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भाजपा की सियासत का वो अध्याय, जिसे बंद तो कर दिया गया… लेकिन कहानी आज भी बाकी है!

“कभी संगठन की धुरी रहे संजय जोशी की राजनीतिक विदाई के पीछे आखिर कौन-सा समीकरण था? गुजरात से दिल्ली तक जिनके नाम का दबदबा था, वे अचानक सियासी हाशिये पर कैसे पहुंच गए? और आज भी उनकी वापसी का सवाल भाजपा के भीतर इतना दिलचस्प क्यों है?”

नई दिल्ली।

भारतीय राजनीति में कुर्सी की भी अपनी अजीब कहानी होती है। जब तक कुर्सी आपके पास है, लोग आपकी राजनीतिक समझ, संगठनात्मक क्षमता और दूरदर्शिता के कायल रहते हैं। लेकिन जैसे ही कुर्सी हाथ से निकलती है, वही लोग आपकी उपयोगिता पर सवाल उठाने लगते हैं। राजनीति में तारीफ का मौसम भी सत्ता के मौसम विभाग से ही तय होता है।

भाजपा की अंदरूनी राजनीति में संजय जोशी की कहानी कुछ ऐसी ही है। एक ऐसा संगठनकर्ता, जिसने गुजरात में पार्टी की जड़ों को मजबूत करने से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर संगठन की कमान संभालने तक का सफर तय किया। कभी जिनकी संगठनात्मक पकड़ की चर्चा पार्टी के भीतर होती थी, वे एक दौर में ऐसे राजनीतिक हाशिये पर पहुंचे कि उनकी वापसी भी भाजपा की अंदरूनी राजनीति का दिलचस्प सवाल बन गई।

सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि संजय जोशी को भाजपा में दोबारा बड़ी जिम्मेदारी क्यों नहीं मिली? असली सवाल यह है कि जिस संगठन को खड़ा करने में उन्होंने अपना लंबा समय लगाया, उसी संगठन की सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद उनके लिए राजनीतिक जगह इतनी सीमित कैसे हो गई?

और इससे भी दिलचस्प सवाल यह है कि क्या भाजपा की राजनीति में संगठन की ताकत से बड़ा चेहरा हो सकता है?

इंजीनियरिंग की डिग्री छोड़ संगठन की प्रयोगशाला में उतरा एक प्रचारक

6 अप्रैल 1962 को नागपुर में जन्मे संजय विनायक जोशी की शुरुआती पहचान किसी बड़े राजनीतिक परिवार या चुनावी विरासत से नहीं बनी थी। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और अध्यापन भी किया। लेकिन पेशेवर जीवन की संभावनाओं के बीच उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बनने का रास्ता चुना।

1988 में उन्हें गुजरात में भाजपा के संगठनात्मक काम की जिम्मेदारी मिली। उस दौर का गुजरात आज जैसा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली भाजपा का गढ़ नहीं था। पार्टी को गांवों, कस्बों और शहरों में अपनी जड़ें मजबूत करनी थीं। कार्यकर्ताओं को जोड़ना था और संगठन को चुनावी ताकत में बदलना था।

यहीं संजय जोशी की असली राजनीतिक पाठशाला शुरू हुई।

उनकी राजनीति का तरीका मंच से ज्यादा मैदान में दिखाई देता था। वे उन लोगों में गिने जाते थे जिनकी राजनीतिक ताकत भाषणों की गूंज से नहीं, बल्कि संगठन की बैठकों, कार्यकर्ताओं के नेटवर्क और लगातार संवाद से बनती थी।

राजनीति में बहुत से लोग नेता बनने आते हैं, लेकिन कुछ लोग नेताओं को चुनाव जिताने वाला संगठन तैयार करते हैं। संजय जोशी की पहचान दूसरी श्रेणी में बनी।

गुजरात में साथ काम, दिल्ली में अलग-अलग राजनीतिक रास्ते!

