लेखक: डॉ. वैष्णवी त्रिपाठी
स्ट्रोक एक ऐसी गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें हर मिनट बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसे आमतौर पर ब्रेन अटैक भी कहा जाता है। इसकी स्थिति तब पैदा होती है, जब मस्तिष्क तक रक्त और ऑक्सीजन पहुंचाने वाली किसी रक्त वाहिका में रुकावट आ जाती है या रक्त वाहिका फटने के कारण मस्तिष्क में रक्तस्राव होने लगता है। दोनों ही स्थितियों में दिमाग के प्रभावित हिस्से को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और मस्तिष्क की कोशिकाएं तेजी से क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। यदि समय रहते उपचार न मिले तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। मरीज को स्थायी लकवा, बोलने और समझने में परेशानी, याददाश्त कमजोर होने, चलने-फिरने में कठिनाई और कई बार जानलेवा जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।
स्ट्रोक की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें समय पर पहचान और उपचार से काफी हद तक मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। आधुनिक चिकित्सा तकनीकों और बेहतर उपचार विकल्पों के कारण आज कई मरीजों को गंभीर विकलांगता से बचाने और उनकी रिकवरी में मदद करना संभव हुआ है। हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि मरीज और उसके परिजन शुरुआती लक्षणों को पहचानें और बिना देरी किए अस्पताल पहुंचें।
हर साल 29 अक्टूबर को विश्व स्ट्रोक दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को स्ट्रोक के जोखिम, लक्षणों, समय पर उपचार और बचाव के तरीकों के प्रति जागरूक करना है। आज भी जानकारी के अभाव में बहुत से लोग स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों को सामान्य कमजोरी, थकान, चक्कर या बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यही लापरवाही कई बार मरीज के लिए गंभीर परिणाम लेकर आती है।
B.E. F.A.S.T. से पहचानें स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण
स्ट्रोक की पहचान के लिए B.E. F.A.S.T. एक बेहद उपयोगी तरीका है। इसके जरिए कुछ प्रमुख लक्षणों को आसानी से समझा जा सकता है। मरीज या उसके आसपास मौजूद व्यक्ति इन संकेतों पर ध्यान देकर समय रहते मेडिकल सहायता ले सकते हैं।
B – Balance (संतुलन): यदि किसी व्यक्ति का अचानक संतुलन बिगड़ने लगे, चलते समय लड़खड़ाहट हो, चक्कर आए या शरीर का तालमेल प्रभावित हो जाए तो इसे सामान्य कमजोरी मानकर नजरअंदाज न करें। अचानक संतुलन बिगड़ना स्ट्रोक का संकेत हो सकता है।
E – Eyes (आंखें): अचानक एक या दोनों आंखों से धुंधला दिखाई देना, दो चीजें नजर आना, दृष्टि का कुछ हिस्सा गायब होना या अचानक देखने में परेशानी होना भी स्ट्रोक के लक्षण हो सकते हैं।
F – Face (चेहरा): मरीज को मुस्कुराने के लिए कहें। यदि चेहरे का एक हिस्सा नीचे की ओर झुका हुआ दिखाई दे या मुस्कुराने पर दोनों तरफ समान हलचल न हो तो यह स्ट्रोक का महत्वपूर्ण संकेत है।
A – Arms (हाथ): मरीज को दोनों हाथ ऊपर उठाने के लिए कहें। यदि एक हाथ ऊपर न उठ पाए, नीचे गिरने लगे या एक तरफ अचानक कमजोरी और सुन्नपन महसूस हो तो तुरंत सतर्क हो जाएं। कई बार पैरों में भी इसी तरह की कमजोरी हो सकती है।
S – Speech (बोलना): अचानक बोलने में परेशानी, शब्दों का स्पष्ट उच्चारण न कर पाना, बात करते समय शब्द भूलना या दूसरों की कही हुई बात समझने में कठिनाई होना स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं।
T – Time (समय): इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर एक मिनट भी बर्बाद न करें। तुरंत एंबुलेंस बुलाएं और मरीज को ऐसे अस्पताल पहुंचाएं, जहां स्ट्रोक के इलाज की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हों।
यह समझना जरूरी है कि स्ट्रोक के सभी मरीजों में एक जैसे लक्षण नहीं दिखाई देते। किसी व्यक्ति में चेहरे का टेढ़ापन हो सकता है, जबकि किसी दूसरे व्यक्ति में केवल देखने, बोलने या चलने में परेशानी हो सकती है।
लक्षण ठीक हो जाएं, तब भी खतरा खत्म नहीं होता
कई बार स्ट्रोक जैसे लक्षण कुछ मिनटों या घंटों में अपने आप ठीक हो जाते हैं। मरीज और उसके परिजन इसे राहत की बात समझकर अस्पताल जाने की जरूरत नहीं समझते। लेकिन ऐसा करना खतरनाक हो सकता है। यह ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (TIA) हो सकता है, जिसे मिनी स्ट्रोक भी कहा जाता है।
TIA में मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह कुछ समय के लिए बाधित होता है। इसके लक्षण स्ट्रोक जैसे ही होते हैं, लेकिन आमतौर पर कुछ समय बाद ठीक हो जाते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज पूरी तरह खतरे से बाहर है। TIA भविष्य में बड़े स्ट्रोक का चेतावनी संकेत हो सकता है। इसलिए लक्षण खत्म होने के बावजूद तुरंत चिकित्सकीय जांच और आवश्यक परीक्षण कराना बेहद जरूरी है।
स्ट्रोक के लक्षण दिखाई देने पर क्या करें?
