कोलकाता: पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल पूरी तरह गरमा चुका है। Bharatiya Janata Party ने चुनाव से पहले बड़ा दांव चलते हुए ‘पीपुल्स मेनिफेस्टो’ अभियान शुरू किया है। पार्टी का दावा है कि इस बार घोषणापत्र शीर्ष नेतृत्व नहीं बल्कि आम जनता की राय से तैयार किया जाएगा। गांव-गांव और शहर-शहर से लोग अपनी समस्याएं और सुझाव लिखित रूप में दे रहे हैं, जिन्हें संकल्प पत्र में शामिल करने की बात कही जा रही है।
जनता की राय से बनेगा संकल्प पत्र
पार्टी सूत्रों के अनुसार सबसे ज्यादा सुझाव जिन मुद्दों पर मिले हैं, उनमें कट मनी और भ्रष्टाचार पर सख्ती, कानून-व्यवस्था की बहाली, रोजगार सृजन, भयमुक्त समाज, सिंडिकेट राज का खात्मा और बिना राजनीतिक हस्तक्षेप के प्रत्यक्ष लाभ योजनाएं शामिल हैं। युवाओं को रोजगार, पलायन रोकने और हर वर्ग को सम्मानजनक जीवन देने जैसे विषय भी प्रमुखता से सामने आए हैं।
भाजपा का कहना है कि यह संकल्प पत्र “जनता का दस्तावेज” होगा, जिसमें हर वर्ग की आवाज शामिल की जाएगी। सूत्रों के मुताबिक पार्टी मार्च के पहले सप्ताह में अपना घोषणापत्र जारी कर सकती है।
उत्तर बंगाल पर विशेष फोकस
इस बार भाजपा क्षेत्रीय रणनीति पर भी खास ध्यान दे रही है। उत्तर बंगाल के आठ जिलों—कूच बिहार से लेकर दार्जिलिंग तक—के लिए अलग मिनी घोषणापत्र तैयार किया जा रहा है। इसमें क्षेत्र विशेष की समस्याओं और विकास योजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।
चुनावी वादों में आक्रामकता भी नजर आ रही है। हर साल 20 लाख नौकरियों का दावा, उत्तर बंगाल में एक प्रमुख तकनीकी संस्थान की स्थापना और युवाओं को 25 हजार रुपये तक की सशर्त आर्थिक सहायता जैसे प्रस्ताव चर्चा में हैं।
टीएमसी का पलटवार
वहीं All India Trinamool Congress ने भाजपा की इस रणनीति को “चुनावी जुमला” करार दिया है। टीएमसी का कहना है कि उनकी सरकार पहले से ही ‘युवा साथी’ जैसी योजनाओं के माध्यम से युवाओं को सीधी आर्थिक मदद दे रही है और जनता का भरोसा उनके साथ है।
टीएमसी नेताओं का आरोप है कि भाजपा बड़े-बड़े वादे कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर उसके पास कोई ठोस मॉडल नहीं है। उनका कहना है, “हम काम करते हैं, वे वादे करते हैं। जनता सब देख रही है।”
मॉडल बनाम मॉडल की लड़ाई
पश्चिम बंगाल में इस बार मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि दो अलग-अलग विकास मॉडलों के बीच होता दिख रहा है। एक ओर भाजपा का जन-आधारित संकल्प पत्र और बड़े वादे हैं, तो दूसरी ओर टीएमसी की मौजूदा कल्याणकारी योजनाएं।
चुनाव से पहले यह स्पष्ट है कि सुरक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता जैसे मुद्दे ही सियासत की दिशा तय करेंगे। अब देखना यह है कि जनता किस मॉडल पर अधिक भरोसा जताती है।