संजय जोशी और नरेंद्र मोदी का राजनीतिक परिचय नया नहीं था। दोनों ने गुजरात भाजपा में संगठनात्मक जिम्मेदारियों के दौरान एक साथ काम किया था। 1988 से 1995 के बीच दोनों का संगठनात्मक संपर्क रहा।

1998 में संजय जोशी को गुजरात भाजपा का प्रदेश महामंत्री संगठन बनाया गया और 2001 में वे भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री संगठन की जिम्मेदारी तक पहुंच गए।

यह कोई सामान्य पद नहीं था। संगठन महामंत्री का मतलब केवल बैठकों में शामिल होना या नेताओं के बीच समन्वय कराना नहीं होता। यह पद पार्टी की अंदरूनी व्यवस्था की नब्ज समझने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने, प्रदेश इकाइयों को सक्रिय रखने और केंद्रीय नेतृत्व तथा जमीनी संगठन के बीच तालमेल बनाने से जुड़ा होता है।

यानी राजनीति के उस हिस्से में उनकी पहुंच थी, जहां चुनावी पोस्टर पर चेहरे भले किसी और के हों, लेकिन चुनावी मशीनरी को चलाने वाले हाथ पर्दे के पीछे काम करते हैं।

लेकिन राजनीति में पुराने रिश्ते हमेशा पुराने नहीं रहते। समय, परिस्थितियां और महत्वाकांक्षाएं बदलती हैं तो समीकरण भी बदल जाते हैं।

गुजरात की राजनीति में साथ काम करने वाले दो चेहरे आगे चलकर भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति के दो अलग-अलग संदर्भों में दिखाई देने लगे।

2012: एक राजनीतिक घटनाक्रम, जिसने संगठन की ताकत और सत्ता की ताकत का अंतर दिखा दिया

संजय जोशी की राजनीतिक कहानी का सबसे चर्चित मोड़ 2012 में आया।

नरेंद्र मोदी और संजय जोशी के बीच मतभेदों की चर्चा उस समय भाजपा की अंदरूनी राजनीति का बड़ा विषय बनी। जोशी को पार्टी की सक्रिय जिम्मेदारियों से अलग होना पड़ा। उस समय के घटनाक्रम को राजनीतिक विश्लेषणों में मोदी और जोशी के बीच तनाव के संदर्भ में देखा गया।

यहां राजनीति का एक पुराना सिद्धांत फिर दिखाई दिया—संगठन में कितनी भी मजबूत पकड़ क्यों न हो, सत्ता के समीकरण बदलने पर ताकत का संतुलन भी बदल सकता है।

सवाल यह नहीं कि किसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बड़ी थी या किसने किसे पीछे किया। सवाल यह है कि भाजपा जैसी अनुशासित और कैडर आधारित पार्टी में भी अंदरूनी शक्ति-संतुलन कितना निर्णायक हो सकता है।

और इस पूरे घटनाक्रम में संजय जोशी का एक कदम खास तौर पर उल्लेखनीय रहा।

18 जून 2012 को उनके समर्थकों से जुड़ी खबरों के बीच जोशी ने अपील की थी कि उनके समर्थन में पोस्टर न लगाए जाएं और ऐसे प्रदर्शन न किए जाएं जिनसे पार्टी को नुकसान पहुंचे।

राजनीति में जब समर्थक अपने नेता के लिए सड़क पर उतरने को तैयार हों, तब उन्हें संयम बरतने की सलाह देना मामूली बात नहीं है।

यहां एक दिलचस्प विरोधाभास भी दिखाई देता है। जिस व्यक्ति को पार्टी की सक्रिय जिम्मेदारियों से बाहर होना पड़ा, उसी व्यक्ति ने अपने समर्थकों से पार्टी को असहज स्थिति में न डालने की अपील की।

सियासत में अक्सर नेता अपनी कुर्सी बचाने के लिए संगठन का इस्तेमाल करते हैं। जोशी के इस सार्वजनिक रुख में कम से कम संगठन को व्यक्तिगत विवाद से ऊपर रखने का संदेश जरूर दिखाई देता है।

राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य: संगठन बनाने वाले की जगह संगठन में ही सीमित हो जाए!

संजय जोशी की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है।

एक तरफ वे भाजपा के संगठनात्मक ढांचे को समझने और मजबूत करने वाले अनुभवी नेताओं में गिने जाते रहे। दूसरी तरफ राष्ट्रीय राजनीति में उनकी सक्रिय भूमिका सीमित होती चली गई।

यह भारतीय राजनीति का वह मोड़ है जहां व्यक्ति की क्षमता से ज्यादा उसके आसपास के राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

क्योंकि राजनीति में सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि आप कितना काम कर सकते हैं। यह भी मायने रखता है कि आपके काम से किसका राजनीतिक प्रभाव बढ़ता है और किसके समीकरण बदलते हैं।

किसी संगठन में पद देना केवल अनुभव का सम्मान नहीं होता, वह शक्ति-संतुलन का फैसला भी होता है।