स्ट्रोक की स्थिति में मरीज को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना सबसे जरूरी कदम है। इसके लिए तुरंत एंबुलेंस या आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। मरीज को खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल जाने की अनुमति न दें।
परिजनों को यह याद रखने की कोशिश करनी चाहिए कि लक्षण पहली बार कब दिखाई दिए थे या मरीज आखिरी बार कब बिल्कुल सामान्य अवस्था में था। इसे ‘लास्ट नोन वेल टाइम’ कहा जाता है। यह जानकारी डॉक्टरों के लिए उपचार का निर्णय लेने में बेहद महत्वपूर्ण होती है।
मरीज को अपनी तरफ से खाना, पानी या कोई दवा न दें। स्ट्रोक के दौरान निगलने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे खाना या पानी सांस की नली में जाने का खतरा रहता है। इसी तरह एस्पिरिन या कोई अन्य खून पतला करने वाली दवा डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं देनी चाहिए। इसका कारण यह है कि स्ट्रोक दो तरह का हो सकता है। एक में रक्त वाहिका में थक्का बनने से रक्त प्रवाह रुकता है, जबकि दूसरे में रक्त वाहिका फटने से मस्तिष्क में रक्तस्राव होता है। दोनों स्थितियों का उपचार अलग-अलग होता है।
स्ट्रोक कितने प्रकार का होता है?
मुख्य रूप से स्ट्रोक दो प्रकार का होता है।
1. इस्केमिक स्ट्रोक: यह स्ट्रोक का सबसे सामान्य प्रकार है। इसमें मस्तिष्क तक रक्त पहुंचाने वाली रक्त वाहिका में खून का थक्का जम जाता है और रक्त प्रवाह बाधित हो जाता है। इसके कारण मस्तिष्क के प्रभावित हिस्से को ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिल पाते।
2. हेमरेजिक स्ट्रोक: इसमें मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और आसपास के मस्तिष्क के ऊतकों में रक्तस्राव होने लगता है। अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर, रक्त वाहिकाओं की कमजोरी और ब्रेन एन्यूरिज्म जैसी स्थितियां इसके कारण हो सकती हैं।
इन दोनों प्रकार के स्ट्रोक की पहचान के लिए ब्रेन इमेजिंग बेहद जरूरी होती है, क्योंकि उपचार का तरीका इसी पर निर्भर करता है।
आधुनिक तकनीकों से बेहतर हुए स्ट्रोक के इलाज के विकल्प
पिछले कुछ वर्षों में स्ट्रोक के उपचार के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। अब ऐसी आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से उपयुक्त मरीजों में रक्त प्रवाह दोबारा बहाल करने और मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को कम करने की कोशिश की जाती है।
क्लॉट घोलने वाली दवाएं: इस्केमिक स्ट्रोक के कुछ मरीजों में एल्टेप्लेस और टेनेक्टेप्लेस जैसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। ये दवाएं रक्त वाहिका में बने थक्के को घोलने में मदद करती हैं। उपयुक्त मरीजों में इन्हें आमतौर पर लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे के भीतर दिया जाता है। हालांकि, दवा देने से पहले ब्रेन इमेजिंग और मरीज की मेडिकल हिस्ट्री का आकलन जरूरी होता है। हर मरीज इन दवाओं के लिए उपयुक्त नहीं होता।
मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी: यदि मस्तिष्क की किसी बड़ी रक्त वाहिका में थक्का फंस गया है तो चुनिंदा मरीजों में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी की जा सकती है। यह एक आधुनिक न्यूरोइंटरवेंशनल प्रक्रिया है। इसमें कैथेटर को रक्त वाहिका के माध्यम से प्रभावित स्थान तक पहुंचाया जाता है और विशेष उपकरण की मदद से थक्के को बाहर निकालने की कोशिश की जाती है। उचित मरीजों में यह प्रक्रिया शुरुआती घंटों के अलावा इमेजिंग के आधार पर कुछ मामलों में 24 घंटे तक भी की जा सकती है।
ब्रेन इमेजिंग: सीटी स्कैन, सीटी एंजियोग्राफी, सीटी परफ्यूजन और एमआरआई जैसी जांचें स्ट्रोक के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनसे यह पता लगाया जाता है कि मस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ है या रक्त प्रवाह बाधित हुआ है। साथ ही यह भी समझने में मदद मिलती है कि मस्तिष्क का कितना हिस्सा प्रभावित हुआ है और कितना हिस्सा उपचार से बचाया जा सकता है। इन जांचों के आधार पर डॉक्टर मरीज के लिए सबसे उपयुक्त उपचार तय करते हैं।
