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#GreaterNoidaNews: बैंक में भरोसे की सेंध! ग्राहकों की FD पर किसका खेल? PNB की ऐच्छर शाखा में 10.24 करोड़ की कथित हेराफेरी, छह अफसरों की ID और CBI की एंट्री

“ग्रेटर नोएडा में बैंक की तिजोरी से नहीं, सिस्टम के भीतर से कथित तौर पर गायब हुई ग्राहकों की जमा पूंजी। छह अधिकारियों की यूजर आईडी, बंद मोबाइल अलर्ट, गायब वाउचर और FD तोड़कर दूसरे खातों में पहुंचाई गई रकम ने बैंकिंग व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल। दीपांशी और आशुतोष पाठक समेत कई नाम जांच के घेरे में। CBI ने दर्ज की FIR, अब खुलेंगे डिजिटल लेनदेन के राज।”

ग्रेटर नोएडा: बैंक की शाखा में ग्राहक जब अपनी मेहनत की कमाई जमा करता है, तो उसे लगता है कि उसकी पूंजी अब सुरक्षित हाथों में है। बैंक की मुहर, पासबुक की एंट्री और फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) का प्रमाणपत्र उसे भरोसा दिलाता है कि भविष्य की जरूरतों के लिए बचाकर रखी गई रकम सुरक्षित है। लेकिन ग्रेटर नोएडा के ऐच्छर गांव स्थित पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की शाखा से सामने आए कथित घोटाले ने इसी भरोसे की बुनियाद हिला दी है।

यहां सवाल केवल 10.24 करोड़ रुपये की कथित अनधिकृत निकासी और ट्रांसफर का नहीं है। सवाल उस बैंकिंग व्यवस्था का है, जहां ग्राहकों की जमा पूंजी पर नजर रखने वाले सिस्टम में कथित तौर पर सेंध लगाई गई। जिन अधिकारियों की यूजर आईडी और पासवर्ड से बैंकिंग लेनदेन होते हैं, उन्हीं छह अधिकारियों की डिजिटल पहचान का इस्तेमाल कर ग्राहकों के खातों से रकम ट्रांसफर किए जाने का आरोप है।

मामले में बैंक कर्मचारी दीपांशी, आशुतोष पाठक और कुछ अन्य लोगों के नाम सामने आए हैं। बैंक की शिकायत के आधार पर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने 29 अक्टूबर 2026 को FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

कहानी में एक ग्राहक की शिकायत है, बैंक के भीतर कथित मिलीभगत या सिस्टम के दुरुपयोग का संदेह है, करोड़ों रुपये के लेनदेन हैं और ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब अब जांच एजेंसी तलाश रही है। फिलहाल आरोपों की सच्चाई अदालत में साबित होना बाकी है, लेकिन बैंकिंग सिस्टम के भीतर उठे इस विवाद ने कई गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

एक ग्राहक ने पासबुक अपडेट कराई, बैंक के भीतर का खेल सामने आ गया

मामले की शुरुआत 16 सितंबर को हुई। बैंक की ग्राहक संगीता अपने पति और बेटी के साथ सेक्टर पाई यानी ऐच्छर शाखा में पासबुक अपडेट कराने पहुंचीं पासबुक अपडेट कराने का काम आम तौर पर बेहद सामान्य होता है। ग्राहक अपनी जमा-निकासी का हिसाब देखता है और बैंक से वापस लौट जाता है। लेकिन संगीता के लिए यह सामान्य प्रक्रिया एक बड़े वित्तीय विवाद का दरवाजा खोलने वाली साबित हुई। पासबुक में उनके खाते से जुड़े तीन ऐसे ट्रांजैक्शन दिखाई दिए, जिनकी जानकारी उन्हें नहीं थी। न उन्होंने इन लेनदेन की अनुमति दी थी और न ही उन्हें इनके बारे में कोई जानकारी थी।

उन्होंने तत्काल बैंक अधिकारियों से शिकायत की और शाखा प्रबंधक से मिलने की बात कही। उस समय शाखा प्रबंधक मौजूद नहीं थे। ऐसे में बैंक में तैनात महिला कर्मचारी दीपांशी ने उनसे बातचीत की बैंक की शिकायत के मुताबिक, दीपांशी ने कथित तौर पर इन ट्रांजैक्शन को सही बताने की कोशिश की। उसने दावा किया कि ग्राहक ने अपने पति से फोन पर बात करने के बाद रकम निवेश करने और उसे आशुतोष पाठक के खाते में ट्रांसफर करने की सहमति दी थी लेकिन जब मामला शाखा प्रबंधक तक पहुंचा और लेनदेन से जुड़े दस्तावेज तलाशे गए, तो बैंक अधिकारियों को संबंधित वाउचर रिकॉर्ड में नहीं मिले यहीं से मामला महज ग्राहक की शिकायत से आगे बढ़कर बैंक के भीतर संभावित वित्तीय अनियमितता की जांच में बदल गया।

विडंबना देखिए, जिस ग्राहक ने अपनी पासबुक अपडेट कराने के लिए बैंक का दरवाजा खटखटाया था, उसी की शिकायत ने कथित करोड़ों की हेराफेरी की परतें खोलने की शुरुआत कर दी।

छह अधिकारियों की ID, लेकिन लेनदेन किसने किए?

