घुमक्कड़ की डायरी – उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आ सकी है। चुनाव होंगे या नहीं, इस असमंजस ने उन भावी प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ा दी है जो पिछले एक महीने से गांव-गांव अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुटे थे।
बैनर-पोस्टरों से पटी थीं गलियां
गांव की गलियों, सड़कों, बिजली के पोलों और यहां तक कि सूखे पेड़ों पर भी भावी प्रत्याशियों के बैनर और पोस्टर नजर आ रहे थे। खासकर भावी ब्लॉक प्रमुखों ने अपनी मौजूदगी दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कहीं स्वागत संदेश तो कहीं समाज सेवा के बड़े-बड़े दावे दिखाई दे रहे थे।
रुपए की गर्मी पर मौसम भारी
राजनीति की पगडंडी पर नोटों की गड्डियां बहाकर माहौल बनाने वाले कई दावेदार अब शांत दिखाई दे रहे हैं। चौराहों पर समर्थकों की भीड़ जुटाने और पार्टियां उड़ाने वाले चेहरे अब बंद एसी कमरों तक सीमित हो गए हैं। पहले जो नेता खुलेआम गांवों में सक्रिय दिखते थे, वे अब ब्लैक फिल्म लगी गाड़ियों से तेज रफ्तार में निकलते नजर आ रहे हैं।
इंतजार ने बिगाड़ा समीकरण
चुनाव की तारीख तय न होने से कई संभावित उम्मीदवारों की रणनीति गड़बड़ा गई है। लगातार खर्च और अनिश्चितता ने उनके उत्साह पर भी असर डाला है।
हवा बनाने की तैयारी हवा में
फिलहाल इतना साफ हो चुका है कि चुनावी हवा बनाने की जो कोशिशें तेज थीं, वे अब खुद हवा में उड़ती दिखाई दे रही हैं। गांवों की राजनीति में अचानक आई यह खामोशी आने वाले दिनों में नया मोड़ ला सकती है।














