गुजरात के बनासकांठा में 30 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम महज एक सरकारी आयोजन नहीं था। यह गांव, किसान, पशुपालन, डेयरी और तकनीक को एक ही राजनीतिक मंच पर लाकर खड़ा करने की कोशिश भी थी। मंच पर खेती की चर्चा थी, पशुपालन की बात थी, महिलाओं की भागीदारी का जिक्र था और किसानों के बैंक खातों में सीधे रकम पहुंचाने का ऐलान भी। यानी गांव की जिंदगी के लगभग हर उस हिस्से को छुआ गया, जहां से देश की बड़ी आबादी की रोजी-रोटी जुड़ी है।
लेकिन इस आयोजन की असली दिलचस्पी सिर्फ इतनी नहीं कि प्रधानमंत्री ने कितने करोड़ रुपये ट्रांसफर किए या कितने करोड़ की परियोजनाओं का उद्घाटन किया। असली कहानी यह है कि आज की राजनीति में किसान केवल खेत में मेहनत करने वाला व्यक्ति नहीं रह गया है। वह सरकारी योजनाओं का लाभार्थी भी है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार भी और राजनीतिक संदेशों का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र भी।
बनासकांठा में प्रधानमंत्री ने इसी ग्रामीण राजनीतिक गणित को एक साथ साधने की कोशिश की।
बैंक खाते में 19 हजार करोड़, किसान के चेहरे पर मुस्कान और सरकार का सीधा संदेश
प्रधानमंत्री ने देश के 9.34 करोड़ से अधिक किसान परिवारों के बैंक खातों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की किस्त के रूप में 19 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि सीधे ट्रांसफर की।
यह आंकड़ा अपने आप में बड़ा है। राजनीति के लिहाज से भी इसका संदेश साफ है। सरकार यह बताना चाहती है कि किसान के नाम पर घोषित सहायता अब सरकारी दफ्तरों की फाइलों में अटकने के बजाय सीधे बैंक खाते तक पहुंच रही है।
यानी बीच में बिचौलियों की भूमिका कम करने और लाभार्थी तक पैसा पहुंचाने का दावा।
लेकिन यहां एक सवाल भी अपनी जगह खड़ा है। किसान को सम्मान निधि की रकम मिलना राहत जरूर है, मगर क्या इतनी रकम खेती की बढ़ती लागत, महंगे बीज, खाद, डीजल, सिंचाई और बाजार के उतार-चढ़ाव से पैदा होने वाली चुनौतियों का पूरा समाधान है?
किसान को आर्थिक सहायता चाहिए, लेकिन उसे अपनी उपज का उचित मूल्य भी चाहिए। उसे योजनाओं का लाभ चाहिए, लेकिन फसल बेचने के लिए भरोसेमंद बाजार भी चाहिए। उसे तकनीक चाहिए, लेकिन खेती की लागत और आमदनी के बीच संतुलन भी चाहिए।
सरकार की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल बैंक खातों में पहुंची रकम से नहीं, बल्कि खेत में बचने वाले मुनाफे से भी होना चाहिए।
फिर भी इतना तय है कि किसान सम्मान निधि को सरकार ने ग्रामीण राजनीति के सबसे प्रभावशाली माध्यमों में से एक बना दिया है। बनासकांठा में 19 हजार करोड़ रुपये का हस्तांतरण इसी राजनीतिक और आर्थिक संदेश को और मजबूत करता दिखाई दिया।
खेती संस्कृति है, लेकिन अब खेती में तकनीक का नया तड़का!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चौपाल को संबोधित करते हुए कहा कि खेती हमारी संस्कृति है और सरकार ने खेती तथा पशुपालन को तकनीक से जोड़ने का काम किया है।
उन्होंने बताया कि देश के किसानों को अब तक 26 करोड़ से अधिक सॉइल हेल्थ कार्ड दिए जा चुके हैं।
यहां सरकार का जोर खेती को परंपरागत अनुभव से आगे बढ़ाकर वैज्ञानिक आधार देने पर दिखाई देता है। किसान पहले मिट्टी देखकर, मौसम समझकर और अपने अनुभव के आधार पर खेती करता था। अब मिट्टी की जांच, पोषक तत्वों की जानकारी, बेहतर बीज, आधुनिक सिंचाई और वैज्ञानिक सलाह को खेती का हिस्सा बनाने की कोशिश की जा रही है।
सवाल यह है कि तकनीक गांव तक कितनी पहुंची है?
