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हरदीप पुरी की राज्यसभा में एंट्री… दो नामांकन खारिज, मुकाबला खत्म! मध्य प्रदेश में चुनाव हुआ या सियासी पटकथा का मंचन?

“एक उम्मीदवार मैदान में बचा, दो के पर्चे नियमों की कसौटी पर गिरे और राज्यसभा की एक सीट पर बिना वोटों की गिनती के ही फैसला हो गया। एल मुरुगन के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर हरदीप सिंह पुरी की निर्विरोध जीत ने एक बार फिर भारतीय राजनीति के उस चेहरे को सामने ला दिया है, जहां चुनावी मुकाबले से ज्यादा दिलचस्पी नामांकन, समर्थन और सियासी गणित में दिखाई देती है।”

भोपाल/मध्य प्रदेश। लोकतंत्र में चुनाव का मतलब आमतौर पर उम्मीदवारों की भीड़, प्रचार का शोर, मतदाताओं की कतारें और अंत में वोटों की गिनती के बाद जीत-हार का फैसला होता है। लेकिन भारतीय राजनीति में एक ऐसी चुनावी प्रक्रिया भी है, जिसमें मुकाबला शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाता है। न प्रचार की जरूरत, न मतदाताओं को मनाने की कवायद और न ही मतपेटियों में बंद जनादेश का इंतजार। बस नामांकन दाखिल हुआ, जांच हुई, दो पर्चे खारिज हुए और एक उम्मीदवार के हिस्से निर्विरोध जीत का प्रमाणपत्र आ गया।

मध्य प्रदेश से राज्यसभा की सीट पर केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का निर्विरोध निर्वाचन इसी राजनीतिक तस्वीर का ताजा उदाहरण है। गुरुवार को पुरी को राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने राज्य विधानसभा में रिटर्निंग ऑफिसर उमेश कुमार शर्मा से उनका चुनाव प्रमाणपत्र प्राप्त किया।

इस मौके पर उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा और भगवानदास सबनानी भी मौजूद रहे।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया की सबसे दिलचस्प बात यह नहीं कि हरदीप पुरी निर्विरोध चुने गए। असली कहानी यह है कि जिस सीट पर चुनाव होना था, वहां मुकाबले की गुंजाइश आखिर बची ही क्यों नहीं? दो उम्मीदवारों के नामांकन खारिज होने के बाद राजनीतिक मैदान ऐसा साफ हुआ कि चुनावी प्रक्रिया में मतदान की नौबत ही नहीं आई।

लोकतंत्र का चुनावी कैलेंडर अपनी जगह चलता रहा, लेकिन मुकाबले की पटकथा ने उससे पहले ही अंतिम दृश्य दिखा दिया।

नामांकन के मैदान में तीन चेहरे, अंतिम तस्वीर में सिर्फ एक

राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया में हरदीप सिंह पुरी के अलावा राजकुमार लोहानी और कांते सयाना ने भी नामांकन दाखिल किया था। कागजों पर तीन उम्मीदवार थे, लेकिन नामांकन की जांच के बाद यह संख्या घटकर एक रह गई।

रिटर्निंग ऑफिसर ने 3 नवंबर को हरदीप पुरी का नामांकन स्वीकार कर लिया था। इस दौरान कांग्रेस नेताओं और निर्दलीय उम्मीदवारों की ओर से उठाई गई आपत्तियों को भी जांच के बाद खारिज कर दिया गया।

इसके बाद दो अन्य उम्मीदवारों के नामांकन पत्रों पर नियमों की ऐसी तलवार चली कि राज्यसभा की सीट पर मुकाबला पूरी तरह समाप्त हो गया।

कांते सयाना का नामांकन आवश्यक प्रस्तावकों की शर्त पूरी नहीं करने के कारण खारिज हुआ। राजकुमार लोहानी का नामांकन जरूरी Form 26 हलफनामा समय पर जमा नहीं होने के कारण स्वीकार नहीं किया गया।