बैंक की शुरुआती जांच में सामने आया कि ग्राहकों के खातों से रकम ट्रांसफर करने के लिए छह अधिकारियों की यूजर आईडी का कथित तौर पर दुरुपयोग किया गया।

इन अधिकारियों में सीनियर ब्रांच मैनेजर निषाद तिर्की के अलावा संदीप प्रकाश शर्मा, मीनाक्षी, सतीश कुमार, शैलेंद्र कुमार और लवली जैन के नाम शामिल हैं।

बैंक की शिकायत में आरोप है कि इन अधिकारियों की यूजर आईडी और पासवर्ड के जरिए ग्राहकों के खातों में बिना अनुमति लेनदेन किए गए।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन छह अधिकारियों की डिजिटल पहचान का इस्तेमाल किसने किया?

क्या यूजर आईडी और पासवर्ड किसी कर्मचारी के पास उपलब्ध थे? क्या सिस्टम में सुरक्षा संबंधी कोई कमजोरी थी? क्या संबंधित अधिकारियों को इन लेनदेन की जानकारी थी या उनकी जानकारी के बिना उनकी पहचान का इस्तेमाल किया गया?

इन सवालों का जवाब अभी जांच के दायरे में है। केवल किसी अधिकारी की यूजर आईडी से ट्रांजैक्शन होने का मतलब यह नहीं कि वही अधिकारी उसके लिए जिम्मेदार है। असली तस्वीर डिजिटल लॉग, सिस्टम रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयानों से सामने आएगी।

बैंक की शिकायत में मोबाइल अलर्ट से छेड़छाड़ का आरोप भी लगाया गया है। बताया गया है कि कुछ ग्राहकों के खातों में ट्रांजैक्शन की जानकारी देने वाले मोबाइल अलर्ट बंद कर दिए गए या उनमें बदलाव किया गया।

यदि जांच में यह आरोप सही साबित होता है, तो मामला केवल रकम ट्रांसफर करने तक सीमित नहीं रहेगा। ग्राहकों को उनके खातों से पैसे निकलने की जानकारी न मिले, इसके लिए कथित तौर पर की गई व्यवस्था भी जांच का अहम हिस्सा बनेगी।

FD में जमा भविष्य की पूंजी, दूसरे खातों में कैसे पहुंची?

इस मामले में ग्राहकों के सेविंग अकाउंट के साथ-साथ उनकी फिक्स्ड डिपॉजिट भी कथित तौर पर निशाने पर थीं।

बैंक की शिकायत के मुताबिक, कई एफडी में आशुतोष पाठक और कुछ अन्य लोगों को संयुक्त खाताधारक बनाया गया। इसके बाद इन एफडी को समय से पहले बंद कराकर रकम दूसरे बैंक खातों में ट्रांसफर कर दी गई।

FD आमतौर पर वह रकम होती है जिसे ग्राहक किसी खास जरूरत, बच्चों की पढ़ाई, शादी, बीमारी या रिटायरमेंट के लिए सुरक्षित रखता है। ऐसे में किसी एफडी का बिना ग्राहक की जानकारी या अनुमति के बंद होना केवल बैंकिंग गड़बड़ी नहीं, बल्कि ग्राहक की भविष्य की आर्थिक सुरक्षा पर सीधा सवाल है।

बैंक ने संदिग्ध एफडी से जुड़ी 49 प्रविष्टियों की सूची भी जांच एजेंसी को सौंपी है। इन प्रविष्टियों में एफडी बंद होने के बाद ट्रांसफर की गई रकम का कुल आंकड़ा करीब 70.24 करोड़ रुपये दर्ज बताया गया है।

यह आंकड़ा 10.24 करोड़ रुपये की कथित अनधिकृत निकासी के दावे से अलग है।

दोनों आंकड़ों के बीच क्या संबंध है? क्या 70.24 करोड़ रुपये संदिग्ध एफडी से जुड़े कुल लेनदेन का आंकड़ा है? क्या इसमें एक ही रकम के अलग-अलग ट्रांसफर भी शामिल हैं? और वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना हुआ?

इन सवालों का जवाब अभी स्पष्ट नहीं है। इसलिए 70.24 करोड़ रुपये को सीधे घोटाले की कुल रकम या वास्तविक नुकसान मानना फिलहाल सही नहीं होगा।

जांच का एक अहम हिस्सा यह भी होगा कि किन ग्राहकों की एफडी बंद की गई, रकम किन खातों में गई और क्या किसी स्तर पर ग्राहकों की सहमति के दस्तावेज मौजूद हैं।

दीपांशी और आशुतोष पाठक के बीच क्या था संबंध?

