“84 वर्ष की उम्र में श्रीमती परमेश्वरी देवी ने ली अंतिम विदाई, पांच बेटों सहित भरे-पूरे परिवार को छोड़ गईं पीछे; मां के बिछोह से यादव परिवार में पसरा गहरा मातम”
नोएडा। जीवन में कुछ दुख ऐसे होते हैं, जिनके सामने शब्द भी मौन हो जाते हैं। कुछ बिछोह ऐसे होते हैं, जिनकी पीड़ा को न तो आंसुओं में पूरी तरह व्यक्त किया जा सकता है और न ही किसी सांत्वना के सहारे कम किया जा सकता है। मां का जाना भी ऐसा ही एक दुख है। पिता के चले जाने के बाद संतान के सिर से एक मजबूत छत जरूर उठ जाती है, लेकिन मां के जाने पर जीवन का वह आंगन ही सूना हो जाता है, जहां लौटकर इंसान हर उम्र में सुकून तलाशता है। मां के रहते व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसके भीतर एक बच्चा हमेशा जीवित रहता है। लेकिन जब मां विदा हो जाती है, तो उस बच्चे का संसार भी जैसे कहीं खो जाता है।
कुछ ऐसी ही असहनीय पीड़ा से समाजवादी पार्टी के प्रदेश सचिव एवं नोएडा के पूर्व महानगर अध्यक्ष राकेश यादव और उनका परिवार गुजर रहा है। उनकी पूजनीय माताजी श्रीमती परमेश्वरी देवी का 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से यादव परिवार में शोक की गहरी लहर दौड़ गई। परिवार के सदस्यों के लिए यह केवल एक प्रियजन को खोने का दुख नहीं, बल्कि उस ममता, उस अपनत्व और उस भावनात्मक सहारे से बिछड़ने का दर्द है, जो जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी संतान को भीतर से मजबूत बनाए रखता है।
श्रीमती परमेश्वरी देवी के निधन से परिवार का वह केंद्र बिंदु हमेशा के लिए शांत हो गया, जिसके इर्द-गिर्द रिश्तों की गर्माहट, आपसी प्रेम और पारिवारिक एकता की दुनिया बसती थी। मां का आंचल केवल कपड़े का एक हिस्सा नहीं होता, वह जीवन की सबसे सुरक्षित छत होता है। मां की आवाज केवल पुकार नहीं होती, वह संतान के लिए विश्वास का सबसे गहरा आश्वासन होती है। और मां की उपस्थिति केवल घर में एक व्यक्ति का होना नहीं, बल्कि पूरे परिवार के भावनात्मक संसार का जीवित रहना होती है।
मां के जाने से टूटता है जीवन का सबसे मजबूत भावनात्मक सहारा
मां की उम्र चाहे 40 वर्ष हो या 84 वर्ष, संतान के लिए वह हमेशा मां ही रहती है। उम्र के साथ बेटे की जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, उसका सामाजिक दायरा विस्तृत होता है, दुनिया उसे सम्मान और पहचान देती है, लेकिन मां के सामने वह आजीवन उसी बच्चे की तरह रहता है, जिसे कभी उसकी उंगली पकड़कर चलना सिखाया गया था।
राकेश यादव के लिए भी माताजी श्रीमती परमेश्वरी देवी केवल जन्म देने वाली मां नहीं थीं, बल्कि जीवन के संस्कारों, पारिवारिक मूल्यों और भावनात्मक शक्ति का वह आधार थीं, जिसके सहारे जीवन की लंबी यात्रा तय होती है। मां का जाना उस रिश्ते का बिछोह है, जिसकी जगह दुनिया का कोई दूसरा रिश्ता नहीं ले सकता।
पिता के निधन के बाद व्यक्ति को अक्सर परिवार की जिम्मेदारियों का एहसास और अधिक गहराई से होता है, लेकिन मां के चले जाने पर उसे अपने भीतर एक ऐसी रिक्तता महसूस होती है, जिसे भर पाना संभव नहीं होता। मां के रहते घर लौटने की एक वजह होती है, मन की बातें कहने का एक ठिकाना होता है और जीवन की तमाम परेशानियों के बीच यह भरोसा बना रहता है कि कहीं कोई है, जो बिना किसी शर्त के हमारी चिंता करता है।
मां के जाने के बाद यही भरोसा स्मृतियों में बदल जाता है। उसकी जगह कोई नहीं ले सकता। यही कारण है कि मां का बिछोह केवल एक परिवार की निजी पीड़ा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का वह पक्ष है, जिसे हर व्यक्ति अपने जीवन में किसी न किसी रूप में महसूस करता है।
सरल स्वभाव, धार्मिक विचार और ममता से भरा था जीवन
श्रीमती परमेश्वरी देवी बेहद सरल, सौम्य, धार्मिक और ममतामयी स्वभाव की महिला थीं। उनका जीवन पारिवारिक संस्कारों, सामाजिक मूल्यों और आपसी प्रेम की मिसाल रहा। उन्होंने अपने परिवार को केवल रिश्तों के धागे से नहीं, बल्कि स्नेह, त्याग, विश्वास और संस्कारों की मजबूत डोर से बांधे रखा।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता परिवार के प्रति समर्पण और बच्चों को अच्छे संस्कार देने की भावना थी। उन्होंने अपने बच्चों को मेहनत, ईमानदारी, पारिवारिक एकता और सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
