“ग्रेटर नोएडा में बैंक के बाहर जमा पूंजी के लिए धरना, सवालों के घेरे में बैंकिंग व्यवस्था; निलंबित कर्मचारी से लेकर पूर्व शाखा प्रबंधक तक उठ रही जवाबदेही की मांग, अब तक गिरफ्तारी नहीं होने से भड़का आक्रोश”
ग्रेटर नोएडा | 2 नवंबर 2026
बैंक में पैसा जमा करते वक्त खाताधारक को एक भरोसा दिया जाता है—आपकी मेहनत की कमाई सुरक्षित है। बैंक की इमारत पर लगा नाम, भीतर बैठा कर्मचारी, पासबुक में दर्ज रकम और खाते पर मिलने वाला ब्याज… सब मिलकर उस भरोसे को मजबूत करते हैं। लेकिन जब यही भरोसा टूटता है तो सवाल सिर्फ पैसों का नहीं रहता, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का हो जाता है, जिसके हवाले लोग अपनी जिंदगी की कमाई कर देते हैं।
ग्रेटर नोएडा के सेक्टर पाई-1 स्थित ऐच्छर की पंजाब नेशनल बैंक शाखा में करीब 35 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी का मामला अब इसी भरोसे के टूटने की कहानी बन चुका है। सोमवार को बैंक के बाहर खाताधारकों का धरना, अधिकारियों के खिलाफ नारेबाजी और बैंक पर ताला लगाने की कोशिश ने यह साफ कर दिया कि मामला अब केवल बैंक की आंतरिक जांच तक सीमित नहीं है। यह उन लोगों की लड़ाई बन चुका है, जिनकी जमा पूंजी बैंक के खातों में तो दिखाई देती थी, लेकिन जरूरत पड़ने पर उनके हाथ खाली रह गए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की कथित हेराफेरी के मामले में आखिर जिम्मेदारी किसकी है? क्या पूरा मामला केवल एक निलंबित कर्मचारी तक सीमित है? क्या बैंक की निगरानी व्यवस्था इतनी कमजोर थी कि करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेनदेन का पता समय रहते नहीं चल पाया? और यदि गड़बड़ी हुई तो खाताधारकों को उनका पैसा वापस दिलाने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
बैंक के बाहर बैठे लोगों की नाराजगी अब इन सवालों से आगे निकल चुकी है। उनका कहना है कि आश्वासन बहुत मिल चुके, अब रकम चाहिए।
बैंक के बाहर ताला, भीतर जवाबदेही पर सन्नाटा?
सोमवार को ऐच्छर शाखा के बाहर खाताधारकों का गुस्सा खुलकर सामने आया। महिलाएं, पुरुष और बुजुर्ग अपनी जमा रकम वापस पाने की मांग लेकर धरने पर बैठ गए। कुछ लोगों ने बैंक पर ताला लगाने की कोशिश की। उनका कहना था कि जब बैंक उनकी जमा पूंजी लौटाने में असमर्थ है तो फिर बैंक के सामान्य संचालन का क्या औचित्य है?
यह दृश्य किसी राजनीतिक प्रदर्शन से कम नहीं था। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां नारे लगाने वालों के हाथों में किसी पार्टी का झंडा नहीं, बल्कि अपनी मेहनत की कमाई वापस पाने की मांग थी।
किसी को घर में शादी करनी है, किसी को परिजन के इलाज के लिए पैसा चाहिए। किसी ने वर्षों की बचत बैंक में रखी थी तो किसी ने भविष्य की सुरक्षा के लिए अपनी जमा पूंजी एकत्र की थी। लेकिन अब इन लोगों को अपने ही पैसे के लिए बैंक के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
खाताधारकों का आरोप है कि अब तक केवल 14 से 15 लोगों को ही रकम वापस मिल पाई है। बाकी लोग इंतजार कर रहे हैं।
बैंक के बाहर बैठे लोगों की पीड़ा का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जिस संस्था को उनकी जमा पूंजी की सुरक्षा करनी थी, उसी संस्था के सामने उन्हें अपनी रकम वापस पाने के लिए धरना देना पड़ रहा है।
बैंक के दरवाजे पर ताला लगाने की कोशिश केवल आक्रोश का प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस भरोसे पर लगा सवालिया निशान है, जिसके आधार पर बैंकिंग व्यवस्था चलती है।
35 करोड़ की कथित हेराफेरी: क्या एक कर्मचारी ही पूरी कहानी है?
