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नाला गंदा, योजनाएं चमकदार! लोहिया ड्रेन की सफाई के नाम पर करोड़ों की तैयारी, जवाबदेही किसकी?

“ग्रेटर नोएडा के लोहिया उर्फ हवेलिया ड्रेन की सफाई के नाम पर दोहरी कवायद, करोड़ों की योजनाओं और सरकारी दावों के बीच उलझा प्रदूषण का असली सवाल”

जब एक बरसाती नाला वर्षों से औद्योगिक गंदगी ढोते हुए हिंडन नदी को प्रदूषित कर रहा हो, तब उम्मीद होती है कि सरकार उसकी सफाई का ठोस इंतजाम करेगी। लेकिन ग्रेटर नोएडा में कहानी कुछ दूसरी ही दिखाई देती है। यहां नाले की गंदगी से ज्यादा दिलचस्प उसकी सफाई के नाम पर चल रही सरकारी कवायद है। एक तरफ उत्तर प्रदेश राज्य परिवर्तन आयोग की पहल पर गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के माध्यम से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कराने की प्रक्रिया, दूसरी तरफ ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की अपनी सफाई और सौंदर्यीकरण योजना। सवाल सीधा है—जब नाला एक है, तो क्या उसकी सफाई के नाम पर सरकारी सोच, सलाहकार और बजट भी अलग-अलग चलेंगे? और सबसे अहम, जनता के पैसे से आखिर साफ क्या होगा—नाला या सरकारी फाइलें?

नाला बदबू मार रहा है, सरकारी व्यवस्था अपनी-अपनी धुन में मगन है

ग्रेटर नोएडा में सूरजपुर की ओर बहने वाला यह बरसाती नाला आम लोगों के बीच लोहिया खाल या लोहिया नाले के नाम से जाना जाता है। कुछ लोग इसे हवेलिया ड्रेन भी कहते हैं। नाम का यह अंतर भले ही आम आदमी के लिए बहुत मायने न रखता हो, लेकिन सरकारी योजनाओं की दुनिया में नाम, विभाग और परियोजना की अलग-अलग पहचान कभी-कभी पूरी कहानी का रुख बदल देती है।

नोएडा-दादरी रोड पर सूरजपुर से लगभग दो किलोमीटर दादरी की दिशा में आगे बढ़ने पर यह नाला सड़क को पार करता है। इसके उद्गम की पूरी पड़ताल किए बिना भी इसकी दुर्दशा समझी जा सकती है। सूरजपुर वेटलैंड का पानी इसमें बहता है। सड़क पार करते ही उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) का साइट-बी और साइट-सी औद्योगिक क्षेत्र पड़ता है। यहां की औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला प्रदूषित पानी और गंदगी इस नाले की समस्या को और गंभीर बनाते हैं।

सरकारी दावों पर गौर करें तो औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं और संबंधित विभाग उनके संचालन की निगरानी भी करते हैं। लेकिन जमीन पर नतीजा ऐसा है कि नाले के आसपास से गुजरने वाला व्यक्ति बदबू से बचने के लिए नाक पर रूमाल रखने को मजबूर हो जाता है।

यही वह बुनियादी सवाल है, जिसका जवाब वर्षों से मिलना चाहिए था। यदि औद्योगिक इकाइयों के प्रदूषण नियंत्रण संयंत्र वास्तव में नियमों के मुताबिक काम कर रहे हैं, तो नाले में इतनी दुर्गंध और प्रदूषण कहां से आ रहा है? और यदि व्यवस्था में कहीं खामी है, तो उस पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती?

