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रिटायरमेंट के तीन महीने बाद सियासत में एंट्री! धामपुर की कुर्सी पर पूर्व DM की नजर, BJP के टिकट की दावेदारी से मची हलचल

 

“धामपुर में अब विकास का प्रशासनिक मॉडल चलेगा या पुराने सियासी समीकरण? पूर्व IAS डॉ. दिनेश चंद्र सिंह ने खोला चुनावी पत्ता, भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने का ऐलान; स्थानीय नेताओं के सामने खड़ा हुआ नया सवाल।”

बिजनौर। उत्तर प्रदेश की राजनीति में नेताओं का दल बदलना, टिकट के लिए दिल्ली-लखनऊ की परिक्रमा करना और चुनाव से पहले अचानक जनसेवा की याद आना कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब कोई अधिकारी दशकों तक सरकारी व्यवस्था का हिस्सा रहने के बाद रिटायरमेंट के महज तीन महीने के भीतर सीधे चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर दे, तो सवाल सिर्फ उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का नहीं रहता, बल्कि उस पूरी राजनीतिक व्यवस्था का हो जाता है, जिसमें प्रशासनिक अनुभव को चुनावी पूंजी में बदलने की संभावनाएं तलाशी जाने लगती हैं।

बिजनौर की धामपुर विधानसभा सीट पर इन दिनों कुछ ऐसा ही घटनाक्रम देखने को मिल रहा है। प्रदेश के कई जिलों में जिलाधिकारी के रूप में सेवाएं दे चुके पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. दिनेश चंद्र सिंह ने सक्रिय राजनीति में उतरने का ऐलान करते हुए भारतीय जनता पार्टी से धामपुर विधानसभा का टिकट मांगा है। यानी सरकारी फाइलों, प्रशासनिक बैठकों और चुनावी प्रशिक्षण की दुनिया से निकलकर अब उनका अगला लक्ष्य विधानसभा की चौखट तक पहुंचना है।

31 अक्टूबर को बिजनौर के एक निजी रिसोर्ट में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने अपनी राजनीतिक मंशा सार्वजनिक कर दी। उन्होंने साफ कहा कि वह धामपुर क्षेत्र के पुरैनी गांव के मूल निवासी हैं और अब अपने गृह क्षेत्र में रहकर लोगों की सेवा करना चाहते हैं। उनकी बातों में स्थानीय जुड़ाव था, प्रशासनिक अनुभव का हवाला था और भाजपा की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता का दावा भी।

लेकिन राजनीति में किसी घोषणा का महत्व सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि उसे किसने किया है। असली सवाल यह होता है कि घोषणा किस समय हुई, किस मंच से हुई और उससे किन लोगों के राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। धामपुर में पूर्व डीएम की इस घोषणा ने इन्हीं सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

तीन महीने पहले तक डीएम, अब विधानसभा का सपना

डॉ. दिनेश चंद्र सिंह का प्रशासनिक सफर कई जिलों से होकर गुजरा है। वह जौनपुर, सहारनपुर, बहराइच और कानपुर देहात जैसे जिलों में जिलाधिकारी रह चुके हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह करीब तीन महीने पहले जौनपुर के जिलाधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुए। अब उन्होंने अपनी अगली पारी के लिए प्रशासनिक पद नहीं, बल्कि राजनीतिक मंच चुना है।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि नौकरशाही से राजनीति में आने वाले अधिकारियों के लिए प्रशासनिक अनुभव अक्सर सबसे बड़ा परिचय बनता है। उनके पास सरकारी योजनाओं के संचालन, अधिकारियों के साथ काम करने, चुनावी प्रक्रिया को समझने और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली का अनुभव होता है। लेकिन विधानसभा का चुनाव केवल प्रशासन चलाने की परीक्षा नहीं है। यहां संगठन, कार्यकर्ता, जातीय और सामाजिक समीकरण, स्थानीय मुद्दे, राजनीतिक स्वीकार्यता और पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

डॉ. सिंह अपनी प्रशासनिक पृष्ठभूमि को धामपुर के विकास में इस्तेमाल करने की बात कर रहे हैं। मगर अब उन्हें यह भी दिखाना होगा कि प्रशासनिक अनुभव को राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व में किस तरह बदला जा सकता है।

