जम्मू। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के दुर्गम पर्वतीय जंगलों में भारतीय सेना ने आतंकवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान में बड़ी सफलता हासिल करते हुए आतंकियों के एक पुराने और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकाने का भंडाफोड़ किया है। चतरू क्षेत्र के धरबी बाजमण्डू जंगल में 11 राष्ट्रीय राइफल्स (11 RR) द्वारा चलाए गए विशेष तलाशी अभियान के दौरान इस हाईड-आउट को ध्वस्त किया गया। सेना को यहां से हथियारों, जिंदा कारतूस, विस्फोटक सामग्री और अत्याधुनिक संचार उपकरणों का बड़ा जखीरा मिला है, जिससे संकेत मिलता है कि यह स्थान आतंकियों के लिए लंबे समय से सुरक्षित संचालन केंद्र के रूप में इस्तेमाल हो रहा था।
खुफिया सूचना पर चला सर्च ऑपरेशन
सेना सूत्रों के अनुसार, खुफिया तंत्र से मिली सटीक जानकारी के बाद चतरू के ऊंचाई वाले वन क्षेत्र में सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया था। कई घंटों तक चले गहन तलाशी अभियान के दौरान जवानों ने घने जंगलों के बीच छिपाकर बनाए गए एक संदिग्ध ढांचे को घेरा। जांच करने पर यह आतंकवादियों का हाईड-आउट निकला, जिसे तत्काल निष्क्रिय कर दिया गया। तलाशी के दौरान सेना को एक कार्बाइन गन, मैगजीन सहित एक पिस्तौल, 9 एमएम के 97 जिंदा कारतूस तथा 7.62 एमएम के 18 जिंदा कारतूस बरामद हुए। इसके अलावा 51 एमएम का एक यूबीजी राउंड, करीब एक किलोग्राम विस्फोटक सामग्री और चार डेटोनेटर भी मिले, जो किसी बड़े हमले की तैयारी की ओर इशारा करते हैं।
रेडियो सेट की बरामदगी ने बढ़ाई चिंता
सबसे अहम बात यह रही कि इस ठिकाने से एक केनवुड रेडियो सेट और दो मोटोरोला रेडियो सेट भी बरामद किए गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, ऐसे संचार उपकरण सामान्यतः आतंकी मॉड्यूल के बीच संपर्क बनाए रखने, मूवमेंट की जानकारी साझा करने और सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उपयोग किए जाते हैं। यही वजह है कि बरामदगी को महज हथियार मिलने की घटना नहीं, बल्कि आतंकियों के सक्रिय नेटवर्क पर करारा प्रहार माना जा रहा है।
दुर्गम जंगल बने थे आतंकियों की पनाहगाह
सेना अधिकारियों का कहना है कि किश्तवाड़, डोडा और चेनाब घाटी के घने जंगल लंबे समय से आतंकियों के छिपने, पुनर्गठन करने और रसद इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल होते रहे हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, ऊंचे पहाड़ी दर्रे और कम आबादी वाले इलाके आतंकियों को अस्थायी अड्डे बनाने में मदद करते हैं। इसी कारण पिछले कुछ महीनों से सेना ने इन क्षेत्रों में लगातार कॉम्बिंग ऑपरेशन, ड्रोन निगरानी और मानव खुफिया नेटवर्क को मजबूत किया है। धरबी बाजमण्डू में मिला यह हाईड-आउट इस बात का प्रमाण है कि आतंकी संगठन अब भी इन दुर्गम इलाकों को अपनी सुरक्षित पनाहगाह बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।
जनवरी में भी मिला था ऐसा ही ठिकाना
उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष जनवरी में भी किश्तवाड़ जिले के एक अन्य वन क्षेत्र में सेना ने आतंकियों के एक ठिकाने का पर्दाफाश किया था। उस समय वहां से एलपीजी सिलेंडर, गैस स्टोव, सूखे मेवे, बासमती चावल, मैगी, देसी घी, सब्जियां, बर्तन और अन्य खाद्य सामग्री बरामद हुई थी। इन वस्तुओं से स्पष्ट हुआ था कि आतंकवादी कई दिनों नहीं बल्कि लंबे समय तक जंगल में टिके रहने की तैयारी के साथ मौजूद थे। अब नए हाईड-आउट से हथियार और संचार उपकरण मिलने के बाद यह आशंका और गहरा गई है कि किश्तवाड़ के ऊपरी जंगलों में आतंकियों ने चरणबद्ध तरीके से कई बैकअप बेस तैयार कर रखे थे।
पहलगाम हमले के बाद सेना का फोकस बढ़ा
सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम को पिछले वर्ष पहलगाम हमले के बाद तेज हुए आतंकवाद-रोधी अभियानों की कड़ी के रूप में देख रही हैं। पहलगाम की घटना के बाद सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि जम्मू-कश्मीर के उन सभी संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी और दबिश बढ़ाई जाए, जहां आतंकियों की संभावित मौजूदगी हो सकती है। किश्तवाड़, मरवाह, चतरू, सिंहपोरा और बाजमण्डू जैसे इलाके विशेष रूप से सेना की रडार पर हैं क्योंकि ये क्षेत्र घाटी और जम्मू संभाग के बीच आतंकी आवाजाही के लिए रणनीतिक मार्ग माने जाते हैं।
बड़ी साजिश नाकाम करने में मिली सफलता
रक्षा सूत्रों के मुताबिक, बरामद हथियारों और विस्फोटकों की प्रकृति यह दर्शाती है कि आतंकी संगठन केवल छिपने तक सीमित नहीं थे, बल्कि क्षेत्र में किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की तैयारी में भी जुटे हुए थे। रेडियो सेट और डेटोनेटर की मौजूदगी से यह भी संकेत मिलता है कि यह मॉड्यूल संगठित रूप से सक्रिय था और उसे बाहरी निर्देश प्राप्त हो रहे थे। ऐसे में सेना की यह कार्रवाई संभावित आतंकी हमले को समय रहते विफल करने के रूप में देखी जा रही है।
तलाशी अभियान अभी रहेगा जारी
सेना ने स्पष्ट किया है कि किश्तवाड़ और आसपास के ऊंचाई वाले जंगलों में तलाशी अभियान अभी जारी रहेगा। आने वाले दिनों में और अधिक गहन सर्च ऑपरेशन चलाए जाएंगे ताकि आतंकियों के शेष ठिकानों, उनके रसद नेटवर्क और स्थानीय मददगारों का पूरी तरह सफाया किया जा सके। फिलहाल सेना की इस कामयाबी से पूरे क्षेत्र में सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल बढ़ा है और स्थानीय लोगों ने भी राहत की सांस ली है। चेनाब घाटी में शांति और स्थिरता बनाए रखने की दिशा में इसे एक निर्णायक उपलब्धि माना जा रहा है।