क्योंकि खेत में वैज्ञानिक तकनीक का फायदा तभी है, जब छोटे किसान तक उसकी जानकारी पहुंचे। मिट्टी की जांच के बाद किसान को यह भी पता चले कि उसे कितनी खाद डालनी है, कौन-सी फसल बेहतर रहेगी और लागत घटाने का सही तरीका क्या है।
सिर्फ कार्ड बांट देने से मिट्टी की सेहत नहीं सुधरती। उसके आधार पर खेती की पद्धति बदलने की व्यवस्था भी जरूरी है।
सरकार का संदेश साफ है कि आने वाले समय में खेती केवल हल और ट्रैक्टर तक सीमित नहीं रहेगी। डेटा, विज्ञान और तकनीक भी किसान की ताकत बनेंगे।
325 करोड़ का पशु अनुसंधान केंद्र: गाय-भैंसों की नस्ल सुधरेगी तो डेयरी की तस्वीर बदलेगी?
बनासकांठा के इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण भारत मवेशी प्रजनन एवं अनुसंधान केंद्र (बीबीबीआरसी) रहा।
भीलड़ी में 127 एकड़ भूमि पर लगभग 325 करोड़ रुपये की लागत से इस केंद्र का निर्माण किया गया है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक तरीके से मवेशियों का प्रजनन करना, नस्ल की गुणवत्ता में सुधार करना और दूध उत्पादन की क्षमता बढ़ाना है।
गुजरात के इस इलाके में दूध केवल कारोबार नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी का आधार है। गांव की महिलाओं से लेकर छोटे पशुपालकों तक, बड़ी आबादी की आमदनी डेयरी क्षेत्र से जुड़ी हुई है।
ऐसे में मवेशियों की बेहतर नस्ल, वैज्ञानिक प्रजनन और पशुओं के रखरखाव की आधुनिक तकनीक ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
यहां एक दिलचस्प राजनीतिक और आर्थिक पहलू भी है।
खेती में मौसम का जोखिम है। कभी बारिश कम तो कभी ज्यादा। कभी फसल तैयार होने पर बाजार में भाव गिर जाते हैं। लेकिन पशुपालन ग्रामीण परिवारों को आय का एक अतिरिक्त जरिया देता है। दूध का कारोबार रोजाना नकदी का प्रवाह बनाए रखने में मदद करता है।
यही कारण है कि डेयरी क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था में केवल कृषि का सहायक कारोबार नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुका है।
सरकार इसी ताकत को वैज्ञानिक तकनीक के साथ जोड़ना चाहती है।
हालांकि अनुसंधान केंद्र बन जाना एक उपलब्धि है, लेकिन इसकी असली सफलता तब मानी जाएगी जब आसपास के छोटे पशुपालकों को बेहतर नस्ल, पशु स्वास्थ्य सेवाओं और दूध उत्पादन में वास्तविक लाभ मिले। बड़े केंद्र की चमक तभी गांव के छोटे पशुपालक के घर तक पहुंचेगी।
महिलाओं की भागीदारी का जिक्र, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली नायिकाएं कौन?
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र में महिलाओं की बड़ी भागीदारी को भी रेखांकित किया।
यह बात ग्रामीण भारत की उस वास्तविकता की ओर इशारा करती है, जिस पर अक्सर बड़े मंचों की चर्चाओं में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
गांवों में पशुओं को चारा देना, दूध निकालना, उनकी देखभाल करना, साफ-सफाई और डेयरी से जुड़े कई दैनिक काम महिलाओं के जिम्मे होते हैं। कई परिवारों में पुरुष खेती के काम में लगे रहते हैं, जबकि पशुपालन की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर होती है।
दूध की बिक्री से आने वाली रकम परिवार की आर्थिक जरूरतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
विडंबना यह है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इतनी बड़ी भूमिका निभाने के बावजूद महिलाओं के इस श्रम को कई बार परिवार की सामान्य जिम्मेदारी मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
अगर वैज्ञानिक पशुपालन, डेयरी तकनीक और बेहतर बाजार व्यवस्था से महिलाओं की आय सीधे बढ़ती है, तो इसका असर केवल एक परिवार पर नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण समाज पर पड़ सकता है।
अब देखना यह होगा कि आधुनिक डेयरी परियोजनाओं का फायदा महिलाओं को केवल काम के रूप में मिलता है या उन्हें आर्थिक निर्णयों और आमदनी पर भी अधिक अधिकार मिलता है।
आलू से लेकर दूध तक: बनास डेयरी का कारोबार बढ़ाने की तैयारी
प्रधानमंत्री ने बनास डेयरी की नई परियोजनाओं को भी आगे बढ़ाया। इनमें आलू विस्तार परियोजना और दूध एवं डेयरी उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए आधुनिक ऑटोमैटिक कोल्ड स्टोरेज सिस्टम शामिल है।
आलू प्रोसेसिंग परियोजना का महत्व इसलिए भी है क्योंकि किसानों की कमाई केवल फसल उगाने से नहीं बढ़ती। असली कमाई तब बढ़ती है जब उपज को बेहतर तरीके से प्रोसेस करके बाजार में अधिक मूल्य पर बेचा जा सके।