गिलहरी वाला उदाहरण और बाहरी नेताओं पर निशाना

प्रेस कॉन्फ्रेंस में डॉ. दिनेश चंद्र सिंह ने अपने स्थानीय होने को राजनीतिक पहचान का प्रमुख आधार बनाया। उन्होंने महात्मा विदुर की धरती का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां से कई लोग चुनाव जीतकर बड़े पदों तक पहुंचे, लेकिन बाहरी नेता चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र की सेवा के लिए वापस नहीं आए।

यह बयान केवल स्थानीय भावनाओं से जुड़ने की कोशिश के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके भीतर एक राजनीतिक संदेश भी छिपा है। वह अपने संभावित प्रतिद्वंद्वियों के सामने स्थानीय बनाम बाहरी का सवाल रख रहे हैं। यानी चुनावी चर्चा शुरू होने से पहले ही उन्होंने अपनी पहचान को एक अलग राजनीतिक आधार देने की कोशिश की है।

रामसेतु निर्माण में गिलहरी के योगदान का उदाहरण देकर उन्होंने कहा कि वह भी बिजनौर के विकास में अपना छोटा-सा योगदान देना चाहते हैं। सुनने में यह विनम्रता का संदेश है, लेकिन चुनावी राजनीति में ऐसे प्रतीकात्मक उदाहरणों का अपना महत्व होता है। इनके जरिए उम्मीदवार खुद को जनता के करीब, जमीन से जुड़ा और स्थानीय विकास के प्रति समर्पित दिखाने का प्रयास करते हैं।

हालांकि, धामपुर की जनता के सामने भविष्य में इससे बड़ा सवाल भी रहेगा—स्थानीय होने का दावा विकास की ठोस योजना में कैसे बदलेगा? और क्या केवल जन्मस्थान का जुड़ाव चुनावी स्वीकार्यता के लिए पर्याप्त होगा?

15 दिनों में लाखों आयुष्मान कार्ड: प्रशासनिक रिकॉर्ड बनेगा चुनावी परिचय?

डॉ. सिंह अपनी प्रशासनिक उपलब्धियों को भी सार्वजनिक चर्चा में ला रहे हैं। उनके मुताबिक, सहारनपुर के जिलाधिकारी रहते हुए उन्होंने महज 15 दिनों में 2.54 लाख आयुष्मान कार्ड बनवाए थे। इस कार्य के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव की ओर से सम्मानित किए जाने का भी उन्होंने उल्लेख किया।

बताया जाता है कि देशभर में चुनावी प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी उनकी पहचान रही है और उन्हें एक प्रभावी चुनाव प्रशिक्षक आईएएस अधिकारी के रूप में देखा गया है।

यही वह बिंदु है जहां उनकी राजनीतिक दावेदारी का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है। एक तरफ वह प्रशासनिक दक्षता और सरकारी योजनाओं को जमीन पर उतारने के अनुभव को अपनी ताकत बता रहे हैं, दूसरी तरफ अब उन्हें जनता के बीच राजनीतिक संगठन खड़ा करने और चुनावी समर्थन जुटाने की चुनौती का सामना करना होगा।

प्रशासन में जिलाधिकारी के पास सरकारी मशीनरी होती है, पद की जिम्मेदारी होती है और निर्णय लागू कराने का संस्थागत अधिकार होता है। चुनाव में उम्मीदवार के पास न तो वह पद होता है और न ही प्रशासनिक अधिकार। वहां जनता का विश्वास और संगठन की ताकत ही असली आधार बनते हैं। इसीलिए डीएम की कुर्सी से विधानसभा की कुर्सी तक का सफर केवल पद परिवर्तन नहीं, बल्कि पूरी कार्यशैली और भूमिका में बदलाव की परीक्षा भी है।

भाजपा का टिकट: असली कहानी यहीं से शुरू होती है

डॉ. दिनेश चंद्र सिंह ने भाजपा की राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित होने की बात कही है और धामपुर सीट से पार्टी का टिकट मिलने की उम्मीद जताई है। लेकिन राजनीति में टिकट मांगना और टिकट मिलना दो अलग-अलग घटनाएं हैं।

भाजपा के लिए भी यह फैसला केवल किसी पूर्व आईएएस अधिकारी की प्रशासनिक उपलब्धियों को देखकर नहीं होगा। पार्टी को स्थानीय संगठन, मौजूदा राजनीतिक प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय समीकरण, कार्यकर्ताओं की भूमिका और संभावित उम्मीदवारों की स्थिति जैसे पहलुओं पर विचार करना होगा।

धामपुर में पहले से सक्रिय राजनीतिक चेहरों और स्थानीय दावेदारों के बीच किसी नए नाम की एंट्री स्वाभाविक रूप से चर्चा पैदा करती है। खासकर तब, जब नया दावेदार सीधे पार्टी के टिकट की बात सार्वजनिक मंच से करे।