इस पूरे मामले में बैंक की निलंबित कर्मचारी दीपांशी की भूमिका सामने आई है। बैंक की आंतरिक जांच में संदिग्ध लेनदेन से संबंधित दस्तावेजों की अनुपलब्धता और पूछताछ के दौरान सामने आए तथ्यों ने मामले को गंभीर बना दिया।
लेकिन खाताधारकों का कहना है कि इतनी बड़ी रकम की कथित हेराफेरी को केवल एक कर्मचारी की गलती बताकर पूरी कहानी समाप्त नहीं की जा सकती।
उनका सवाल है कि यदि करोड़ों रुपये के लेनदेन हुए तो शाखा की निगरानी व्यवस्था कहां थी? लेनदेन की जांच करने वाले अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या बैंक के सिस्टम में ऐसे कोई अलर्ट नहीं थे, जिनसे संदिग्ध गतिविधियों का पता चल सके?
बैंकिंग व्यवस्था में हर बड़े लेनदेन के साथ एक प्रक्रिया जुड़ी होती है। रिकॉर्ड, दस्तावेज, सत्यापन और निगरानी… इन सबका उद्देश्य ही यह होता है कि किसी खाताधारक की रकम बिना उसकी जानकारी के इधर-उधर न हो सके।
ऐसे में करीब 35 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी का मामला अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
खाताधारकों की मांग है कि तत्कालीन शाखा प्रबंधक सहित उन सभी अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जाए, जिनके कार्यकाल में संदिग्ध लेनदेन हुए।
क्योंकि यदि जांच केवल एक कर्मचारी पर केंद्रित रह गई तो उन सवालों का जवाब अधूरा रह जाएगा, जो बैंक की निगरानी व्यवस्था और अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़े हैं।
झारखंड के खातों तक पहुंची रकम, पूर्व शाखा प्रबंधक पर सवाल
मामले में सामने आई जानकारी के मुताबिक, ग्रेटर नोएडा की ऐच्छर शाखा से झारखंड के बैंक खातों में भी रकम ट्रांसफर की गई थी। पुलिस जांच में इस तथ्य के सामने आने के बाद खाताधारकों ने रकम के ट्रांसफर की पूरी कड़ी की जांच की मांग की है।
पूर्व शाखा प्रबंधक की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। बताया गया है कि पूर्व शाखा प्रबंधक मूल रूप से झारखंड के हजारीबाग की रहने वाली हैं।
हालांकि, किसी व्यक्ति का मूल निवास या किसी क्षेत्र से संबंध होना अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं है। लेकिन करोड़ों रुपये के कथित लेनदेन में किन खातों का इस्तेमाल हुआ, किस स्तर पर अनुमति दी गई और रकम किन लोगों तक पहुंची—इन सवालों का जवाब जांच से ही सामने आना चाहिए।
खाताधारकों का कहना है कि यदि रकम झारखंड के खातों में गई है तो उन खातों के संचालन, लेनदेन और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
यहां मामला किसी एक कर्मचारी या अधिकारी के नाम तक सीमित नहीं रह जाता। असली सवाल उस पूरी व्यवस्था का है, जिसके भीतर कथित तौर पर करोड़ों रुपये का लेनदेन हुआ।
16 सितंबर की शिकायत से खुला कथित हेराफेरी का मामला
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत बैंक की शिकायत के अनुसार 16 सितंबर 2026 को हुई।
एक महिला खाताधारक अपने पति और बेटी के साथ पासबुक अपडेट कराने बैंक पहुंची थी। पासबुक में खाते से तीन ऐसे लेनदेन दर्ज मिले, जिनकी जानकारी परिवार को नहीं थी।
महिला ने शाखा प्रमुख से मिलने की मांग की, लेकिन उस समय शाखा प्रमुख मौजूद नहीं थीं।
