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संसद नहीं, फिर भी महाभियोग! खरगे के घर सजेगा सियासी अखाड़ा, प्रियंका संभालेंगी कमान; पर्दे के पीछे तैयार हुई विपक्ष की पूरी पटकथा

“कहीं अदालत का डर, कहीं संसद की मर्यादा और कहीं बीजेपी के हमले का अंदेशा… आखिर INDIA गठबंधन ने क्यों चुना ‘सार्वजनिक महाभियोग’ का रास्ता? खरगे के आवास पर जुटेंगे विपक्षी सांसद, लगेगा कैमरों का पहरा और शुरू होगा ऐसा सियासी मंचन, जिसकी पटकथा तैयार करने में नेताओं को खूब पसीना बहाना पड़ा।”

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में विरोध दर्ज कराने के तरीके अब केवल संसद के भीतर हंगामे, सदन से बहिर्गमन, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सड़कों पर प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह गए हैं। अब विरोध को एक ऐसा मंच भी चाहिए, जहां कैमरे हों, संवाद हों, प्रतीक हों और सबसे बढ़कर जनता तक पहुंचने वाला एक सधा हुआ राजनीतिक संदेश हो। इसी नई सियासी शैली की एक दिलचस्प मिसाल बनने जा रहा है INDIA गठबंधन का प्रस्तावित ‘सार्वजनिक महाभियोग’ कार्यक्रम।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष ने जिस तरह का राजनीतिक आयोजन करने की तैयारी की है, उसने दिल्ली के सियासी गलियारों में उत्सुकता बढ़ा दी है। कार्यक्रम का आयोजन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आधिकारिक आवास पर किया जाना है। यहां संसद जैसी कार्यवाही का माहौल तैयार किया जा रहा है। मंच होगा, अध्यक्ष होंगे, नेताओं के भाषण होंगे, आरोपों की फेहरिस्त होगी और अंत में एक प्रस्ताव भी पारित किया जाएगा।

यानी संसद का पूरा राजनीतिक रंगमंच, लेकिन संसद भवन के बाहर!

इस आयोजन की सबसे दिलचस्प बात सिर्फ यह नहीं है कि विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ एक असामान्य कार्यक्रम करने जा रहा है, बल्कि असली कहानी उस राजनीतिक उधेड़बुन में छिपी है, जिसमें यह तय किया गया कि कार्यक्रम को आखिर नाम क्या दिया जाए। क्योंकि विपक्ष को विरोध भी करना था, जनता का ध्यान भी खींचना था और ऐसा कोई कदम भी नहीं उठाना था, जिसे बीजेपी संसद की मर्यादा या न्यायपालिका के सम्मान से जोड़कर उसके खिलाफ इस्तेमाल कर सके।

कहने का मतलब साफ है—विरोध की पटकथा लिखना जितना आसान था, उसके शीर्षक पर सहमति बनाना उससे कहीं ज्यादा मुश्किल निकला।

तीन नाम, तीन विचार और आखिरकार तीसरे रास्ते पर लगी मुहर

सूत्रों के मुताबिक, कार्यक्रम की रूपरेखा तय करने के लिए INDIA गठबंधन के नेताओं के बीच हुई चर्चाओं में तीन अलग-अलग विचार सामने आए। तीनों के पीछे अपनी राजनीतिक सोच थी, लेकिन हर विचार के साथ एक न एक ऐसा जोखिम जुड़ा था, जिसने नेताओं को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया।

पहला विचार था ‘मॉक पार्लियामेंट’ का।

इस प्रस्ताव के तहत खरगे के आवास पर बाकायदा संसद जैसा ढांचा तैयार करने की योजना थी। इसमें अलग-अलग नेताओं को सत्ता पक्ष, विपक्ष, स्पीकर और यहां तक कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका भी दी जा सकती थी। कार्यवाही संसद की तर्ज पर होती और पूरा कार्यक्रम एक तरह से राजनीतिक नाट्य प्रस्तुति का रूप ले लेता।