इसीलिए संजय जोशी की वापसी का सवाल केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति का सवाल नहीं है। यह भाजपा की उस अंदरूनी राजनीति को समझने का भी विषय है, जिसमें संगठनात्मक अनुभव, नेतृत्व की प्राथमिकताएं और राजनीतिक स्वीकार्यता एक-दूसरे से टकरा सकती हैं।

हालांकि भाजपा ने सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है कि उन्हें दोबारा बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी क्यों नहीं मिली। इसलिए किसी एक नेता को उनकी अनुपस्थिति का जिम्मेदार ठहराना तथ्य के बजाय राजनीतिक अनुमान होगा।

लेकिन इतना जरूर है कि उनका राजनीतिक अध्याय आज भी चर्चा में लौट आता है।

समर्थकों का लगाव और 2015 की वापसी की चर्चाएं

2015 में लखनऊ में संजय जोशी के समर्थकों की ओर से ‘संजय जोशी फैंस क्लब’ बनाए जाने और उन्हें संगठन में जिम्मेदारी देने की मांग की खबरें सामने आई थीं।

यह घटनाक्रम भाजपा के भीतर उनके समर्थक आधार और उनके प्रति कार्यकर्ताओं के एक हिस्से के लगाव को दिखाता था।

उसी दौर में उत्तर प्रदेश में स्वच्छ भारत अभियान और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से भी उनकी सक्रियता की चर्चा हुई।

यहां राजनीति का एक और दिलचस्प पहलू सामने आता है। सक्रिय पद से दूर रहने के बावजूद किसी नेता का नाम समर्थकों के बीच चर्चा में बना रहे तो यह बताता है कि उसकी पहचान केवल सरकारी या पार्टी के पद से नहीं बनी थी।

हालांकि समर्थकों की मांग और पार्टी नेतृत्व के फैसले के बीच दूरी होना भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है।

कार्यकर्ता पोस्टर लगा सकता है, नारे लगा सकता है और मांग उठा सकता है। लेकिन अंतिम फैसला उस कमरे में होता है, जहां संगठनात्मक नियुक्तियों के साथ राजनीतिक गणित भी बैठाया जाता है।

मोदी का दौर और जोशी का सवाल: क्या संगठन में अनुभव से ज्यादा जरूरी राजनीतिक स्वीकार्यता है?

नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व में आने के बाद भाजपा का राजनीतिक विस्तार हुआ। पार्टी ने सत्ता के नए शिखर छुए। संगठन का आकार बढ़ा और चुनावी राजनीति का स्वरूप भी बदला।

ऐसे समय में संजय जोशी जैसे पुराने संगठनकर्ताओं की भूमिका को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या भाजपा को अब भी ऐसे लोगों की जरूरत है जो कार्यकर्ताओं की नब्ज पहचानते हों? क्या पुराने संगठनात्मक अनुभव का इस्तेमाल नई पीढ़ी के नेताओं को तैयार करने में किया जा सकता है? क्या संगठन के पुराने शिल्पियों को नई जिम्मेदारियां देकर पार्टी अपनी जमीनी पकड़ और मजबूत कर सकती है?

या फिर राजनीति का नया दौर यह मानकर चल रहा है कि पुराने संगठनात्मक समीकरणों की जगह नए नेतृत्व और नई कार्यशैली ने ले ली है?

इन सवालों का जवाब भाजपा का मौजूदा नेतृत्व ही दे सकता है।

लेकिन एक बात साफ है—किसी भी बड़े राजनीतिक दल की मजबूती सिर्फ चुनाव जीतने से नहीं आती। उसके पीछे कार्यकर्ताओं का भरोसा, संगठन का अनुशासन और राज्यों में लगातार काम करने वाली टीम होती है।

और इन मोर्चों पर संजय जोशी का अनुभव कम नहीं माना जा सकता।

सादगी की राजनीति बनाम सत्ता की राजनीति

संजय जोशी की सार्वजनिक छवि में सादगी और संगठन के प्रति समर्पण का उल्लेख बार-बार होता रहा है। लेकिन उनकी सादगी को किसी काल्पनिक किस्से या बनावटी संवाद से साबित करने की जरूरत नहीं है।

उनकी यात्रा ही काफी कुछ कहती है।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद प्रचारक का जीवन चुनना, गुजरात में संगठनात्मक काम करना, राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी संभालना और फिर राजनीतिक विवादों के बीच सक्रिय पद से दूर हो जाना—यह एक असामान्य राजनीतिक यात्रा है।

यहां व्यंग्य का सबसे बड़ा विषय भी यही है कि भारतीय राजनीति में संगठन की बात करने वाले दलों में संगठनकर्ता की वास्तविक उपयोगिता का मूल्यांकन आखिर किस आधार पर होता है?

