नई दिल्ली: लोकसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सका, जिसके बाद देशभर में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। बिल के गिरने के तुरंत बाद मणिकम टैगोर ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि यदि मौजूदा सीटों पर ही महिला आरक्षण लागू किया जाता है, तो वह अपनी विरुधुनगर सीट किसी महिला उम्मीदवार के लिए छोड़ने को तैयार हैं।
लोकसभा में क्यों गिरा बिल?
यह संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका।
पक्ष में: 298 वोट
विरोध में: 230 वोट
विधेयक में लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करने और डिलिमिटेशन के आधार पर महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रस्ताव था। पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण बिल पारित नहीं हो पाया।
टैगोर का केंद्र सरकार पर सीधा हमला
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए टैगोर ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर निशाना साधा।
उन्होंने सवाल उठाया:
“अगर मैं अपनी सीट छोड़ सकता हूं, तो प्रधानमंत्री वाराणसी और गृह मंत्री गांधीनगर सीट क्यों नहीं छोड़ते?”
टैगोर ने आरोप लगाया कि सरकार डिलिमिटेशन के बहाने महिला आरक्षण को टाल रही है, जबकि इसे मौजूदा सीटों पर तुरंत लागू किया जाना चाहिए।
महिला आरक्षण पर बढ़ी राजनीतिक टकराव
बिल गिरने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर कड़ा हमला बोला।
इसे “महिलाओं के सपनों पर कुठाराघात” बताया
कहा कि यह “नारी सम्मान पर चोट” है
आरोप लगाया कि विपक्ष ने सुधारों को रोकने का काम किया
प्रधानमंत्री ने दोहराया कि सरकार का उद्देश्य महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना और शासन में उनकी भूमिका को मजबूत करना है।
असली विवाद क्या है?
महिला आरक्षण को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं:
विपक्ष का तर्क:
आरक्षण तुरंत मौजूदा सीटों पर लागू किया जाए
सरकार का पक्ष:
पहले डिलिमिटेशन और सीटों के पुनर्गठन के बाद लागू किया जाए
यही मतभेद इस बिल के पारित न होने की बड़ी वजह बना।
बिल के गिरने के बाद सरकार ने इससे जुड़े अन्य प्रस्तावों पर फिलहाल आगे न बढ़ने का फैसला किया है। हालांकि, महिला आरक्षण का मुद्दा अब एक बड़ा राजनीतिक एजेंडा बन चुका है और आने वाले समय में यह चुनावी बहस का केंद्र रहने की संभावना है।
महिला आरक्षण विधेयक का पारित न होना सिर्फ संसदीय प्रक्रिया की घटना नहीं, बल्कि देश की राजनीति में प्रतिनिधित्व बनाम रणनीति की बड़ी बहस को उजागर करता है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या राजनीतिक दल इस मुद्दे पर सहमति बना पाते हैं या यह बहस और गहराती जाएगी।














