“प्राथमिक विद्यालय छोटी मिलक में आयोजित जागरूकता सत्र बना आत्मविश्वास, मुस्कान और सकारात्मक सोच का उत्सव“
आज के समय में जब नन्हे हाथों में खिलौनों की जगह मोबाइल फोन और टैबलेट तेजी से जगह बना रहे हैं, तब बच्चों का बचपन कहीं न कहीं स्क्रीन की चमक में सिमटता जा रहा है। इसी चिंता को संवेदनशीलता से समझते हुए ईएमसीटी टीम ने एक ऐसी पहल की, जिसने न केवल बच्चों को स्क्रीन टाइम के प्रति जागरूक किया, बल्कि उनके मन में आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान और सकारात्मक सोच की नई रोशनी भी जगा दी।
कनिका खुराना के नेतृत्व में प्राथमिक विद्यालय छोटी मिलक में आयोजित यह विशेष स्क्रीन टाइम जागरूकता कार्यशाला बच्चों के लिए किसी साधारण सत्र से कहीं बढ़कर रही। यह ऐसा अनुभव था, जहां तकनीक की सही समझ के साथ बच्चों को अपने भीतर छिपी ताकत पहचानने का अवसर मिला। कार्यशाला के दौरान जब बच्चों की मासूम आंखें ध्यान से हर बात सुन रही थीं, तो साफ महसूस हो रहा था कि यह संवाद उनके मन को गहराई से छू रहा है।
ईएमसीटी टीम ने बच्चों को बड़े प्यार और सहजता से समझाया कि मोबाइल, टीवी और अन्य स्क्रीन हमारे जीवन का हिस्सा तो हैं, लेकिन यदि उनका उपयोग बिना सीमा के होने लगे तो वही साधन हमारे स्वास्थ्य, पढ़ाई और खेलकूद के समय को धीरे-धीरे निगलने लगता है। बच्चों को बताया गया कि तकनीक बुरी नहीं है, लेकिन उसका सही समय, सही उद्देश्य और सीमित उपयोग ही उसे उपयोगी बनाता है। इस सरल समझ ने बच्चों को यह एहसास कराया कि असली दुनिया की खुशियां—मिट्टी में खेलना, दोस्तों संग हंसना, किताबों से सीखना और परिवार के साथ समय बिताना—किसी भी स्क्रीन से कहीं ज्यादा सुंदर हैं।
सत्र का सबसे भावुक और यादगार पल तब आया, जब बच्चों के साथ अफर्मेशन एक्टिविटी कराई गई। छोटे-छोटे बच्चों ने जब पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा—
“मैं मजबूत हूँ…”
“मैं समझदार हूँ…”
“मैं अपना समय सही तरह से उपयोग करूंगा…”
तो वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखों में चमक और चेहरे पर मुस्कान थी। मासूम आवाजों में गूंजते ये शब्द केवल वाक्य नहीं थे, बल्कि उन नन्हे दिलों में जन्म ले रही नई सोच की दस्तक थे। बच्चों को स्वयं के लिए प्रेरणादायक बातें कहते देखना ऐसा लगा मानो वे अपने भीतर छिपे उजाले को पहली बार पहचान रहे हों।
इस अवसर पर ईएमसीटी की संस्थापक रश्मि पांडेय ने भावुक स्वर में कहा कि संस्था का उद्देश्य बच्चों से स्क्रीन छीनना नहीं, बल्कि उन्हें यह सिखाना है कि वे स्क्रीन के पीछे छिपी दुनिया से बाहर निकलकर अपनी असली दुनिया, अपनी प्रतिभा और अपने आत्म-मूल्य को पहचानें। उन्होंने कहा कि जब बच्चे स्वयं को समझना सीख जाते हैं, तब वे तकनीक के गुलाम नहीं बल्कि उसके समझदार उपयोगकर्ता बनते हैं।
कार्यशाला के अंत में बच्चों के चेहरों पर जो आत्मविश्वास, जो चमक और जो खुशी दिखाई दी, वह इस बात का प्रमाण थी कि यह पहल केवल जागरूकता कार्यक्रम नहीं, बल्कि उनके मन में बेहतर भविष्य के बीज बोने का एक सशक्त प्रयास था। विद्यालय के शिक्षकों ने भी माना कि आज के दौर में ऐसे कार्यक्रम बच्चों को सही दिशा देने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
ईएमसीटी टीम ने संकल्प लिया है कि वह आगे भी बच्चों के समग्र विकास, मानसिक मजबूती और स्वस्थ डिजिटल आदतों के लिए ऐसे कार्यक्रम निरंतर आयोजित करती रहेगी, ताकि हर बच्चा स्क्रीन की दुनिया में खोने के बजाय अपनी असली पहचान और क्षमता से जुड़ सके।














