रामपुर की सियासत में आजम खान का नाम कभी सत्ता के गलियारों में गूंजता था। उनके समर्थकों के लिए वह एक बड़े नेता और राजनीतिक विरोधियों के लिए सत्ता की ताकत का प्रतीक रहे। लेकिन अब वही आजम खान एक बार फिर कानून के शिकंजे में हैं। रामपुर जेल के दरवाजे से बाहर निकलने के बाद जिस राहत की उम्मीद की जा रही थी, वह ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सकी। एक मामले में जमानत मिली, रिहाई हुई और फिर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई ने मुश्किलों का नया अध्याय खोल दिया।
सियासत का यह ऐसा मोड़ है, जहां सवाल सिर्फ एक नेता की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि उस विश्वविद्यालय का भी है, जिसे आजम खान अपनी उपलब्धि बताते रहे हैं। वही जौहर यूनिवर्सिटी अब जमीन, संपत्ति, सरकारी धन और कथित कब्जे से जुड़े आरोपों की लंबी जांच के केंद्र में है।
ED ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में आजम खान को हिरासत में लिया है। अधिकारियों के मुताबिक, उन्हें गाजियाबाद की अदालत में पेश किया जाएगा, जहां औपचारिक गिरफ्तारी की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो पैन कार्ड मामले में उन्हें जमानत दी थी। इसके बाद रामपुर जेल से उनकी रिहाई हुई थी।
लेकिन जेल से बाहर आने के बाद आजम खान के सामने राहत की जगह एक और कानूनी चुनौती खड़ी हो गई।
रिहाई के बाद आजम खान का सवाल—क्या विश्वविद्यालय बनाना अपराध है?
रामपुर जेल से बाहर आने के बाद आजम खान ने अपने अंदाज में कानून, राजनीति और अपनी पहचान को लेकर सवाल उठाए। उनके शब्दों में नाराजगी थी, शिकायत थी और एक ऐसा राजनीतिक संदेश भी, जिसे उनके समर्थक लंबे समय से दोहराते रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘कहने को क्या बचा है? मैं क्या कह सकता हूं? कानून का अस्तित्व खत्म हो गया है। यह मुस्लिम होने की सजा है? हमारी गलती यह थी कि एक विश्वविद्यालय एक मुस्लिम द्वारा बनाया गया था। यह हमारा अपराध है। हमने बच्चों के लिए स्कूल बनाए। क्या यह हमारा अपराध है?’
आजम खान के इस बयान को उनके समर्थकों ने राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों से जोड़कर देखा। वहीं, जांच एजेंसियों की कार्रवाई का आधार उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे और वित्तीय लेन-देन से जुड़े आरोप हैं।
यही इस पूरे प्रकरण की सबसे अहम राजनीतिक और कानूनी उलझन है। एक तरफ आजम खान अपने विश्वविद्यालय को शिक्षा और सामाजिक विकास की उपलब्धि बताते हैं, दूसरी तरफ जांच एजेंसियां उसी संस्थान की जमीन, निर्माण और वित्तीय व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठा रही हैं।
अब यह तय होना बाकी है कि अदालतों में इन आरोपों का क्या परिणाम निकलता है।
जौहर यूनिवर्सिटी की जमीन पर ED की नजर, 426 करोड़ की संपत्तियां अटैच
आजम खान से जुड़े मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट की संपत्तियों पर ED की कार्रवाई इस मामले का सबसे बड़ा पहलू बनकर सामने आई है।
जांच एजेंसी ने जौहर यूनिवर्सिटी की जमीन और इमारतों समेत 426.46 करोड़ रुपये की संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच किया है। इन संपत्तियों की बाजार कीमत करीब 1,170 करोड़ रुपये आंकी गई है।
यह आंकड़ा अपने आप में बड़ा है। लेकिन इस कार्रवाई के पीछे की कहानी सिर्फ संपत्ति के मूल्य तक सीमित नहीं है। जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए जमीन कहां से आई, उसका इस्तेमाल किस तरह हुआ और क्या इस पूरी प्रक्रिया में कानून का उल्लंघन किया गया।
रामपुर के गांव सिंहनखेड़ा में स्थित जौहर यूनिवर्सिटी का परिसर मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट के नाम पर है। ट्रस्ट की स्थापना आजम खान ने की थी और उस पर उनका नियंत्रण बताया गया है। आजम खान विश्वविद्यालय के मानद चांसलर भी हैं।
यानी जिस संस्थान को आजम खान अपनी राजनीतिक और सामाजिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते रहे हैं, वही अब उनके खिलाफ चल रही जांच का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
किसानों की जमीन पर कब्जे का आरोप: शिक्षा के नाम पर जमीन का खेल?
जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े मामलों में सबसे गंभीर आरोप किसानों की जमीन पर कथित जबरन कब्जे का है।
ED ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जांच रामपुर के अजीमनगर थाने में दर्ज 26 FIR के आधार पर शुरू की थी। इन मामलों में भारतीय दंड संहिता की धारा 384 समेत अन्य धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।
आरोप है कि विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए किसानों की कृषि भूमि पर जबरन कब्जा किया गया।
किसानों की जमीन किसी भी ग्रामीण परिवार के लिए केवल संपत्ति नहीं होती। वह उसकी आजीविका, भविष्य और पीढ़ियों की सुरक्षा का आधार होती है। ऐसे में यदि जमीन पर जबरन कब्जे के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला केवल एक राजनीतिक नेता या विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहेगा। यह उन परिवारों के अधिकारों का सवाल भी बनेगा, जिनकी जमीन कथित तौर पर विवाद का हिस्सा बनी।
जांच के दौरान रामपुर जिला प्रशासन की रिपोर्ट में सिंहनखेड़ा गांव में करीब 34 एकड़ में फैले शत्रु संपत्ति के 45 प्लॉट पर भी कथित अवैध कब्जे की बात सामने आई।
आरोप है कि इस जमीन का इस्तेमाल विश्वविद्यालय के लिए किया गया, जबकि गृह मंत्रालय की ओर से नियुक्त कस्टोडियन पहले ही ट्रस्ट को दी गई जमीन की लीज रद्द कर चुका था।
अब इस जमीन का कब्जा गृह मंत्रालय के शत्रु संपत्ति कस्टोडियन ने रामपुर जिला प्रशासन के जरिए वापस ले लिया है।
यहां सवाल और गंभीर हो जाता है। यदि जमीन की लीज रद्द हो चुकी थी, तो उसका इस्तेमाल किस आधार पर जारी रहा? और यदि जमीन पर कब्जे के आरोप सही हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा?
इन सवालों का जवाब जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा।
सरकारी खजाने से विश्वविद्यालय तक: धन के इस्तेमाल पर उठे सवाल
जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू सरकारी धन के कथित दुरुपयोग का है।
ED की जांच के मुताबिक, सार्वजनिक कार्यों के लिए आवंटित धन को कथित तौर पर विश्वविद्यालय की ओर डायवर्ट किया गया। एजेंसी का आरोप है कि सरकारी काम विश्वविद्यालय के निजी परिसर में कराए गए और सरकारी ठेके हासिल करने वाले ठेकेदारों से पैसा वापस ट्रस्ट को दान के रूप में दिलवाया गया।
यदि जांच में यह आरोप प्रमाणित होते हैं, तो मामला केवल जमीन के विवाद का नहीं रह जाएगा। यह सार्वजनिक धन के इस्तेमाल और सरकारी संसाधनों की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर मामला होगा।
सरकारी खजाने से निकलने वाला पैसा जनता की जरूरतों के लिए होता है। सड़क, नाली, सफाई, पेयजल और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए आवंटित धन का इस्तेमाल कहां हुआ, किसके आदेश पर हुआ और उससे किसे लाभ मिला—ये सवाल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण हैं।
ED ने PMLA की धारा 66(2) के तहत उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ जानकारी साझा की थी। इसके आधार पर 13 अक्टूबर 2026 को रामपुर के अजीमनगर थाने में FIR नंबर 0224/2026 दर्ज की गई।
इस मामले में आजम खान, ट्रस्ट और अन्य लोगों के खिलाफ आपराधिक साजिश, आपराधिक विश्वासघात तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13 के तहत आरोप दर्ज किए गए।
जांच एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि कथित तौर पर सरकारी धन का इस्तेमाल किस तरह हुआ और क्या इस प्रक्रिया से मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध का संबंध बनता है।
2016 का बुलडोजर प्रकरण: मकान टूटे, सामान लूटे जाने के आरोप
आजम खान से जुड़े विवादों की फाइल में 2016 की घटनाएं भी शामिल हैं।
ED ने रामपुर पुलिस की ओर से दर्ज 28 अन्य FIR को भी जांच के दायरे में लिया है। इनमें से ज्यादातर मामलों में पुलिस चार्जशीट दाखिल कर चुकी है।