लेकिन यहीं से मुश्किल शुरू हुई।

गठबंधन के कुछ नेताओं को लगा कि संसद की हूबहू नकल करना राजनीतिक रूप से उलटा पड़ सकता है। बीजेपी को बैठे-बिठाए यह कहने का मौका मिल सकता था कि विपक्ष देश की सर्वोच्च विधायी संस्था की मर्यादा का मजाक बना रहा है।

विपक्ष के सामने सवाल था कि जिस संसद में वह अपनी आवाज उठाने की बात करता है, उसी की नकल करके बाहर एक समानांतर संसद खड़ी करना कहीं उसके लिए राजनीतिक परेशानी न बन जाए।

लिहाजा पहला विचार चर्चा में तो खूब रहा, लेकिन अंतिम मंजिल तक नहीं पहुंच सका।

दूसरा विचार था ‘पब्लिक कोर्ट’ लगाने का।

इसमें अदालत जैसा माहौल बनाने की कल्पना की गई थी। आरोप पत्र पढ़ा जाता, पक्ष-विपक्ष की ओर से दलीलें दी जातीं, बहस होती और अंत में एक तरह का सार्वजनिक फैसला सुनाया जाता।

राजनीतिक लिहाज से यह विचार काफी आकर्षक था। जनता के सामने आरोपों को विस्तार से रखने और चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाने का एक नाटकीय अवसर मिल सकता था।

लेकिन यहां भी कानूनी पेचीदगियों ने रास्ता रोक लिया।

सूत्रों के अनुसार, नेताओं के बीच यह आशंका सामने आई कि चूंकि चुनाव आयोग से जुड़े कुछ मुद्दे न्यायिक विचाराधीन हैं, ऐसे में अदालत की तर्ज पर सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करना अनावश्यक विवाद खड़ा कर सकता है। विपक्ष नहीं चाहता था कि उसके राजनीतिक विरोध का पूरा विमर्श न्यायपालिका के सम्मान और अदालत की अवमानना जैसे सवालों में उलझ जाए।

आखिरकार ‘पब्लिक कोर्ट’ का विचार भी ठंडे बस्ते में चला गया।

तीसरा विचार था—‘सार्वजनिक महाभियोग’।

यहीं आकर गठबंधन की तलाश को मंजिल मिली।

इस नाम में विरोध की गंभीरता भी थी, राजनीतिक संदेश भी और कार्यक्रम को एक प्रतीकात्मक स्वरूप देने की गुंजाइश भी। इसके तहत संसद जैसी कार्यवाही तो होगी, लेकिन इसे न तो वास्तविक संसद बताया जाएगा और न ही अदालत।

यानी मंच राजनीतिक होगा, कार्यवाही प्रतीकात्मक होगी और निशाना सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर साधा जाएगा।

यही वह नाम है, जिस पर अंततः सहमति बनने की बात सामने आई। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश की ओर से भी इसे ‘मॉक पार्लियामेंट’ के बजाय ‘सार्वजनिक महाभियोग’ के रूप में संबोधित किया गया।

राजनीतिक रणनीति का यह हिस्सा अपने आप में दिलचस्प है। पहले आयोजन का स्वरूप तय हुआ, फिर उसके नाम को लेकर बहस चली और अंत में ऐसा शब्द चुना गया, जो विपक्ष के विरोध को ज्यादा गंभीर और प्रभावशाली रूप दे सके।

हालांकि एक बात समझना जरूरी है कि यह कोई वास्तविक संवैधानिक महाभियोग नहीं होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान और संसद के निर्धारित नियमों के तहत ही हो सकती है। किसी राजनीतिक दल या गठबंधन की ओर से आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रम का कोई संवैधानिक या कानूनी प्रभाव नहीं होगा। यह मूलतः राजनीतिक विरोध और प्रतीकात्मक कार्रवाई होगी।

प्रियंका गांधी के हाथ में होगी पूरी पटकथा की कमान

इस पूरे आयोजन में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है। कार्यक्रम को केवल नेताओं के भाषणों तक सीमित रखने के बजाय ऐसा स्वरूप देने की तैयारी है, जिसमें राजनीतिक संदेश के साथ नाटकीयता और जनसंचार की रणनीति भी दिखाई दे।