एक मां का योगदान अक्सर परिवार की चारदीवारी के भीतर सीमित दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में वही योगदान परिवार की आने वाली पीढ़ियों के चरित्र और व्यक्तित्व की नींव तैयार करता है। मां अपने बच्चों को केवल जन्म नहीं देती, वह उन्हें जीवन जीने का तरीका सिखाती है। वह अपने त्याग से परिवार को जोड़ती है और अपने संस्कारों से बच्चों को समाज में सम्मानपूर्वक जीने की राह दिखाती है।
श्रीमती परमेश्वरी देवी ने भी अपने जीवन में इन्हीं मूल्यों को सर्वोपरि रखा। उनके दिए संस्कार और उनके जीवन की सीख अब परिवार के लिए ऐसी अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें समय कभी मिटा नहीं सकेगा।
पांच बेटों सहित भरा-पूरा परिवार छोड़ गईं
श्रीमती परमेश्वरी देवी अपने पीछे पांच पुत्रों सतपाल यादव, महेश यादव, राकेश यादव, मुकेश यादव और प्रमोद यादव सहित पुत्रवधुओं, पौत्र-पौत्रियों, नाती-नातिनों और भरे-पूरे परिवार को छोड़ गई हैं।
जिस मां ने जीवनभर परिवार को सहेजने और एकजुट रखने का प्रयास किया, उसके जाने से आज वही परिवार गहरे शोक में डूबा है। परिवार के सदस्यों के लिए यह ऐसा समय है, जब मां की स्मृतियां बार-बार आंखों को नम कर रही हैं। घर का हर कोना, हर रिश्ता और हर पारिवारिक क्षण अब उनकी अनुपस्थिति का एहसास कराएगा।
मां के जाने के बाद घर तो वही रहता है, दीवारें भी वही रहती हैं, रिश्ते भी वही रहते हैं, लेकिन घर की आत्मा जैसे कहीं खो जाती है। मां की मौजूदगी से जो अपनापन पैदा होता है, वह किसी भौतिक वस्तु से नहीं खरीदा जा सकता। उनका स्नेह परिवार के हर सदस्य के जीवन में एक ऐसी अमिट छाप छोड़ गया है, जो आने वाले वर्षों में भी उतनी ही गहरी बनी रहेगी।
राजनीतिक और सामाजिक जगत में भी शोक की लहर
राकेश यादव समाजवादी पार्टी में प्रदेश सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे हैं और नोएडा में पार्टी के पूर्व महानगर अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके परिवार में हुए इस दुखद निधन से समाजवादी पार्टी के नेताओं, कार्यकर्ताओं, राजनीतिक सहयोगियों, रिश्तेदारों और शुभचिंतकों में भी शोक की लहर दौड़ गई है।
राजनीतिक जीवन में व्यक्ति की पहचान उसके पद, संघर्ष और सार्वजनिक जिम्मेदारियों से होती है, लेकिन परिवार के भीतर वह सबसे पहले किसी का बेटा होता है। मां के निधन के समय राजनीतिक पद और सामाजिक प्रतिष्ठा भी उस भावनात्मक पीड़ा को कम नहीं कर सकते, जिसे एक संतान अपने हृदय में महसूस करती है।
इस कठिन घड़ी में शोक संवेदनाएं व्यक्त करने वाले सभी लोगों की भावनाएं राकेश यादव और उनके परिवार के लिए संबल का माध्यम बन रही हैं। हालांकि, मां के जाने से पैदा हुई रिक्तता को कोई शब्द भर नहीं सकते, लेकिन अपनों का साथ इस असहनीय दुख को सहने की शक्ति जरूर देता है।
मां की स्मृतियां ही अब जीवन की सबसे अनमोल पूंजी
श्रीमती परमेश्वरी देवी का निधन यादव परिवार के लिए ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं है। उनका भौतिक शरीर भले ही इस संसार से विदा हो गया हो, लेकिन उनके संस्कार, उनकी सीख, उनकी ममता और उनके त्याग की स्मृतियां हमेशा परिवार के साथ रहेंगी।
मां का जीवन समाप्त नहीं होता, वह अपनी संतान के व्यवहार, विचारों और संस्कारों में जीवित रहती है। जब कोई बेटा अपने परिवार को एकजुट रखता है, जब कोई बेटी कठिन परिस्थितियों में धैर्य दिखाती है, जब अगली पीढ़ी अपने बड़ों का सम्मान करती है, तब कहीं न कहीं मां के दिए संस्कार ही आगे बढ़ते हैं।
राकेश यादव और उनके परिवार के लिए आने वाला समय भावनात्मक रूप से बेहद कठिन होगा। मां की अनुपस्थिति हर खुशी में महसूस होगी, हर पारिवारिक अवसर पर उनकी याद आएगी और जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में उनके आशीर्वाद की कमी खलेगी।
लेकिन मां की सबसे बड़ी विरासत यही होती है कि वह अपने जाने के बाद भी अपने बच्चों को टूटने नहीं देती। उनकी स्मृतियां ही आगे बढ़ने की प्रेरणा बनती हैं। उनका स्नेह ही जीवन की कठिन राहों पर संबल देता है।
श्रीमती परमेश्वरी देवी के निधन पर गहरी शोक संवेदनाएं। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा राकेश यादव सहित समस्त शोकाकुल परिवार को इस असहनीय दुख को सहन करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करें।
मां का जाना जीवन की उस रोशनी का बुझ जाना है, जिसके रहते इंसान को कभी अपने अकेले होने का एहसास नहीं होता। मां की ममता भले ही आंखों से ओझल हो जाए, लेकिन उसका आशीर्वाद और उसके संस्कार जीवनभर संतान के साथ चलते रहते हैं।
ॐ शांति।