नतीजा यह हुआ कि चुनावी मैदान में हरदीप पुरी अकेले रह गए।

अब सवाल यह है कि जब उम्मीदवार ही एक बचा, तो मतदान किसके बीच होता? लोकतंत्र की प्रक्रिया में नियमों का पालन अनिवार्य है। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो इस घटनाक्रम ने एक बार फिर उस स्थिति को उजागर किया, जहां चुनाव का सबसे निर्णायक मोड़ मतदाताओं के सामने नहीं, बल्कि नामांकन की मेज पर दिखाई देता है।

दस विधायकों के समर्थन का गणित और एक हलफनामे की चूक

राज्यसभा चुनाव में नामांकन दाखिल करना केवल चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर करना नहीं होता। इसके साथ कुछ कानूनी और प्रक्रियागत शर्तें भी जुड़ी होती हैं। इन शर्तों को पूरा किए बिना उम्मीदवार का राजनीतिक दावा आगे नहीं बढ़ सकता।

रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश के मुताबिक, कांते सयाना का नामांकन इसलिए खारिज हुआ क्योंकि वे राज्य विधानसभा के कम-से-कम 10 प्रतिशत निर्वाचित सदस्यों या 10 निर्वाचित सदस्यों, जो भी संख्या कम हो, के हस्ताक्षर की अनिवार्य शर्त पूरी नहीं कर पाए।

राजकुमार लोहानी के मामले में मामला अलग था। वे 2 नवंबर 2026 को दोपहर 3 बजे तक आवश्यक Form 26 हलफनामा जमा नहीं कर सके। चुनावी प्रक्रिया में दस्तावेजों की समयसीमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है, जितना उम्मीदवार का राजनीतिक समर्थन।

यहां राजनीति की विडंबना देखिए। एक तरफ केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के नामांकन को लेकर आपत्तियां उठीं, जिनका निस्तारण जांच के दौरान किया गया। दूसरी तरफ दो अन्य उम्मीदवार जरूरी प्रक्रियागत शर्तों पर खरे नहीं उतर सके।

किसी उम्मीदवार के लिए चुनावी मैदान में उतरना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी है उस मैदान में टिके रहने की तैयारी।

राज्यसभा चुनाव की यह प्रक्रिया एक सीधा संदेश भी देती है—राजनीतिक महत्वाकांक्षा अपनी जगह है, लेकिन नामांकन के कागजों पर नियमों की पकड़ उससे कहीं अधिक मजबूत होती है।

5 नवंबर की समयसीमा और चुनाव का अंतिम दृश्य

नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख 5 नवंबर थी। दोपहर 3 बजे तक नाम वापस लेने की समयसीमा समाप्त हुई। लेकिन मुकाबले में कोई दूसरा उम्मीदवार बचा ही नहीं था।

ऐसे में हरदीप सिंह पुरी का निर्विरोध निर्वाचन घोषित कर दिया गया।

राजनीतिक भाषा में इसे निर्विरोध जीत कहा जाता है। चुनावी प्रक्रिया की भाषा में यह उस स्थिति का परिणाम है, जहां निर्धारित समयसीमा के बाद वैध उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों के बराबर रह जाती है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह रही कि चुनाव की घोषणा से लेकर निर्वाचन प्रमाणपत्र मिलने तक राजनीतिक समीकरणों का अंतिम परिणाम मतदान के बिना सामने आ गया।

यह कोई असामान्य संवैधानिक प्रक्रिया नहीं है। राज्यसभा चुनाव में निर्विरोध निर्वाचन पहले भी होते रहे हैं। लेकिन हर निर्विरोध चुनाव अपने पीछे एक राजनीतिक सवाल जरूर छोड़ता है—क्या मुकाबला वास्तव में इतना कमजोर था, या चुनावी प्रक्रिया के भीतर ही मुकाबले की संभावनाएं समाप्त हो गईं?