क्या कार्यकर्ताओं के बीच पकड़ होना पर्याप्त है? क्या पुराने अनुभव को नेतृत्व की प्राथमिकताओं से ऊपर जगह मिल सकती है? या फिर संगठन में वही व्यक्ति अधिक उपयोगी माना जाता है, जिसकी राजनीतिक मौजूदगी मौजूदा शक्ति-संतुलन को प्रभावित न करे?

ये सवाल केवल संजय जोशी के नहीं हैं। ये हर उस राजनीतिक कार्यकर्ता के हैं, जिसने पार्टी के लिए वर्षों काम किया और फिर किसी दिन पाया कि सत्ता के नए दौर में उसकी भूमिका बदल चुकी है।

संजय जोशी की वापसी का सवाल: कुर्सी चाहिए या सिर्फ काम की जगह?

आज संजय जोशी को लेकर सबसे बड़ा सवाल उनकी किसी खास कुर्सी पर वापसी का नहीं होना चाहिए।

उनके संगठनात्मक अनुभव का इस्तेमाल किस तरह हो सकता है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है।

कार्यकर्ता प्रशिक्षण, संगठनात्मक समीक्षा, राज्यों में समन्वय, पुराने कार्यकर्ताओं से संवाद और नई पीढ़ी को तैयार करने जैसे क्षेत्रों में उनका अनुभव उपयोगी हो सकता है।

यह जरूरी नहीं कि किसी पुराने संगठनकर्ता को वही पद वापस मिले जो उसने कभी संभाला था। लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि पुराने अनुभव को केवल इसलिए किनारे कर दिया जाए क्योंकि राजनीतिक समय बदल गया है।

भाजपा आज एक बड़ा राजनीतिक संगठन है। ऐसे संगठन में पुराने और नए नेतृत्व के बीच तालमेल बनाना किसी भी केंद्रीय नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती होती है।

और यहीं संजय जोशी का नाम एक बार फिर प्रासंगिक हो जाता है।

आखिरी सवाल: क्या भाजपा अपने संगठन के पुराने शिल्पियों को फिर याद करेगी?

संजय जोशी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा की तरह अचानक वापसी और राजनीतिक चमत्कार की कहानी नहीं है। यह भाजपा के संगठनात्मक इतिहास, अंदरूनी शक्ति-संतुलन और बदलती राजनीतिक प्राथमिकताओं का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

एक दौर था जब उनकी पहचान संगठन की ताकत से होती थी। फिर ऐसा समय आया जब उनका नाम राजनीतिक मतभेदों और पद से दूरी के संदर्भ में चर्चा में रहा। इसके बावजूद उनके समर्थकों के बीच उनकी वापसी की मांग और संगठनात्मक अनुभव की चर्चा खत्म नहीं हुई।

राजनीति में कुर्सियां बदलती रहती हैं। चेहरे बदलते रहते हैं। समीकरण बदलते रहते हैं। लेकिन संगठन के लिए वर्षों तक किया गया काम इतनी आसानी से मिटता नहीं।

संजय जोशी की कहानी भाजपा के सामने एक असहज लेकिन जरूरी सवाल रखती है—क्या किसी राजनीतिक दल के लिए पुराने संगठनकर्ता केवल तब तक उपयोगी होते हैं, जब तक वे सत्ता के मौजूदा समीकरणों के अनुकूल हों?

क्योंकि राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि चुनाव जीतने के लिए चेहरा सामने आता है, लेकिन उस चेहरे को चुनाव जिताने वाली मशीनरी पर्दे के पीछे तैयार होती है।

और कभी-कभी पर्दे के पीछे काम करने वाला वही व्यक्ति सत्ता के सबसे बड़े मंच से गायब हो जाता है।

संजय जोशी की कहानी में यही सबसे दिलचस्प विरोधाभास है।

जिस संगठन को खड़ा करने में उन्होंने सालों लगाए, उसी संगठन की सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बाद उनकी अपनी राजनीतिक भूमिका सीमित हो गई।

अब देखना यह है कि भाजपा अपने इस पुराने संगठन-शिल्पी को इतिहास के एक अध्याय की तरह याद रखती है या बदलते राजनीतिक दौर में उनके अनुभव के लिए कोई नई जगह भी तलाशती है।

क्योंकि सियासत में किसी को किनारे करना आसान हो सकता है, लेकिन उसके किए काम को इतिहास से मिटाना इतना आसान नहीं होता।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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