सरकारी प्रमाणपत्र अपनी जगह हैं, लेकिन नाले की दुर्गंध जमीन पर मौजूद प्रमाण है। इस प्रमाण को किसी जांच रिपोर्ट से खारिज नहीं किया जा सकता; इसका वैज्ञानिक परीक्षण और जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।

आगे बढ़ते ही गंदगी का दूसरा अध्याय खुल जाता है

सूरजपुर-कासना रोड के समानांतर सेक्टर पी-4 पुल के नीचे इकोटेक-3 की ओर से आने वाला एक और गंदा नाला इसमें मिल जाता है। इसके बाद दोनों नाले अपनी-अपनी गंदगी का बोझ लेकर आगे बढ़ते हैं और अंततः हिंडन नदी में जा गिरते हैं।

अर्थात मामला सिर्फ एक बदबूदार नाले का नहीं है। यह औद्योगिक प्रदूषण, शहरी जल निकासी, अपशिष्ट प्रबंधन और नदी की स्वच्छता से जुड़ा हुआ सवाल है। जिस पानी को उपचारित करके सुरक्षित ढंग से आगे भेजा जाना चाहिए, वह यदि प्रदूषित अवस्था में नदी तक पहुंच रहा है, तो समस्या का समाधान नाले के किनारे सुंदर रास्ता बनाने भर से नहीं होगा।

हिंडन नदी की सेहत का सवाल भी इसी नाले से जुड़ा है। नदी को साफ करने की घोषणाएं तब तक अधूरी रहेंगी, जब तक उसमें पहुंचने वाले प्रदूषित पानी के स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होगा।

लेकिन ग्रेटर नोएडा की सरकारी व्यवस्था में इस सीधे-सादे सवाल का जवाब तलाशने से पहले परियोजनाओं का एक दिलचस्प सिलसिला सामने आ रहा है।

दो विभागीय रास्ते, एक नाला और करोड़ों का हिसाब

ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण इस नाले की सफाई पर पिछले कई वर्षों से विचार करता रहा है। अब उत्तर प्रदेश राज्य परिवर्तन आयोग यानी प्रदेश के नीति-निर्धारण से जुड़े इस निकाय की निगाह भी इस नाले पर पड़ी है। आयोग की पहल पर गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय को इसकी सफाई से संबंधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कराने की जिम्मेदारी सौंपे जाने की जानकारी सामने आई है।

सूत्रों के अनुसार, डीपीआर तैयार कराने के लिए विश्वविद्यालय को दो करोड़ रुपये दिए गए हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि डीपीआर बनाना और नाले की वास्तविक सफाई करना दो अलग-अलग काम हैं। डीपीआर में समस्या का आकलन, तकनीकी विकल्प, अनुमानित लागत, कार्ययोजना और क्रियान्वयन की रूपरेखा तय की जाती है। वह स्वयं सफाई का काम नहीं करती।

यहीं से सवालों की फेहरिस्त लंबी होने लगती है।

यदि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक विश्वविद्यालय के पास इस तरह के नाला-शोधन कार्यों का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है, तो उसकी तकनीकी क्षमता का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया? क्या परियोजना सौंपने से पहले विशेषज्ञता, पूर्व अनुभव और परिणाम देने की क्षमता की जांच हुई? क्या विश्वविद्यालय के पास पर्याप्त विशेषज्ञ और संसाधन उपलब्ध हैं, या उसे इस काम के लिए दूसरे संस्थानों और निजी एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ेगा?

बताया जाता है कि विश्वविद्यालय ने पहले रुड़की स्थित एक प्रौद्योगिकी संस्थान से संपर्क साधा। अब निविदा प्रक्रिया के जरिए एक निजी फर्म को लगभग 44.80 लाख रुपये में डीपीआर तैयार करने का काम दिए जाने की प्रक्रिया चल रही है।

यदि ये आंकड़े और प्रक्रियागत विवरण आधिकारिक दस्तावेजों से पुष्ट होते हैं, तो एक अहम सवाल सामने आता है—जब डीपीआर बनाने का काम अंततः किसी निजी तकनीकी फर्म से कराया जाना है, तब विश्वविद्यालय को दी गई दो करोड़ रुपये की राशि का पूरा उपयोग किस मद में होगा? विश्वविद्यालय की भूमिका क्या होगी? तकनीकी परामर्श, सर्वेक्षण, निगरानी, प्रशासनिक समन्वय या किसी अन्य कार्य के लिए कितनी राशि निर्धारित है?

