केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े बहुचर्चित मामले पर एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई शुरू होने जा रही है। Supreme Court of India की 9 जजों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से इस अहम मामले पर विचार करेगी, जो केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं बल्कि व्यापक संवैधानिक सवालों से जुड़ा हुआ है।
यह संविधान पीठ मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में गठित की गई है। उनके साथ जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची इस बेंच का हिस्सा हैं।
केवल सबरीमाला नहीं, बड़े संवैधानिक सवालों पर होगी सुनवाई
यह मामला अब सिर्फ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं रह गया है। संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता और गरिमा के अधिकार, “Essential Religious Practices” यानी आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा की सीमा, और विभिन्न धर्मों में समान प्रकार के विवादों पर इसके प्रभाव जैसे अहम मुद्दों पर विचार करेगी।
इस मामले में All India Muslim Personal Law Board और कुछ जैन संगठनों ने भी हस्तक्षेप याचिकाएं दाखिल कर अपनी दलीलें पेश की हैं, जिससे यह मामला और अधिक व्यापक हो गया है।
2018 के ऐतिहासिक फैसले की पृष्ठभूमि
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सभी आयु वर्ग की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। इस फैसले में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश Dipak Misra, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ बहुमत में थे।
वहीं जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने असहमति जताते हुए कहा था कि धार्मिक आस्थाओं में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि भक्ति के आधार पर लैंगिक भेदभाव स्वीकार नहीं किया जा सकता।
9 जजों के फैसले से तय होगी नई दिशा
2018 के फैसले के खिलाफ कई समीक्षा और रिट याचिकाएं दाखिल की गई थीं। अब 9 जजों की यह संविधान पीठ उन बड़े संवैधानिक प्रश्नों पर निर्णय दे सकती है, जो भविष्य में धार्मिक प्रथाओं से जुड़े अन्य मामलों के लिए भी मिसाल बनेंगे।
परंपरा बनाम समानता का सवाल
सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी स्वरूप में पूजा जाता है, जिसके चलते 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर पारंपरिक रूप से रोक रही है। समर्थकों का तर्क है कि यह प्रतिबंध आयु-आधारित और धार्मिक परंपरा से जुड़ा है, न कि लैंगिक भेदभाव।
अब पूरे देश की नजर इस सुनवाई पर टिकी है, क्योंकि इसका फैसला धर्म, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को नई दिशा दे सकता है।