ब्रेन हेमरेज में भी समय पर उपचार है जरूरी
यह समझना जरूरी है कि हर स्ट्रोक का कारण रक्त का थक्का नहीं होता। कुछ मरीजों में मस्तिष्क की रक्त वाहिका फटने से रक्तस्राव होता है, जिसे ब्रेन हेमरेज कहा जाता है। ऐसी स्थिति में मरीज की हालत तेजी से गंभीर हो सकती है।
इसका उपचार रक्तस्राव के कारण, उसकी मात्रा, स्थान और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। कई मामलों में रक्तचाप को नियंत्रित करना, खून पतला करने वाली दवाओं के प्रभाव को उलटना और मस्तिष्क पर बढ़ते दबाव को कम करना जरूरी होता है। कुछ मरीजों में न्यूरोसर्जरी या एंडोवैस्कुलर तकनीकों की मदद से उपचार किया जा सकता है। यदि ब्रेन एन्यूरिज्म के फटने से रक्तस्राव हुआ है तो विशेष प्रक्रिया के जरिए उसे सुरक्षित करना भी आवश्यक हो सकता है।
स्ट्रोक के बाद रिकवरी में रिहैबिलिटेशन की अहम भूमिका
स्ट्रोक का उपचार केवल शुरुआती इमरजेंसी तक सीमित नहीं है। इसके बाद मरीज की रिकवरी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। कुछ मरीजों को हाथ-पैर चलाने, बोलने, खाना निगलने, याददाश्त और रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है।
ऐसे मामलों में फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी और स्पीच थेरेपी की मदद ली जाती है। मरीज की स्थिति के अनुसार रिहैबिलिटेशन की प्रक्रिया शुरू की जाती है। नियमित अभ्यास, परिवार का सहयोग और डॉक्टरों की सलाह से कई मरीज अपनी कार्यक्षमता में सुधार कर सकते हैं। रिकवरी की गति हर मरीज में अलग-अलग हो सकती है, इसलिए धैर्य और नियमित उपचार जरूरी है।
स्ट्रोक से बचाव के लिए जीवनशैली में करें जरूरी बदलाव
स्ट्रोक के कई जोखिम कारकों को नियंत्रित किया जा सकता है। इनमें हाई ब्लड प्रेशर सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में से एक है। इसके अलावा डायबिटीज, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, धूम्रपान, शारीरिक निष्क्रियता और हृदय से जुड़ी कुछ बीमारियां भी स्ट्रोक का खतरा बढ़ा सकती हैं।
स्ट्रोक से बचाव के लिए कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराएं और इसे नियंत्रित रखें।
- डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल की नियमित निगरानी करें।
- धूम्रपान और तंबाकू का सेवन पूरी तरह छोड़ें।
- रोजाना कम से कम 30 मिनट शारीरिक गतिविधि या व्यायाम करें।
- संतुलित आहार लें और खाने में नमक, अत्यधिक वसा तथा प्रोसेस्ड फूड की मात्रा सीमित रखें।
- वजन को स्वस्थ सीमा में बनाए रखने की कोशिश करें।
- पर्याप्त नींद लें और तनाव को नियंत्रित रखने के उपाय अपनाएं।
- हृदय की बीमारियों, विशेषकर अनियमित धड़कन (एट्रियल फिब्रिलेशन) का समय पर उपचार कराएं।
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहें।
जागरूकता और समय पर कार्रवाई से बच सकती हैं लाखों जिंदगियां
स्ट्रोक किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, बढ़ती उम्र के साथ इसका खतरा बढ़ता है, लेकिन युवाओं में भी हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, धूम्रपान और अन्य जोखिम कारकों के कारण स्ट्रोक के मामले सामने आ सकते हैं।
इसलिए यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि स्ट्रोक केवल बुजुर्गों को होता है। परिवार के हर सदस्य को इसके शुरुआती लक्षणों की जानकारी होनी चाहिए। विशेष रूप से B.E. F.A.S.T. के संकेतों को याद रखना और आपातकालीन स्थिति में सही निर्णय लेना बेहद जरूरी है।
स्ट्रोक के मामले में सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि समय पर पहचान, तुरंत अस्पताल पहुंचना और सही उपचार मरीज की जिंदगी बदल सकता है। लक्षणों के अपने आप ठीक होने का इंतजार न करें और न ही घरेलू उपचार के भरोसे रहें। हर मिनट कीमती है। सही समय पर उठाया गया कदम न केवल मरीज की जान बचा सकता है, बल्कि उसे जीवनभर की विकलांगता से बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।