इन सवालों का उत्तर देना जरूरी है। केवल किसी राशि और दूसरी राशि के बीच अंतर दिखाकर अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन सार्वजनिक धन से चलने वाली परियोजना में लागत का स्पष्ट ब्योरा, कार्य-विभाजन और जवाबदेही न हो, तो संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।

सरकारी धन खर्च करने का अर्थ सिर्फ बजट स्वीकृत करना नहीं होता। उसका अर्थ यह भी है कि जनता को बताया जाए कि पैसा किस काम पर, किसके माध्यम से और किस अपेक्षित परिणाम के लिए खर्च किया जा रहा है।

उधर प्राधिकरण की अपनी योजना: नाला साफ भी होगा और सुंदर भी बनेगा!

अब कहानी का दूसरा पक्ष देखिए।

ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण इसी नाले को लोहिया नाला मानते हुए इसकी सफाई और सौंदर्यीकरण के लिए लगभग 20 करोड़ रुपये की परियोजना तैयार कर रहा है। प्रस्तावित योजना के अनुसार, सेक्टर गामा-1 के पीछे लगभग 700 मीटर लंबे हिस्से को एक विशेष तकनीक से पक्का करने की बात है। दावा है कि इससे नाले में बहने वाला गंदा पानी स्वतः साफ हो सकेगा। इसके साथ नाले के दोनों किनारों को विकसित करके टहलने योग्य बनाया जाएगा और वहां प्रकाश व्यवस्था भी की जाएगी।

योजना सुनने में आकर्षक है। प्रदूषण भी कम हो, बदबू भी खत्म हो, किनारे सुंदर हों और लोग शाम को सैर भी कर सकें—इससे बेहतर तस्वीर भला क्या होगी?

लेकिन सरकारी परियोजनाओं में सबसे महत्वपूर्ण सवाल अक्सर सबसे कम आकर्षक होता है: पानी साफ करने का वैज्ञानिक आधार क्या है?

नाले को पक्का कर देना अपने आप में प्रदूषित पानी का उपचार नहीं है। किनारों पर रोशनी लगा देना प्रदूषण नियंत्रण नहीं है। पैदल पथ बना देना औद्योगिक अपशिष्ट के उपचार का विकल्प नहीं है। यदि प्रस्तावित विशेष तकनीक वास्तव में पानी को साफ करने में सक्षम है, तो उसके काम करने का वैज्ञानिक आधार, उपचार की क्षमता, रखरखाव की जरूरत, संचालन लागत और अपेक्षित जल गुणवत्ता सार्वजनिक की जानी चाहिए।

कौन-से प्रदूषक हटेंगे? क्या औद्योगिक अपशिष्ट के लिए तकनीक पर्याप्त होगी? क्या उपचारित पानी निर्धारित पर्यावरणीय मानकों पर खरा उतरेगा? बारिश के मौसम में पानी की मात्रा बढ़ने पर व्यवस्था कैसे काम करेगी? और सबसे महत्वपूर्ण, उपचार के बाद निकलने वाले अवशेषों का निस्तारण कैसे होगा?

इन सवालों का जवाब किसी तकनीकी रिपोर्ट और परीक्षण के आधार पर मिलना चाहिए, न कि केवल परियोजना के आकर्षक वर्णन से।

एसटीपी ही समाधान है—क्या तकनीकी निष्कर्ष पहले से तय कर लिया गया?

इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प पहलू डीपीआर की कथित शर्तों से जुड़ा है।

जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश राज्य परिवर्तन आयोग की ओर से विश्वविद्यालय को मौखिक निर्देश दिए गए हैं कि डीपीआर तैयार करने वाली फर्म इस नाले की सफाई के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाने का सुझाव दे। दूसरी ओर, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण का अभियांत्रिकी विभाग नाले की सफाई के लिए एसटीपी लगाने के विचार से सहमत नहीं बताया जा रहा है।

यदि यह जानकारी सही है, तो सवाल केवल तकनीक चुनने का नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया का भी है।

डीपीआर का मूल उद्देश्य ही यह पता लगाना है कि किसी समस्या का सबसे प्रभावी, व्यावहारिक और आर्थिक रूप से उचित समाधान क्या हो सकता है। इसके लिए विभिन्न तकनीकी विकल्पों का परीक्षण होना चाहिए। यदि रिपोर्ट तैयार होने से पहले ही किसी एक विकल्प की सिफारिश करने का निर्देश दे दिया जाए, तो स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन की गुंजाइश कितनी बचेगी?