मध्य प्रदेश की इस सीट पर भी यही सवाल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन सकता है।

एल मुरुगन के इस्तीफे से खाली हुई सीट, पुरी के नाम दर्ज हुआ अगला अध्याय

यह राज्यसभा सीट केंद्रीय राज्य मंत्री एल मुरुगन के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। मुरुगन ने 14 अक्टूबर को इस्तीफा दिया था। उनका राज्यसभा कार्यकाल मूल रूप से 2 अप्रैल 2030 तक चलना था।

इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई और भाजपा ने हरदीप सिंह पुरी को अपना उम्मीदवार बनाया।

पुरी ने 31 अक्टूबर को भोपाल में मध्य प्रदेश विधानसभा में अपना नामांकन दाखिल किया था। इस दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव, उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला और जगदीश देवड़ा, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, राज्य के कैबिनेट मंत्री और पार्टी के अन्य नेता मौजूद थे।

नामांकन के समय मौजूद नेताओं की तस्वीर अपने आप में राजनीतिक संदेश दे रही थी। मुख्यमंत्री से लेकर संगठन के प्रदेश अध्यक्ष तक की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया था कि भाजपा इस चुनाव को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया के तौर पर नहीं देख रही थी।

हालांकि, चुनावी प्रक्रिया के अंतिम चरण में मुकाबला खत्म हो जाने के बाद उस राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन भी एक तरह से औपचारिकता बनकर रह गया।

पुरी का नामांकन दाखिल हुआ, जांच में स्वीकार हुआ और फिर दो अन्य उम्मीदवारों के नामांकन खारिज होने के बाद जीत का रास्ता साफ हो गया।

भाजपा के लिए जीत, लेकिन विपक्ष के लिए सवालों का मैदान

राज्यसभा चुनाव में निर्विरोध जीत भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से सहज परिणाम है। पार्टी को एक अतिरिक्त चुनावी संघर्ष से गुजरना नहीं पड़ा। न मतदान की चिंता, न विधायकों की क्रॉस वोटिंग का जोखिम और न ही मतगणना के बाद किसी अप्रत्याशित नतीजे का इंतजार।

लेकिन विपक्ष के लिए यह घटनाक्रम एक अलग तरह की चुनौती भी है।

कांग्रेस नेताओं और निर्दलीय उम्मीदवारों की ओर से पुरी के नामांकन पर आपत्तियां उठाई गई थीं। हालांकि जांच के दौरान वे आपत्तियां खारिज कर दी गईं। इसके बाद चुनावी मैदान में विपक्ष की ओर से कोई वैध उम्मीदवार नहीं बचा।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी उम्मीदवार का निर्विरोध चुना जाना अपने आप में चुनावी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। यदि नामांकन वैध हैं, नियमों का पालन हुआ है और निर्वाचन प्रक्रिया निर्धारित प्रावधानों के अनुसार पूरी हुई है, तो निर्विरोध निर्वाचन भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का ही हिस्सा है।

फिर भी राजनीतिक विमर्श में निर्विरोध चुनावों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या विपक्ष ने पर्याप्त तैयारी की थी? क्या उम्मीदवारों के नामांकन से पहले आवश्यक समर्थन और दस्तावेजों की जांच की गई थी? क्या चुनावी रणनीति के स्तर पर कोई चूक हुई?

इन सवालों का जवाब संबंधित पक्षों के पास होगा। लेकिन इतना तय है कि इस चुनाव में भाजपा की राजनीतिक बढ़त केवल उम्मीदवार घोषित करने तक सीमित नहीं रही। अंतिम परिणाम तक पहुंचने के लिए आवश्यक चुनावी प्रक्रिया भी उसके पक्ष में पूरी हुई।

निर्विरोध निर्वाचन की राजनीति: चुनाव का शोर नहीं, प्रक्रिया का असर

भारतीय राजनीति में राज्यसभा चुनावों का महत्व लोकसभा या विधानसभा चुनावों से अलग होता है। यहां जनता सीधे मतदान नहीं करती। राज्यसभा सदस्यों का चुनाव निर्वाचित विधायक करते हैं। ऐसे में उम्मीदवारों की राजनीतिक स्वीकार्यता, दलों का समर्थन, संख्या बल और चुनावी रणनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लेकिन जब किसी सीट पर एक ही वैध उम्मीदवार बचता है, तो मतदान की जरूरत समाप्त हो जाती है।

यही वजह है कि निर्विरोध निर्वाचन को केवल जीत के आंकड़े से नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे चुनावी प्रक्रिया, उम्मीदवारों की तैयारी और राजनीतिक दलों की रणनीति भी देखनी पड़ती है।