आरोप है कि इसी दौरान बैंक कर्मचारी दीपांशी ने परिवार को इन लेनदेन के सही होने का भरोसा दिलाने का प्रयास किया। बाद में महिला के पति ने मामले की शिकायत शाखा प्रमुख से की।
पूछताछ के दौरान दीपांशी ने कथित तौर पर बताया कि महिला ने फोन पर अपने पति को संपत्ति में निवेश करने और आशुतोष नामक व्यक्ति के खाते में रकम भेजने की जानकारी दी थी।
लेकिन बैंक की आंतरिक जांच में इन तीनों लेनदेन से संबंधित डेबिट वाउचर शाखा के रिकॉर्ड में नहीं मिले।
दस्तावेजों का उपलब्ध नहीं होना बैंक के संदेह को गहरा करने वाला तथ्य बना। इसके बाद हुई पूछताछ में दीपांशी ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि संबंधित लेनदेन आशुतोष के कहने पर किए गए थे।
यहीं से मामला एक खाताधारक की शिकायत से निकलकर करोड़ों रुपये की कथित हेराफेरी की जांच तक पहुंच गया।
एक महिला की पासबुक में दर्ज तीन संदिग्ध लेनदेन ने उस व्यवस्था की पोल खोलने का सवाल खड़ा कर दिया, जिस पर हजारों खाताधारक भरोसा करते हैं।
गिरफ्तारी नहीं, जवाबदेही पर सवाल और गहराए
खाताधारकों का आक्रोश केवल रकम वापस नहीं मिलने तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि इतने गंभीर मामले में अब तक गिरफ्तारी नहीं होने से उनकी चिंता बढ़ती जा रही है।
लोगों का सवाल है कि यदि करोड़ों रुपये की कथित हेराफेरी सामने आ चुकी है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई कब होगी?
किसान नेता बृजेश भाटी ने भी बैंक प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि केवल दीपांशी के खिलाफ कार्रवाई करके अन्य बैंककर्मियों की भूमिका को नजरअंदाज किया जा रहा है।
उन्होंने मांग की है कि पूर्व शाखा प्रबंधक सहित सभी संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि जांच में किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कठोर कार्रवाई की जाए।
यह मांग अब आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बन चुकी है।
हालांकि, किसी भी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही तय हो सकती है। लेकिन खाताधारकों का यह सवाल वाजिब है कि जांच की दिशा और कार्रवाई की स्थिति के बारे में उन्हें स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं मिल रही?
राजनीतिक पर्दे के पीछे की कहानी: जिम्मेदारी किसकी, जवाब कौन देगा?
बैंकिंग घोटालों की एक खासियत होती है। शुरुआत में मामला किसी कर्मचारी की कथित गड़बड़ी के रूप में सामने आता है। फिर जांच का दायरा बढ़ता है। कुछ नाम सामने आते हैं, कुछ सवाल उठते हैं और अंततः सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा पीछे छूटने लगता है—आम आदमी का पैसा।
ऐच्छर शाखा के मामले में भी खाताधारकों की चिंता इसी बिंदु पर केंद्रित है।
क्या बैंक प्रशासन की प्राथमिकता केवल अपनी आंतरिक जांच पूरी करना है? क्या खाताधारकों को यह बताना जरूरी नहीं कि उनकी रकम की वापसी के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? क्या उन्हें यह जानकारी नहीं मिलनी चाहिए कि अब तक कितनी रकम वापस की गई है और कितनी रकम अभी बाकी है?