एसटीपी उपयोगी समाधान हो सकता है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नाले में किस तरह का पानी आ रहा है, उसकी मात्रा कितनी है, प्रदूषकों की प्रकृति क्या है और उपचार के बाद पानी का उपयोग या निस्तारण कैसे किया जाएगा। औद्योगिक अपशिष्ट के मामले में केवल सामान्य सीवेज उपचार पर्याप्त होगा या नहीं, यह जांच का विषय है। जरूरत पड़ने पर औद्योगिक इकाइयों के स्तर पर पूर्व-उपचार और अन्य व्यवस्थाएं भी आवश्यक हो सकती हैं।

इसलिए सवाल एसटीपी के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। सवाल यह है कि तकनीक का चयन वैज्ञानिक जांच से होगा या पहले से तय प्रशासनिक पसंद के आधार पर?

यदि आयोग और प्राधिकरण के बीच तकनीकी मतभेद हैं, तो उन्हें छिपाने के बजाय सार्वजनिक किया जाना चाहिए। आखिरकार, खर्च जनता का है और प्रदूषण का असर भी जनता ही झेल रही है।

राजनीतिक पर्दे के पीछे की कहानी: काम से पहले कागजों की प्रतिस्पर्धा?

इस पूरे घटनाक्रम को किसी एक अधिकारी की मंशा या किसी संस्था की नीयत पर टिप्पणी करके समझना आसान है, लेकिन वास्तविक प्रश्न इससे कहीं बड़ा है। सरकारी व्यवस्था में जब एक ही समस्या पर अलग-अलग संस्थाएं अपनी-अपनी परियोजनाएं तैयार करने लगती हैं, तो समन्वय और जवाबदेही का सवाल अपने आप खड़ा होता है।

एक ओर नीति-स्तर का निकाय डीपीआर तैयार कराने की पहल करता है। दूसरी ओर विकास प्राधिकरण अपनी परियोजना बनाता है। विश्वविद्यालय तकनीकी जिम्मेदारी संभालता है और निजी फर्म से रिपोर्ट तैयार कराने की प्रक्रिया चलती है। इस बीच नाला पहले की तरह बहता रहता है और प्रदूषित पानी हिंडन तक पहुंचता रहता है।

यहीं जनता का संदेह जन्म लेता है।

क्या दोनों योजनाओं का कोई साझा तकनीकी आधार है? क्या एक ही सर्वेक्षण और जल-गुणवत्ता के आंकड़ों का इस्तेमाल होगा? क्या दोनों परियोजनाओं के कार्यक्षेत्र अलग-अलग निर्धारित किए गए हैं? क्या यह तय है कि डीपीआर तैयार होने के बाद प्राधिकरण अपनी मौजूदा योजना में जरूरी बदलाव करेगा? या फिर दोनों संस्थाएं अलग-अलग दिशा में आगे बढ़ेंगी और बाद में समन्वय की जिम्मेदारी किसी तीसरे कार्यालय पर छोड़ दी जाएगी?

