गौतमबुद्ध नगर प्रशासन ने नोएडा के दो कोचिंग सेंटरों को सील कर दिया है। कारण—अग्नि सुरक्षा मानकों का उल्लंघन, वैध पंजीकरण का अभाव और आवश्यक एनओसी का न होना। प्रशासन इस कार्रवाई को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, लेकिन जनता के मन में एक सवाल लगातार उठ रहा है—
क्या इसके लिए किसी बड़े हादसे का इंतज़ार किया जा रहा था?
यदि लखनऊ में हुई दर्दनाक घटना में 15 लोगों की जान नहीं जाती, तो क्या यह अभियान शुरू होता? क्या तब भी कोचिंग सेंटरों, स्कूलों, हॉस्टलों और अन्य व्यावसायिक संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था की जांच होती? या फिर सब कुछ पहले की तरह कागज़ों में ही चलता रहता?
जब तक लाशें नहीं गिरतीं, तब तक क्यों नहीं दिखतीं खामियां?
देश में यह कोई पहला मामला नहीं है। सूरत के कोचिंग सेंटर में आग, राजकोट गेमिंग जोन हादसा, दिल्ली के बेसमेंट कोचिंग सेंटर में छात्रों की मौत और अब लखनऊ की त्रासदी—हर हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय होता है, जांच बैठती है, नोटिस जारी होते हैं, कुछ संस्थान सील होते हैं और फिर समय बीतने के साथ सब कुछ सामान्य हो जाता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिन संस्थानों में आज खामियां मिल रही हैं, वे कल तक किसकी निगरानी में संचालित हो रहे थे?
नोएडा में सिर्फ दो कोचिंग सेंटर सील, लेकिन सवाल सैकड़ों पर
आज दो कोचिंग सेंटर सील हुए हैं, कुछ को नोटिस दिए गए हैं। लेकिन क्या केवल दो संस्थानों पर कार्रवाई कर देने से खतरा समाप्त हो गया?
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में सैकड़ों कोचिंग सेंटर, पीजी, हॉस्टल, स्कूल और व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित हैं। क्या सभी के पास वैध अग्निशमन एनओसी है? क्या सभी भवन सुरक्षा मानकों पर खरे उतरते हैं? क्या आपातकालीन निकास मार्ग वास्तव में उपयोग योग्य हैं? क्या अग्निशमन उपकरण कार्यशील अवस्था में हैं?
यदि नहीं, तो यह केवल दो संस्थानों का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था का प्रश्न है।
जवाबदेही सिर्फ संस्थानों की नहीं, सिस्टम की भी हो
हर बार कार्रवाई का केंद्र केवल संस्थान संचालक बनते हैं। लेकिन यह भी पूछा जाना चाहिए कि वर्षों तक बिना पंजीकरण या सुरक्षा मानकों के संस्थान संचालित कैसे होते रहे?
क्या संबंधित विभागों ने समय-समय पर निरीक्षण किया?
क्या रिपोर्ट तैयार हुई?
यदि हुई, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
और यदि निरीक्षण ही नहीं हुआ, तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कब तय होगी?
सुरक्षा कोई अभियान नहीं, स्थायी व्यवस्था होनी चाहिए
दुर्घटना के बाद चलने वाले अभियान अक्सर कुछ दिनों तक चर्चा में रहते हैं और फिर समाप्त हो जाते हैं। लेकिन सुरक्षा किसी अभियान का विषय नहीं है; यह एक निरंतर प्रक्रिया है।
हर कोचिंग सेंटर, स्कूल, हॉस्टल, अस्पताल और व्यावसायिक भवन का नियमित सुरक्षा ऑडिट हो।
निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
उल्लंघन करने वालों के साथ-साथ लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो।
तभी ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है।
सबसे बड़ा सवाल
क्या हमें हर बार 10, 15 या 20 लोगों की मौत के बाद ही जागना होगा?
क्या प्रशासन की कुंभकर्णी नींद केवल किसी बड़ी त्रासदी की चीखों से ही टूटेगी?
या फिर हम ऐसी व्यवस्था बनाएंगे जहां कार्रवाई हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले हो?
क्योंकि किसी भी शहर की असली सफलता उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि वहां रहने, पढ़ने और काम करने वाले लोगों की सुरक्षा से तय होती है। और यदि सुरक्षा सुनिश्चित नहीं है, तो विकास के सारे दावे अधूरे हैं।