प्रियंका गांधी को संगठनात्मक और राजनीतिक कार्यक्रमों के संचालन का अनुभव है। ऐसे में उनकी भूमिका कार्यक्रम को एक व्यवस्थित रूप देने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

यहां विपक्ष के सामने दोहरी चुनौती है। पहली, चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों और सवालों को जनता के सामने मजबूती से रखना। दूसरी, पूरे आयोजन को इतना प्रभावशाली बनाना कि उसका संदेश केवल खरगे के आवास की चारदीवारी तक सीमित न रह जाए।

क्योंकि आज की राजनीति में केवल बयान देना पर्याप्त नहीं है। बयान का दृश्य भी चाहिए, दृश्य का प्रसारण भी और प्रसारण के बाद उसकी राजनीतिक गूंज भी।

खरगे का आवास बनेगा सियासी मंच, 150 से 200 सांसदों के जुटने की उम्मीद

कार्यक्रम को बड़े स्तर पर आयोजित करने की तैयारी है। जानकारी के मुताबिक, इसमें विपक्षी गठबंधन के करीब 150 से 200 सांसदों के शामिल होने की उम्मीद है।

इतनी बड़ी संख्या में सांसदों की मौजूदगी अपने आप में राजनीतिक संदेश देने की कोशिश होगी। विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ उसके सवाल किसी एक दल या किसी एक नेता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गठबंधन के कई घटक दल इस मुद्दे पर एक साथ खड़े हैं।

मल्लिकार्जुन खरगे का आधिकारिक आवास इस आयोजन का केंद्र बनेगा। यहां संसद जैसी कार्यवाही के अनुरूप मंच और बैठने की व्यवस्था तैयार की जा रही है। नेताओं को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा और प्रस्ताव के जरिए गठबंधन अपनी सामूहिक राजनीतिक राय सामने रखेगा।

कार्यक्रम का प्रस्तावित समय दोपहर 3:30 बजे से शाम 6 बजे तक रखा गया है।

लेकिन इस पूरे आयोजन का सबसे आधुनिक और शायद सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होगा इसका लाइव प्रसारण।

कैमरों की नजर में होगा हर संवाद, हर इशारा और हर राजनीतिक संदेश

कार्यक्रम स्थल पर मल्टी-कैमरा सेटअप लगाने की तैयारी है, ताकि इसकी कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया जा सके।

इसका मतलब साफ है कि विपक्ष की नजर केवल वहां मौजूद सांसदों पर नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों पर भी है, जो इस आयोजन को अपने मोबाइल, टीवी या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर देख सकते हैं।

कैमरे नेताओं के भाषण रिकॉर्ड करेंगे, मंच की गतिविधियों को दिखाएंगे और कार्यक्रम के अलग-अलग हिस्सों को जनता तक पहुंचाएंगे।

राजनीतिक दृष्टि से यह व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण है। विपक्ष जानता है कि आज किसी राजनीतिक आयोजन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि उसमें कितने नेता पहुंचे, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि उसका संदेश कितनी दूर तक पहुंचा।

150 से 200 सांसदों की मौजूदगी एक तस्वीर बनाएगी, लेकिन मल्टी-कैमरा प्रसारण उस तस्वीर को देशव्यापी राजनीतिक संदेश में बदलने की कोशिश करेगा।

शाम 6 बजे कार्यक्रम समाप्त होने के बाद नेताओं के लिए नाश्ते की व्यवस्था भी रखी गई है। इस तरह दिनभर की राजनीतिक गंभीरता के बाद आयोजन का समापन अनौपचारिक मुलाकातों और बातचीत के साथ होगा।