इन प्रश्नों का उत्तर मिलने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह पूछना पूरी तरह जायज है कि सरकारी परियोजनाओं में समन्वय की जिम्मेदारी आखिर किसकी है।

लोकतंत्र में पारदर्शिता का अर्थ केवल निविदा प्रकाशित कर देना नहीं है। पारदर्शिता का अर्थ है कि जनता समझ सके कि निर्णय क्यों लिया गया, विकल्पों में से किसी एक को क्यों चुना गया और खर्च की गई राशि से क्या हासिल होगा।

असली परीक्षा नाले के किनारे नहीं, सरकारी जवाबदेही के भीतर है

सेक्टर गामा-1 में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों की आवासीय कॉलोनी के ठीक पीछे से यह नाला गुजरता है। वहां इसकी दुर्गंध महसूस होती है। विडंबना यह है कि जिस समस्या को आसपास रहने वाले लोग रोज झेलते हैं, उसके समाधान के लिए सरकारी तंत्र को वर्षों से योजनाओं, प्रस्तावों और तकनीकी विकल्पों की जरूरत पड़ रही है।

अब समय आ गया है कि इस पूरी प्रक्रिया के कुछ बुनियादी सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाएं।

पहला, डीपीआर के लिए स्वीकृत दो करोड़ रुपये की राशि का मदवार विवरण क्या है और विश्वविद्यालय तथा निजी फर्म की जिम्मेदारियां किस प्रकार विभाजित हैं?

दूसरा, लगभग 44.80 लाख रुपये की निविदा किस चरण में है, उसका कार्यक्षेत्र क्या है और रिपोर्ट पूरी करने की समयसीमा क्या निर्धारित की गई है?

तीसरा, प्राधिकरण की लगभग 20 करोड़ रुपये की परियोजना और आयोग की पहल पर तैयार हो रही डीपीआर के बीच समन्वय कैसे किया जाएगा?

चौथा, नाले में आने वाले औद्योगिक अपशिष्ट के स्रोतों की पहचान, जल-गुणवत्ता की जांच और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों की जवाबदेही तय करने की योजना क्या है?

पांचवां, यदि एसटीपी को समाधान माना जा रहा है, तो उसकी क्षमता, स्थान, संचालन लागत और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप प्रदर्शन की गारंटी क्या होगी? और यदि प्राधिकरण किसी दूसरी तकनीक को बेहतर मानता है, तो उसके पक्ष में उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण क्या हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर किसी आरोप का खंडन करने के लिए ही नहीं, बल्कि जनता के धन का उचित इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए भी जरूरी हैं।

निष्कर्ष: नाले को नाम नहीं, इलाज चाहिए

लोहिया नाला हो या हवेलिया ड्रेन, नाम बदलने से उसके पानी की गुणवत्ता नहीं बदलती। उसे किसी नई परियोजना के नाम से पुकारने से बदबू कम नहीं होती। डीपीआर की फाइल मोटी होने से प्रदूषण पतला नहीं पड़ता और करोड़ों रुपये का बजट घोषित करने भर से नदी स्वच्छ नहीं हो जाती।

ग्रेटर नोएडा को इस नाले के लिए एक ऐसी समेकित योजना चाहिए, जिसमें प्रदूषण के स्रोतों की पहचान हो, जल-गुणवत्ता के आंकड़ों के आधार पर तकनीक चुनी जाए, जिम्मेदार संस्थाओं के काम स्पष्ट हों और निर्धारित समय में वास्तविक परिणाम हासिल किए जाएं। सफाई के साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि औद्योगिक गंदगी दोबारा नाले में न पहुंचे।

जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकारी धन से बनने वाली परियोजना का लाभ किसे मिलेगा और उसकी सफलता कैसे मापी जाएगी। यदि नाला साफ नहीं हुआ, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? यदि अनुमानित लागत बढ़ गई, तो जवाब कौन देगा? और यदि दो योजनाएं एक ही समस्या का समाधान करने निकली हैं, तो अंतिम निर्णय किस आधार पर होगा?

इन सवालों के जवाब मिलने तक इस प्रकरण की सबसे तीखी विडंबना यही रहेगी कि नाले में गंदगी बह रही है, सरकारी दफ्तरों में योजनाएं बह रही हैं और जनता उम्मीदों के किनारे खड़ी है।

क्योंकि जनता के पैसे से नाले की सफाई होनी चाहिए, न कि जिम्मेदारियों की धुलाई।

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VIKAS TRIPATHI
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