इन मामलों में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2016 में रामपुर शहर में कई परिवारों के मकानों को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया गया था। इनमें बड़ी संख्या उन परिवारों की बताई गई, जो वक्फ की संपत्तियों पर किरायेदार के रूप में रह रहे थे।
आरोप है कि तत्कालीन सर्किल ऑफिसर और अन्य लोगों के नेतृत्व वाली भीड़ ने आजम खान के निर्देश पर मकानों को गिराया।
मकान गिराए जाने के साथ ही मारपीट, धमकी और लूटपाट के आरोप भी सामने आए। शिकायतों के मुताबिक, प्रभावित परिवारों को झूठे आपराधिक मुकदमों में फंसाने की धमकी दी गई और उनके नकदी, गहने तथा मवेशी लूट लिए गए।
जांच में यह आरोप भी शामिल है कि ध्वस्त किए गए मकानों का मलबा ट्रकों के जरिए जौहर यूनिवर्सिटी परिसर में पहुंचाया गया।
यह आरोप अपने आप में एक अलग कहानी कहता है। जिन मकानों में परिवार रहते थे, उनके टूटने के बाद मलबा कहां गया? क्या उसका इस्तेमाल विश्वविद्यालय परिसर में हुआ? और क्या इन घटनाओं के पीछे किसी संगठित योजना की भूमिका थी?
इन सवालों की जांच ED कर रही है।
हालांकि, इन आरोपों को अदालत में साबित होना अभी बाकी है।
नगर पालिका की मशीनरी भी विश्वविद्यालय पहुंची?
जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़ी जांच में रामपुर नगर पालिका की मशीनरी का मामला भी सामने आया है।
FIR और पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक, रामपुर नगर पालिका के लिए खरीदी गई सफाई मशीनरी को कथित तौर पर विश्वविद्यालय परिसर में भेज दिया गया था।
यह आरोप इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि नगर पालिका की मशीनरी सार्वजनिक सेवाओं के लिए खरीदी जाती है। उसका इस्तेमाल शहर की सफाई और नागरिक सुविधाओं के लिए होना चाहिए।
यदि सरकारी मशीनरी को किसी निजी संस्थान में भेजा गया, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसा किसके आदेश पर हुआ और क्या इसके पीछे कोई वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता थी।
ED अब इन सभी मामलों में मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं की जांच कर रही है।
आजम खान की सियासत और जौहर यूनिवर्सिटी: अब आगे क्या?
आजम खान का राजनीतिक सफर लंबे समय तक रामपुर की राजनीति के केंद्र में रहा है। जौहर यूनिवर्सिटी भी उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। लेकिन अब यही विश्वविद्यालय जमीन, संपत्ति, सरकारी धन और कथित कब्जे से जुड़े मामलों की जांच के केंद्र में है।
एक ओर आजम खान इसे शिक्षा और बच्चों के भविष्य से जोड़कर देख रहे हैं। दूसरी ओर जांच एजेंसी का दावा है कि विश्वविद्यालय से जुड़ी संपत्तियों और वित्तीय गतिविधियों में गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिले हैं।
426.46 करोड़ रुपये की संपत्तियों का अस्थायी अटैचमेंट और करीब 1,170 करोड़ रुपये की बाजार कीमत इस कार्रवाई को और महत्वपूर्ण बना देती है।
लेकिन इस पूरी कहानी में एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए—ED की कार्रवाई, FIR और जांच में लगाए गए आरोप अपने आप में दोषसिद्धि नहीं हैं। किसी भी आरोपी को अदालत में अपना पक्ष रखने और निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है।
आजम खान के लिए यह सिर्फ एक और कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक विरासत और जौहर यूनिवर्सिटी के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल भी है।
जेल से रिहाई के बाद उनकी मुश्किलें जिस तरह फिर बढ़ी हैं, उससे रामपुर की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है।
अब निगाहें गाजियाबाद की अदालत और आगे की जांच पर हैं। सवाल यह नहीं कि आजम खान की सियासत कितनी मजबूत रही, बल्कि यह है कि जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े आरोपों की परतें खुलने के बाद कानून की कसौटी पर कौन-कौन से दावे टिकते हैं।
रामपुर की इस सियासी कहानी का अगला अध्याय अदालत में लिखा जाएगा—जहां बयान नहीं, सबूत बोलेंगे।















