पटना: वैश्विक ऊर्जा संकट और बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन की बचत करने और ऊर्जा खपत कम करने की अपील की थी। प्रधानमंत्री की अपील के बाद देश के कई हिस्सों में नेताओं और सरकारी प्रतिनिधियों ने प्रतीकात्मक और व्यावहारिक कदम भी उठाए। किसी ने अपने काफिले में गाड़ियां कम कर दीं, कोई इलेक्ट्रिक वाहन से दफ्तर पहुंचने लगा, तो कुछ नेता सार्वजनिक परिवहन और वैकल्पिक साधनों का उपयोग करते दिखाई दिए।
लेकिन बिहार से सामने आई कुछ तस्वीरों ने अब नए राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। पश्चिम चंपारण और समस्तीपुर में मंत्रियों के लंबे काफिले चर्चा का विषय बन गए हैं। विपक्ष से लेकर आम लोगों तक यह सवाल उठ रहा है कि जब प्रधानमंत्री खुद ईंधन बचाने की अपील कर रहे हैं, तो क्या सरकार के प्रतिनिधि उस संदेश को गंभीरता से ले रहे हैं?
पश्चिम चंपारण में मंत्री के काफिले ने खींचा ध्यान
पश्चिम चंपारण जिले में आयोजित एक सहयोग शिविर कार्यक्रम के दौरान बिहार सरकार के मंत्री लखेंद्र कुमार रौशन बेतिया पहुंचे। कार्यक्रम में मंत्री के पहुंचने के दौरान गाड़ियों का लंबा काफिला दिखाई दिया, जिसने लोगों और मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
मौके पर मौजूद मीडिया कैमरों ने जब इस दृश्य को रिकॉर्ड किया, तो मंत्री ने बीच रास्ते में अपनी गाड़ी रुकवाई और स्थिति को लेकर सफाई भी दी।
मंत्री लखेंद्र कुमार रौशन ने कहा कि उनके निजी काफिले में सिर्फ दो गाड़ियां शामिल थीं, जबकि बाकी वाहन जिला प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े थे।
उन्होंने कहा—
“हमारे साथ सिर्फ दो गाड़ियां हैं, बाकी जिला प्रशासन की गाड़ियां हैं।”
हालांकि मंत्री की यह सफाई राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है।
समस्तीपुर में भी दिखा लंबा काफिला
पश्चिम चंपारण के बाद समस्तीपुर से भी ऐसी ही तस्वीर सामने आई। प्रभारी मंत्री दामोदर रावत जब एक सहयोग कार्यक्रम में शामिल होने परिसदन पहुंचे, तो उनके काफिले ने भी लोगों का ध्यान खींच लिया।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, मंत्री के साथ कई सरकारी और प्रशासनिक वाहन मौजूद थे। काफिले में सायरन, हूटर, प्रशासनिक अधिकारी और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी गाड़ियां भी शामिल थीं।
जब यह काफिला सड़कों से गुजरा, तो कई लोग इसे देखकर हैरान रह गए। पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
ईंधन बचत की अपील और जमीनी तस्वीर में अंतर?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे पैदा हुई वैश्विक ऊर्जा चुनौतियों के बीच देशवासियों से ईंधन की बचत करने की अपील की थी।
सरकार की ओर से ऊर्जा संरक्षण और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग पर लगातार जोर दिया जा रहा है। ऐसे में नेताओं के बड़े काफिलों की तस्वीरें सामने आने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या ऊर्जा बचत का संदेश राजनीतिक व्यवस्था के हर स्तर तक समान रूप से पहुंच रहा है।
राजनीतिक बहस तेज
विपक्षी दल इस मुद्दे को सरकार की कथनी और करनी से जोड़कर सवाल उठा सकते हैं। वहीं सरकार की ओर से सुरक्षा प्रोटोकॉल और प्रशासनिक व्यवस्था को ऐसे काफिलों की वजह बताया जा सकता है।
लेकिन सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक सवाल लगातार चर्चा में है—
“अगर ईंधन बचाने का संदेश जनता के लिए है, तो क्या नेताओं को भी उसकी मिसाल नहीं बनना चाहिए?”
अब देखना होगा कि बिहार में सामने आई इन तस्वीरों के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया किस दिशा में जाती है और क्या भविष्य में सरकारी काफिलों को लेकर कोई नई व्यवस्था देखने को मिलती है।














