मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने में बड़ी सफलता हासिल की है। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक भारत ने मजबूत कूटनीति और रणनीतिक फैसलों के जरिए इस संकट का प्रभाव काफी हद तक कम कर दिया है।
वैश्विक संकट, लेकिन भारत संभला
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हुई है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया की करीब 20% ऊर्जा सप्लाई गुजरती है, उसमें रुकावटों ने कई देशों को संकट में डाल दिया है। भारत, जो अपने कच्चे तेल का 40-50% इसी मार्ग से आयात करता है, पर भी इसका खतरा मंडरा रहा था—लेकिन हालात अपेक्षा से बेहतर बने हुए हैं।
कूटनीति और विविधता बनी ताकत
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, पिछले एक महीने में कच्चे तेल, LPG और LNG की उपलब्धता में स्पष्ट सुधार हुआ है। इसका मुख्य कारण भारत द्वारा ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना है। पारंपरिक मिडिल ईस्ट आपूर्ति पर निर्भरता कम करते हुए भारत ने अफ्रीका और अन्य देशों से आयात बढ़ाया है।
अफ्रीकी देशों से बढ़ी सप्लाई
भारत ने नाइजीरिया, अल्जीरिया, घाना, कांगो और अंगोला जैसे देशों से LPG और कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाई है। वहीं LNG के लिए कैमरून, इक्वेटोरियल गिनी और मोज़ाम्बिक जैसे नए स्रोतों से संपर्क किया गया है।
रूस से आयात में तेज उछाल
संकट के बीच रूस से तेल आयात में भी भारी बढ़ोतरी देखी गई है। मार्च महीने में भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद फरवरी के मुकाबले लगभग 90% बढ़ा दी। यह बढ़ोतरी उस समय संभव हुई जब अमेरिका ने भारत को सीमित अवधि के लिए रूसी तेल खरीद की अनुमति दी।
पाइपलाइन से भी मिली राहत
सऊदी अरब और यूएई ने भी अपनी कुछ सप्लाई वैकल्पिक पाइपलाइनों के जरिए जारी रखी है। सऊदी की ईस्ट-वेस्ट (यानबू) पाइपलाइन और यूएई की हबशान-फुजैराह पाइपलाइन ने हॉर्मुज मार्ग को बायपास कर सप्लाई जारी रखने में मदद की है।
आंकड़ों में भारत की ऊर्जा रणनीति
भारत रोजाना करीब 5.5–5.6 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात करता है। LPG की सालाना मांग 31 मिलियन टन है, जिसमें 60% आयात से पूरी होती है। वहीं देश में प्राकृतिक गैस की खपत 191 mmscmd है, जिसमें से 51% आयात किया जाता है।
संकट में अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट ने भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति को और मजबूत करने का अवसर दिया है। विविध स्रोतों से आयात बढ़ाने और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने से भारत न सिर्फ वर्तमान संकट से निपट रहा है, बल्कि भविष्य के लिए भी खुद को तैयार कर रहा है।