मध्य प्रदेश की इस सीट पर भाजपा के उम्मीदवार हरदीप सिंह पुरी निर्विरोध चुने गए। यह परिणाम पार्टी के लिए एक राजनीतिक उपलब्धि है। लेकिन इस उपलब्धि की कहानी में दो अन्य उम्मीदवारों के नामांकन खारिज होने की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

राजनीति में कई बार जीत का अंतर हजारों या लाखों वोटों से तय होता है। कभी-कभी जीत का अंतर शून्य मतदान होता है, क्योंकि मुकाबले में दूसरा उम्मीदवार ही नहीं बचता।

यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ।

पर्दे के पीछे की कहानी: एक सीट, कई राजनीतिक संकेत

हरदीप सिंह पुरी का मध्य प्रदेश से राज्यसभा पहुंचना केवल एक सीट भरने की प्रक्रिया नहीं है। यह भाजपा के संगठनात्मक और राजनीतिक प्रबंधन का भी एक उदाहरण है।

केंद्रीय मंत्री के नामांकन के समय प्रदेश के शीर्ष नेताओं की मौजूदगी, नामांकन की जांच में उठी आपत्तियों का निस्तारण और अंततः दो उम्मीदवारों के नामांकन खारिज होने के बाद निर्विरोध निर्वाचन—इन सभी घटनाओं ने मिलकर इस चुनाव को एक दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम बना दिया।

हालांकि, इसे किसी गुप्त राजनीतिक समझौते या पर्दे के पीछे तय की गई साजिश का परिणाम बताने के लिए उपलब्ध तथ्यों में पर्याप्त आधार नहीं है। चुनावी प्रक्रिया के दस्तावेजों में जो कारण सामने आए हैं, वे नामांकन की वैधानिक शर्तों और जरूरी कागजात से संबंधित हैं।

लेकिन राजनीतिक व्यंग्य अपनी जगह कायम है।

एक तरफ लोकतंत्र में चुनाव को जनता की आवाज का सबसे बड़ा माध्यम बताया जाता है। दूसरी तरफ राज्यसभा की इस सीट पर लोकतंत्र की पूरी चुनावी मशीनरी चलती रही, लेकिन अंत में जनता के सामने मतदान का दृश्य आया ही नहीं।

नामांकन दाखिल हुए, आपत्तियां उठीं, जांच हुई, दो पर्चे खारिज हुए और एक उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिया गया।

राजनीतिक मंच पर पर्दा गिरा, लेकिन सवालों की गूंज बाकी रह गई।

जीत का प्रमाणपत्र मिला, मुकाबले का सवाल बाकी

हरदीप सिंह पुरी का मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचन भाजपा के लिए एक सफल राजनीतिक परिणाम है। एल मुरुगन के इस्तीफे से खाली हुई सीट अब पुरी के नाम दर्ज हो गई है।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने रिटर्निंग ऑफिसर उमेश कुमार शर्मा से उनका निर्वाचन प्रमाणपत्र प्राप्त किया। इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधायक मौजूद रहे।

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे रोचक पहलू यही है कि राज्यसभा की एक सीट पर चुनाव हुआ, पर मुकाबला नहीं हुआ। लोकतंत्र की प्रक्रिया पूरी हुई, पर मतदान की जरूरत नहीं पड़ी।

दो उम्मीदवारों के नामांकन खारिज होने के बाद हरदीप पुरी अकेले रह गए। और जब मैदान में कोई दूसरा खिलाड़ी ही नहीं बचा, तो जीत का फैसला भी बिना किसी मतगणना के हो गया।

राजनीति में इसे निर्विरोध जीत कहा जाता है। व्यंग्य की भाषा में कहें तो यह ऐसा चुनाव था, जिसमें जीत का प्रमाणपत्र तो मिला, लेकिन चुनावी मुकाबले की कहानी शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गई।

अब सवाल केवल यह नहीं कि हरदीप पुरी राज्यसभा पहुंच गए। सवाल यह भी है कि मध्य प्रदेश की इस सीट पर विपक्ष मुकाबले की जमीन तैयार क्यों नहीं कर पाया?

क्योंकि लोकतंत्र में जीत का महत्व अपनी जगह है, लेकिन मजबूत मुकाबले का महत्व भी कम नहीं होता।

और इस बार मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट पर जीत की कहानी तो लिखी गई, मगर मुकाबले का अध्याय खाली रह गया।

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