आलू की खेती करने वाले किसानों के सामने अक्सर भंडारण और बाजार भाव की चुनौती रहती है। फसल तैयार होने के बाद अगर बाजार में कीमत गिर जाए तो किसान को मजबूरी में कम भाव पर उपज बेचनी पड़ सकती है।
प्रोसेसिंग प्लांट इस समस्या का एक संभावित समाधान बन सकते हैं।
आलू को केवल कच्चे उत्पाद के रूप में बेचने के बजाय उससे विभिन्न खाद्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिलता है और किसानों के लिए बाजार के नए रास्ते खुलते हैं।
दूसरी तरफ UHT-ASRS सिस्टम के जरिए दूध और डेयरी उत्पादों के भंडारण तथा प्रबंधन को आधुनिक बनाने की तैयारी है।
यानी गांव में उत्पादित दूध को सुरक्षित रखने, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने और सप्लाई चेन को बेहतर करने पर जोर है।
यहां बनास डेयरी का मॉडल भी ध्यान खींचता है। सहकारी व्यवस्था के जरिए किसानों और पशुपालकों को एक संगठित बाजार से जोड़ना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण तरीका रहा है।
लेकिन इसका अगला पड़ाव केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों को उत्पाद की बेहतर कीमत दिलाना भी होना चाहिए।
गोबर से गैस: कचरे को कमाई में बदलने का नया फार्मूला
कार्यक्रम में थराद और राधनपुर में दो कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) प्लांट की आधारशिला रखने की योजना भी शामिल रही।
इन संयंत्रों में गोबर और जैविक कचरे से गैस तैयार की जाएगी।
ग्रामीण भारत में गोबर लंबे समय से पशुपालन का हिस्सा रहा है। इसका इस्तेमाल खाद और ईंधन के रूप में होता आया है। लेकिन अब इसी गोबर को ऊर्जा उत्पादन और व्यावसायिक उपयोग से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
यह मॉडल सफल होता है तो इसके कई फायदे हो सकते हैं।
एक तरफ गांवों में जैविक कचरे का बेहतर प्रबंधन होगा, दूसरी तरफ वैकल्पिक ऊर्जा का उत्पादन बढ़ सकता है। किसानों और पशुपालकों के लिए गोबर भी अतिरिक्त आर्थिक संसाधन बन सकता है।
लेकिन यहां भी असली चुनौती परियोजना की घोषणा नहीं, उसका संचालन है।
क्या गांवों से पर्याप्त गोबर एकत्र किया जा सकेगा? क्या किसानों को इसके बदले उचित भुगतान मिलेगा? क्या संयंत्रों के संचालन की लागत और गैस की बिक्री का मॉडल टिकाऊ होगा?
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि गोबर से गैस बनाने की यह योजना ग्रामीणों के लिए वास्तव में कितनी फायदेमंद साबित होती है।
गांव की चौपाल पर विकास का मंच, लेकिन राजनीति का संदेश भी पढ़िए!
बनासकांठा का कार्यक्रम प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से लेकर पशुपालन, डेयरी, कृषि तकनीक और वैकल्पिक ऊर्जा तक फैला हुआ था।
इसे केवल परियोजनाओं के उद्घाटन और योजनाओं के लाभ वितरण के रूप में देखना अधूरा होगा।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो ग्रामीण भारत आज भी देश की अर्थव्यवस्था और चुनावी राजनीति दोनों का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। किसान, पशुपालक, सहकारी संस्थाएं और ग्रामीण महिलाएं ऐसी आबादी हैं, जिन तक पहुंच बनाने के लिए सरकारें लगातार प्रयास करती हैं।
इसलिए चौपाल का मंच भी अपने आप में महत्वपूर्ण है।
यहां प्रधानमंत्री ने खेती को संस्कृति बताया, पशुपालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ताकत कहा और महिलाओं की भूमिका को रेखांकित किया। साथ ही सीधे बैंक खातों में हजारों करोड़ रुपये पहुंचाने का संदेश भी दिया।
एक तरफ विकास की परियोजनाएं थीं, दूसरी तरफ लाभार्थियों तक पहुंचने वाली योजनाएं। एक तरफ वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र था, दूसरी तरफ गांवों में दूध के कारोबार से जुड़े परिवारों की उम्मीदें।
यह पूरा आयोजन ग्रामीण विकास की एक ऐसी तस्वीर पेश करता है, जिसमें सरकार खुद को किसान और पशुपालक की आर्थिक जिंदगी बदलने वाले प्रमुख भागीदार के रूप में दिखाना चाहती है।
लेकिन लोकतंत्र में किसी भी सरकार के दावों की असली परीक्षा मंच की रोशनी में नहीं, बल्कि गांव की वास्तविक जिंदगी में होती है।
किसान की आमदनी कितनी बढ़ी? पशुपालक को दूध का कितना बेहतर मूल्य मिला? महिलाओं की आर्थिक स्थिति में कितना सुधार हुआ? आलू उत्पादक को प्रोसेसिंग प्लांट से कितना लाभ मिला? और गोबर से बनने वाली गैस ने गांव की अर्थव्यवस्था में कितना पैसा जोड़ा?
