नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में एक सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक मज़ाकिया टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रही है। यह टिप्पणी किसी आदेश का हिस्सा नहीं थी, बल्कि अगली तारीख तय करते समय हुई सामान्य बातचीत का हिस्सा थी।
मामला ‘सुरेश देवी बनाम इलाहाबाद हाईकोर्ट’ से जुड़ा था, जिसमें बेंच अगली सुनवाई की तारीख तय कर रही थी। चूंकि आने वाले दिनों में होली का त्योहार और उससे जुड़ी छुट्टियां प्रस्तावित थीं, इसलिए अदालत इस पर विचार कर रही थी कि केस को किस दिन सूचीबद्ध किया जाए।
“इलाहाबाद है भाई…” — टिप्पणी पर छिड़ी चर्चा
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मुस्कराते हुए कहा कि मामले को होली की छुट्टियों के बाद रखा जाए। उन्होंने हल्के अंदाज में जोड़ा कि “इलाहाबाद है भाई, एक हफ्ता तो लग जाएगा भांग का नशा उतारने में।” अदालत कक्ष में मौजूद लोगों के बीच इस टिप्पणी पर हल्की हंसी भी देखने को मिली।
हालांकि यह टिप्पणी पूरी तरह मज़ाकिया लहजे में थी और इसका कानूनी प्रक्रिया या आदेश से कोई संबंध नहीं था। अदालत ने सिर्फ अगली तारीख होली के बाद तय करने का संकेत दिया।
सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल
जैसे ही इस टिप्पणी का वीडियो क्लिप सामने आया, वह विभिन्न सामाजिक मंचों पर वायरल हो गया। लोग इसे अदालत के औपचारिक माहौल में एक हल्के-फुल्के क्षण के रूप में देख रहे हैं। कई यूजर्स ने इसे मानवीय और सहज टिप्पणी बताया, जबकि कुछ ने इस पर मजाकिया प्रतिक्रियाएं दीं।
अदालतों में कभी-कभी सुनवाई के दौरान ऐसी टिप्पणियां सामने आ जाती हैं, जो माहौल को हल्का बना देती हैं। हालांकि इनका मामले के कानूनी पहलुओं या फैसलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
क्यों आया भांग का जिक्र?
उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्र, विशेषकर प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) और काशी, होली के अवसर पर भांग की परंपरा के लिए जाने जाते हैं। वर्षों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं के तहत लोग होली के दिन भांग का सेवन करते हैं। इसी सामाजिक संदर्भ को लेकर मुख्य न्यायाधीश ने यह टिप्पणी की।
मामला अब भी लंबित
उल्लेखनीय है कि संबंधित मामला अभी भी न्यायालय में लंबित है और इसकी अगली सुनवाई होली की छुट्टियों के बाद होगी। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी केवल तारीख निर्धारण के दौरान की गई सामान्य बातचीत का हिस्सा थी।
फिलहाल यह हल्का-फुल्का पल कानूनी गलियारों से निकलकर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है, जहां लोग इसे होली के रंग और अदालत की गरिमा के बीच एक सहज क्षण के रूप में देख रहे हैं।














