अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने विवादित बयान को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार उन्होंने भारत और चीन जैसे देशों को “नर्क” बताते हुए अमेरिका की जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। उनके इस बयान ने न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया पैदा की है, बल्कि नस्लवाद और प्रवासी विरोधी राजनीति को लेकर नई बहस भी छेड़ दी है।
क्या कहा ट्रंप ने?
ट्रंप ने एक रेडियो टिप्पणी को अपने सोशल प्लेटफॉर्म पर साझा करते हुए दावा किया कि भारत और चीन जैसे देशों से लोग अमेरिका आते हैं और यहां बच्चे पैदा कर उन्हें नागरिकता दिला देते हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस प्रक्रिया के जरिए परिवार बाद में अमेरिका में बस जाते हैं, जिसे उन्होंने “नर्क जैसे देशों” से पलायन बताया।
यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और इसकी व्यापक आलोचना शुरू हो गई।
भारत की प्रतिक्रिया
भारत ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई। विदेश मंत्रालय ने इसे अनुचित और गैर-जिम्मेदाराना बताते हुए स्पष्ट किया कि इस तरह की टिप्पणियां द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक सम्मान के खिलाफ हैं।
हालांकि, ट्रंप ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि भारत में उनके कई मित्र हैं, लेकिन उन्होंने अपनी मूल टिप्पणी को हटाया नहीं, जिससे विवाद और गहरा गया।
जन्मसिद्ध नागरिकता पर बहस
अमेरिका में जन्मसिद्ध नागरिकता 14वें संशोधन के तहत दी जाती है, जिसके अनुसार वहां जन्म लेने वाला हर बच्चा स्वतः अमेरिकी नागरिक बन जाता है। यह नीति लंबे समय से बहस का विषय रही है, लेकिन किसी पूर्व राष्ट्रपति द्वारा इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना असामान्य माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान:
प्रवासी विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देते हैं
एशियाई देशों को निशाना बनाते हैं
अमेरिकी समाज में मौजूद नस्लीय असमानताओं को उजागर करते हैं
भारत और चीन पर टिप्पणी क्यों विवादित?
भारत और चीन आज वैश्विक स्तर पर उभरती हुई महाशक्तियां हैं।
भारत आईटी, फार्मा और सेवा क्षेत्र में अग्रणी है
चीन इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग में दुनिया की बड़ी ताकत है
ऐसे में इन देशों को “नर्क” कहना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत माना जा रहा है, बल्कि कूटनीतिक दृष्टि से भी आपत्तिजनक है।
अमेरिका के भीतर भी आलोचना
ट्रंप के बयान की आलोचना अमेरिका के भीतर भी हो रही है। कई विश्लेषकों का कहना है कि यह बयान देश के मूल मूल्यों—समानता, विविधता और अवसर—के खिलाफ है।
अमेरिका, जो खुद को प्रवासियों का देश कहता है, वहां इस तरह की भाषा राजनीतिक ध्रुवीकरण को और बढ़ा सकती है।
बड़ा सवाल
यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई बड़े सवाल खड़े करता है:
क्या वैश्विक नेताओं को सार्वजनिक मंच पर शब्दों का चयन अधिक जिम्मेदारी से नहीं करना चाहिए?
क्या प्रवास और नागरिकता पर बहस को इस तरह की भाषा से प्रभावित किया जाना चाहिए?
क्या यह बयान अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर असर डालेगा?
डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान एक बार फिर यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में शब्दों की ताकत कितनी बड़ी होती है। भारत और चीन जैसे देशों को लेकर की गई इस टिप्पणी ने न केवल कूटनीतिक असहजता पैदा की है, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में प्रवास, नागरिकता और नस्लीय राजनीति जैसे मुद्दे और अधिक तीखे हो सकते हैं।














