत की सच्चाई सामने लाने के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई थी, उसकी जांच में आखिर पूरी प्रक्रिया किसके भरोसे छोड़ दी गई?

और यही वह सवाल है, जिसका जवाब गाजियाबाद के प्रशासन को अब अदालत के सामने देना होगा।

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