यहां राजनीतिक पर्दे के पीछे की कहानी किसी पार्टी या नेता के नाम से नहीं, बल्कि जवाबदेही की उस राजनीति से जुड़ी है, जिसमें जिम्मेदारी तय करने के बजाय जिम्मेदारी टालने की कोशिशें अक्सर लोगों को परेशान करती हैं।
खाताधारकों का आरोप है कि बैंक उनकी रकम लौटाने में पूरी पारदर्शिता नहीं बरत रहा है। वे मूलधन के साथ नियमानुसार देय ब्याज सहित पूरी रकम वापस चाहते हैं।
यदि ऐसा है तो बैंक प्रशासन के लिए सबसे जरूरी कदम यह होना चाहिए कि वह प्रभावित खाताधारकों के सामने स्पष्ट स्थिति रखे।
कितने खाते प्रभावित हैं? कितनी रकम संदिग्ध लेनदेन में शामिल है? कितनी रकम वापस की जा चुकी है? कितनी रकम अभी बाकी है? और रकम वापसी की प्रक्रिया कब तक पूरी होगी?
इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि स्पष्ट आंकड़ों और समयबद्ध कार्रवाई से मिल सकता है।
खाताधारकों की भूमिका की जांच, लेकिन पीड़ितों को राहत कब?
मामले का एक दूसरा पहलू भी जांच एजेंसियों के सामने है।
बैंक की आंतरिक जांच के अनुसार, महिला खाताधारक संगीता की शिकायत से पहले किसी अन्य ग्राहक की ओर से औपचारिक शिकायत नहीं की गई थी। संगीता के परिवार की आपत्ति के बाद ही जांच शुरू हुई।
अब जांच एजेंसियां इस पहलू की भी पड़ताल कर रही हैं कि सभी प्रभावित खाताधारक वास्तव में धोखाधड़ी के शिकार हैं या किसी अन्य स्तर पर उनकी भी कोई भूमिका रही है।
हालांकि, इस संबंध में किसी खाताधारक की संलिप्तता अभी साबित नहीं हुई है।
जांच का यह पहलू महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि वास्तविक पीड़ितों की रकम वापसी की प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक खिंचती रहे।
जिस खाताधारक ने अपनी मेहनत की कमाई बैंक में जमा की है, उसके लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उसे उसका पैसा कब मिलेगा?
बैंक का ताला नहीं, भरोसे का ताला खुलना जरूरी
ऐच्छर शाखा के बाहर धरने पर बैठे लोगों की लड़ाई अब केवल 35 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी की जांच तक सीमित नहीं है। यह उस भरोसे की लड़ाई है, जिसके आधार पर आम आदमी बैंक में पैसा जमा करता है।
किसी की बेटी की शादी है, किसी के घर में बीमारी है, किसी को अपने भविष्य की चिंता है। इन लोगों के लिए बैंक में जमा रकम केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत और परिवार की सुरक्षा है।
अब बैंक प्रशासन, पुलिस और जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे इस मामले में पारदर्शिता बनाए रखें और खाताधारकों को राहत दिलाने के लिए ठोस कदम उठाएं।
करीब 35 करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी की पूरी सच्चाई कब सामने आएगी? रकम किन खातों में पहुंची? पूर्व बैंक अधिकारियों की क्या भूमिका रही? क्या अन्य लोगों की संलिप्तता भी सामने आएगी? और सबसे अहम सवाल—खाताधारकों की जीवनभर की कमाई कब वापस मिलेगी?
फिलहाल बैंक के बाहर धरने पर बैठे लोगों ने साफ कर दिया है कि पैसा नहीं मिला तो आंदोलन और तेज होगा।
बैंक के दरवाजे पर ताला लगाने की कोशिश ने एक बात जरूर साफ कर दी है—खाताधारकों के सब्र का ताला अब टूट चुका है।
अब देखना यह है कि बैंक प्रशासन पहले अपनी जवाबदेही तय करता है या खाताधारकों को फिर किसी नए आश्वासन के भरोसे छोड़ देता है।