असली लड़ाई महाभियोग की नहीं, राजनीतिक नैरेटिव की है

इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक अनोखे कार्यक्रम के रूप में देखना शायद अधूरा होगा। इसके पीछे विपक्ष की एक बड़ी राजनीतिक रणनीति भी दिखाई देती है।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे सवाल भारतीय राजनीति में बेहद संवेदनशील हैं। विपक्ष लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और कथित वोट चोरी जैसे मुद्दों पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सार्वजनिक मंच तैयार करना उसी राजनीतिक अभियान को अधिक संगठित और दृश्यात्मक रूप देने की कोशिश है।

विपक्ष इस आयोजन के माध्यम से अपने आरोपों को एक सामूहिक राजनीतिक आवाज देना चाहता है। वहीं बीजेपी के लिए भी यह कार्यक्रम जवाबी हमले का अवसर बन सकता है। वह इसे राजनीतिक नाटक, संस्थाओं पर दबाव बनाने की कोशिश या संवैधानिक प्रक्रियाओं से बाहर जाकर समानांतर व्यवस्था खड़ी करने का प्रयास बता सकती है।

इस तरह आयोजन शुरू होने से पहले ही इसके इर्द-गिर्द राजनीतिक बहस का मंच तैयार हो चुका है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कार्यक्रम जनता के बीच चुनाव आयोग को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर गंभीर चर्चा पैदा कर पाएगा या फिर यह भी भारतीय राजनीति के उन आयोजनों में शामिल हो जाएगा, जहां आरोप ज्यादा सुनाई देते हैं और जवाब कम?

क्या विपक्ष अपने आरोपों को ठोस तथ्यों के साथ जनता के सामने रख पाएगा? क्या गठबंधन के सभी दल एक सुर में बोलेंगे? और क्या कार्यक्रम का नाटकीय स्वरूप उसके मूल राजनीतिक संदेश पर भारी पड़ जाएगा?

इन सवालों के जवाब कार्यक्रम के दौरान ही मिलेंगे।

संसद के बाहर महाभियोग का मंच, लेकिन सियासी निशाना कितना सटीक?

दिल्ली की राजनीति में इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि विपक्ष ने विरोध को एक अलग दृश्यात्मक रूप देने का फैसला किया है। संसद में बहस के बजाय संसद जैसी बहस का प्रतीकात्मक मंच, अदालत के बजाय सार्वजनिक राजनीतिक कार्यवाही और संवैधानिक प्रक्रिया के बजाय जनता के सामने राजनीतिक आरोपों की प्रस्तुति।

यह सब अपने आप में बताता है कि राजनीतिक दल अब केवल मुद्दे नहीं उठाते, वे उन मुद्दों को प्रस्तुत करने के तरीके पर भी उतनी ही मेहनत करते हैं।

खरगे के आवास पर तैयार हो रहा यह मंच इसलिए भी चर्चा में है कि इसके पीछे सिर्फ एक दिन के कार्यक्रम की तैयारी नहीं, बल्कि नाम, स्वरूप, कानूनी सीमाओं और मीडिया रणनीति पर हुई लंबी माथापच्ची की कहानी भी है।

फिलहाल विपक्ष ने अपनी पटकथा तैयार कर ली है। मंच सज रहा है, कैमरे लगाए जा रहे हैं और सांसदों के जुटने की तैयारी है। प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कार्यक्रम को प्रभावशाली बनाने की कोशिश होगी।

अब देखना यह है कि शाम तक इस राजनीतिक मंच से निकला संदेश कितना दूर जाता है।

क्योंकि भारतीय राजनीति में महाभियोग का यह नया संस्करण भले ही संवैधानिक प्रक्रिया न हो, लेकिन इसका राजनीतिक मकसद बिल्कुल साफ है—मुख्य चुनाव आयुक्त पर सवाल उठाना, चुनाव आयोग को बहस के केंद्र में लाना और जनता के सामने विपक्ष की एकजुटता का प्रदर्शन करना।

फिलहाल दिल्ली में एक सवाल सबसे दिलचस्प है—जब संसद भवन के बाहर महाभियोग का मंच सज रहा है, तो क्या इस राजनीतिक नाटक का असली फैसला मंच पर होगा या जनता की अदालत में?

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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