स्थानीय कार्यकर्ताओं के सामने भी एक सवाल खड़ा हो सकता है। वर्षों से संगठन में काम करने वाले नेताओं की दावेदारी और प्रशासनिक पृष्ठभूमि के साथ आने वाले नए चेहरे के बीच पार्टी किस तरह संतुलन बनाएगी? क्या प्रशासनिक अनुभव को प्राथमिकता मिलेगी या संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहने वाले नेताओं की भूमिका निर्णायक होगी? फिलहाल इन सवालों का जवाब भाजपा नेतृत्व के पास है।

यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि डॉ. सिंह की सार्वजनिक दावेदारी को भाजपा की ओर से टिकट की स्वीकृति नहीं माना जा सकता। उनकी उम्मीदवारी अभी उनकी राजनीतिक इच्छा और पार्टी नेतृत्व से अपेक्षा के स्तर पर है।

मुख्यमंत्री से मुलाकात और राम मंदिर ट्रस्ट का प्रसंग

डॉ. दिनेश चंद्र सिंह की राजनीतिक चर्चा को उस समय और हवा मिली, जब उनकी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की बात सामने आई। इस मुलाकात को लेकर स्थानीय राजनीतिक हलकों में अलग-अलग तरह की चर्चाएं हो रही हैं। हालांकि, केवल मुलाकात के आधार पर भाजपा के टिकट को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ पद के लिए आवेदन करने का प्रसंग भी साझा किया। उनके मुताबिक, कुल 5,585 आवेदकों में से इंटरव्यू के लिए चुने गए अंतिम 16 उम्मीदवारों में वह दूसरे स्थान पर थे, लेकिन पद एक होने के कारण चयन किसी अन्य उम्मीदवार का हुआ।

यह प्रसंग उनकी प्रशासनिक और संस्थागत अनुभव वाली छवि को सामने रखने का एक और तरीका है। लेकिन विधानसभा चुनाव की राजनीति में किसी पद के लिए इंटरव्यू तक पहुंचना और जनता के बीच चुनावी समर्थन हासिल करना दो अलग-अलग कसौटियां हैं।

धामपुर में अब स्थानीय राजनीति की परीक्षा

पूर्व नौकरशाह की एंट्री से धामपुर की राजनीति में एक नया नाम जरूर जुड़ गया है। लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अभी बाकी है। क्या भाजपा उन्हें टिकट देने पर विचार करेगी? क्या स्थानीय संगठन उनके साथ सहजता से खड़ा होगा? क्या वह अपनी प्रशासनिक पहचान को जनता के बीच राजनीतिक स्वीकार्यता में बदल पाएंगे? और क्या स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा वास्तव में धामपुर की राजनीति में निर्णायक विमर्श बन पाएगा?

इन सवालों का जवाब आने वाले समय में ही मिलेगा।

फिलहाल डॉ. दिनेश चंद्र सिंह ने अपनी मंशा छिपाई नहीं है। उन्होंने साफ कर दिया है कि रिटायरमेंट के बाद उनकी अगली पारी धामपुर से चुनावी राजनीति में उतरने की है। सरकारी सेवा में जिलाधिकारी की जिम्मेदारी निभाने के बाद अब वह जनप्रतिनिधि बनने की संभावना तलाश रहे हैं।

धामपुर की इस कहानी में दिलचस्पी इसलिए भी है कि यहां मुकाबला अभी चुनाव मैदान में नहीं, बल्कि राजनीतिक दावेदारी के शुरुआती चरण में दिखाई दे रहा है। एक ओर प्रशासनिक अनुभव और स्थानीय पहचान का दावा है, दूसरी ओर पार्टी संगठन और पहले से मौजूद राजनीतिक समीकरण हैं।

कुल मिलाकर, डॉ. दिनेश चंद्र सिंह ने धामपुर की राजनीति में अपनी दस्तक दे दी है। अब देखना यह है कि भाजपा के टिकट की यह सार्वजनिक दस्तक पार्टी के दरवाजे तक पहुंचती है या फिलहाल राजनीतिक चर्चाओं का विषय बनकर रह जाती है। क्योंकि सरकारी सेवा में फाइलों पर अंतिम हस्ताक्षर अधिकारी के होते हैं, लेकिन पार्टी की टिकट वाली फाइल पर आखिरी फैसला हाईकमान का ही चलता है।

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