केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई, जहां केंद्र सरकार ने धार्मिक आस्था और न्यायिक समीक्षा के दायरे को लेकर महत्वपूर्ण तर्क पेश किए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति या समुदाय की आस्था सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ नहीं है, तो उस पर अदालत द्वारा तर्क या विज्ञान के आधार पर न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
‘आस्था पर तर्क नहीं थोपे जा सकते’
तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि किसी धार्मिक विश्वास को केवल इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह तर्कसंगत या वैज्ञानिक नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत धार्मिक स्वतंत्रता एक मूल अधिकार है, और जब तक वह सार्वजनिक हित के खिलाफ नहीं जाती, तब तक उसमें हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
1972 के शेषाम्मल केस का हवाला
केंद्र सरकार की ओर से Seshammal vs State of Tamil Nadu मामले का हवाला दिया गया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि राज्य ऐसी कार्रवाई करता है जिससे धार्मिक परंपराओं का उल्लंघन होता है—जैसे कि पूजा विधि में अनधिकृत हस्तक्षेप—तो यह श्रद्धालुओं की आस्था पर गंभीर असर डाल सकता है और असंवैधानिक हो सकता है।
‘सुधार के नाम पर धर्म का मूल स्वरूप नहीं बदला जा सकता’
तुषार मेहता ने वरिष्ठ विधिवेत्ता नानी पालखीवाला के तर्कों का हवाला देते हुए कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म के मूल तत्व को खत्म नहीं किया जा सकता। इस पर जस्टिस बी वी नागरत्ना ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि सुधार की प्रक्रिया किसी धर्म को “खोखला” नहीं कर सकती।
धार्मिक संप्रदाय की परिभाषा पर बहस
सुनवाई के दौरान ‘धार्मिक संप्रदाय’ की परिभाषा को लेकर भी चर्चा हुई। तुषार मेहता ने SP Mittal vs Union of India मामले का जिक्र करते हुए बताया कि किसी संप्रदाय के लिए साझा आस्था, संगठन और एक विशिष्ट पहचान होना जरूरी है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वास्तविकता में विभिन्न आस्थाओं के लोग एक ही धार्मिक स्थल पर आ सकते हैं और संप्रदायों की परिभाषा को सीमित नहीं किया जा सकता।
अहम मोड़ पर बहस
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा लंबे समय से संवैधानिक, धार्मिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है। ताजा सुनवाई में केंद्र सरकार के इन तर्कों ने इस बहस को नया आयाम दे दिया है, जहां अब अदालत को धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।