इन सवालों का जवाब ही विकास की वास्तविक तस्वीर सामने लाएगा।
2100 से ज्यादा क्लस्टर कार्यक्रम: बनासकांठा से गांव-गांव तक पहुंचाने की तैयारी
प्रधानमंत्री किसान उत्सव दिवस के अवसर पर गुजरात में 34 जिला स्तरीय और 2,100 से अधिक क्लस्टर स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना भी सामने आई।
भीलड़ी के मुख्य कार्यक्रम का लाइव प्रसारण किया जाएगा। किसानों को कृषि और बागवानी योजनाओं से जुड़े समर्थन पत्र भी वितरित किए जाएंगे।
इसका अर्थ है कि कार्यक्रम का संदेश केवल एक मंच या एक जिले तक सीमित रखने की तैयारी नहीं है। इसे अलग-अलग गांवों और किसान समूहों तक पहुंचाने की कोशिश है।
यानी एक तरफ प्रधानमंत्री का बड़ा मंच और दूसरी तरफ गांव-गांव में आयोजित होने वाले कार्यक्रम।
यह सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ ग्रामीण समाज तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने का भी प्रभावी माध्यम बन सकता है।
बनासकांठा में आयोजन के दौरान रोशनी से सजे आसपास के इलाकों ने भी उत्सव जैसा माहौल बनाया। डेयरी और पशुपालन से जुड़े लोगों में नए अनुसंधान केंद्र को लेकर उत्साह दिखाई दिया।
हालांकि रोशनी से सजे परिसर और आधुनिक मशीनों से सुसज्जित केंद्र की तस्वीरें जितनी आकर्षक हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली चमक तब दिखाई देगी जब छोटे किसान और पशुपालक अपनी आमदनी में उसका असर महसूस करेंगे।
आखिरी सवाल: गांव की तस्वीर बदलेगी या विकास की तस्वीरें ही चमकेंगी?
बनासकांठा का पूरा आयोजन कई मायनों में ग्रामीण भारत की बदलती प्राथमिकताओं का संकेत देता है।
अब खेती के साथ पशुपालन, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग, कोल्ड स्टोरेज और बायोगैस जैसे क्षेत्रों को जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की बात हो रही है।
यह दिशा महत्वपूर्ण है। क्योंकि भारत के गांवों की समृद्धि केवल गेहूं और धान की पैदावार बढ़ाने से नहीं आएगी। इसके लिए किसान को खेती के साथ दूसरे आय स्रोत भी देने होंगे।
प्रधानमंत्री ने 19 हजार करोड़ रुपये की किसान सम्मान निधि जारी करके तत्काल आर्थिक सहायता का संदेश दिया। 325 करोड़ रुपये के अनुसंधान केंद्र के जरिए पशुपालन को वैज्ञानिक आधार देने की कोशिश की। आलू प्रोसेसिंग और आधुनिक कोल्ड स्टोरेज के जरिए कृषि उत्पादों का मूल्य बढ़ाने की दिशा दिखाई। वहीं CBG प्लांट के जरिए गोबर और जैविक कचरे को आर्थिक संसाधन में बदलने का खाका पेश किया।
लेकिन कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अभी बाकी है।
क्योंकि किसान को भाषण से ज्यादा बाजार चाहिए, पशुपालक को घोषणा से ज्यादा दूध का उचित मूल्य चाहिए और ग्रामीण महिला को तारीफ से ज्यादा अपनी मेहनत की आर्थिक पहचान चाहिए।
बनासकांठा में विकास का मंच सज चुका है, परियोजनाओं की शुरुआत हो चुकी है और करोड़ों रुपये किसानों के खातों में भेजे जा चुके हैं।
अब असली परीक्षा यह है कि इस मंच से निकला विकास का संदेश गांव के हर घर तक कितनी दूर पहुंचता है।
क्योंकि गोबर से गैस बनाना, आलू से उद्योग खड़ा करना और दूध से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चलाना तभी बड़ी उपलब्धि कहलाएगा, जब किसान की जेब में भी उतनी ही चमक आए, जितनी बनासकांठा की सजी हुई रोशनी में दिखाई दे रही है।