बैंक की शिकायत और मंजूरी आदेश में दर्ज 10 अक्टूबर 2026 के बयान के मुताबिक, दीपांशी पहले से आशुतोष पाठक को जानती थी।

आरोप है कि आशुतोष ने पहले दीपांशी के पिता के साथ 15 से 20 लाख रुपये की आर्थिक धोखाधड़ी की थी। इसके बाद रकम वापस दिलाने का भरोसा देकर उसने दीपांशी को अपने साथ निवेश करने के लिए कहा।

बताया गया है कि इसी भरोसे में दीपांशी ने लोन लेकर करीब 4 से 5 लाख रुपये भी निवेश किए थे।

बैंक की शिकायत के अनुसार, इसके बाद दीपांशी ग्राहकों के खातों से जुड़े संदिग्ध ट्रांजैक्शन में शामिल हुई।

पूछताछ में दीपांशी ने कथित तौर पर बताया कि आशुतोष पाठक के कहने पर ग्राहकों की रकम बिना अनुमति ट्रांसफर की गई। इसके लिए दूसरे अधिकारियों की यूजर आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल किया गया।

लेनदेन से जुड़े वाउचर नष्ट किए जाने का आरोप भी लगाया गया है।

यहां जांच के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं। क्या दीपांशी को वास्तव में आशुतोष ने निवेश के नाम पर अपने प्रभाव में लिया था? क्या वह कथित वित्तीय धोखाधड़ी में शामिल थी या उसके साथ भी किसी स्तर पर धोखा हुआ? ग्राहकों की रकम के ट्रांसफर में उसकी भूमिका कितनी थी? और आशुतोष पाठक तक पहुंची रकम का अंतिम इस्तेमाल कहां हुआ?

इन सवालों के जवाब केवल बयानों से नहीं, बल्कि बैंकिंग रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्य और धन के लेनदेन की पूरी श्रृंखला से सामने आएंगे।

बैंक के पांच कर्मचारी निलंबित, लेकिन जवाबदेही का सवाल बरकरार

मामला सामने आने के बाद बैंक प्रबंधन ने तत्कालीन शाखा प्रबंधक समेत पांच कर्मचारियों को निलंबित कर दिया था।

पहले स्थानीय थाने में बैंक की शिकायत पर मुकदमा दर्ज किया गया। बाद में बैंक प्रबंधन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए CBI से जांच कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

23 अक्टूबर 2026 को पंजाब नेशनल बैंक के मुख्य प्रबंधक अजय कुमार पांडे ने CBI की एंटी करप्शन ब्रांच, गाजियाबाद में शिकायत दी थी।

बैंक की शुरुआती जांच के बाद सक्षम अधिकारी से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत मंजूरी ली गई। इसके बाद CBI ने 29 अक्टूबर को FIR दर्ज की।

इसमें बैंक कर्मचारी दीपांशी, आशुतोष पाठक और कुछ अन्य निजी व अज्ञात सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। जांच की जिम्मेदारी डीएसपी डॉ. जाहिर अख्तर को सौंपी गई है।

बैंक की ओर से करीब 43 लाख रुपये के दावों का भुगतान किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।

हालांकि, ग्राहकों के दावों का भुगतान और वास्तविक वित्तीय नुकसान का आकलन दो अलग-अलग बातें हैं। जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि कितने ग्राहकों की रकम प्रभावित हुई और कुल कितनी राशि की कथित हेराफेरी हुई।

अब CBI खंगालेगी बैंक का डिजिटल हिसाब

CBI की जांच अब बैंक के कोर बैंकिंग सिस्टम (CBS) के लॉग, छह अधिकारियों की यूजर आईडी की गतिविधियों, ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड और एफडी से जुड़े दस्तावेजों पर केंद्रित होगी।

जांच एजेंसी यह भी देखेगी कि मोबाइल अलर्ट में कब और किस स्तर पर बदलाव किया गया। जिन खातों में रकम ट्रांसफर हुई, उनके खाताधारकों और लेनदेन की पूरी श्रृंखला की पड़ताल भी की जाएगी।

डिजिटल रिकॉर्ड से यह पता लगाने की कोशिश होगी कि संदिग्ध ट्रांजैक्शन किस समय किए गए, किस सिस्टम से किए गए और किन यूजर आईडी का इस्तेमाल हुआ।

इसके अलावा बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ कर यह समझने की कोशिश की जाएगी कि ग्राहकों की एफडी बंद करने और रकम दूसरे खातों में भेजने की प्रक्रिया में कहां-कहां कथित अनियमितता हुई।

जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी होगा कि बैंक के आंतरिक नियंत्रण और निगरानी व्यवस्था में कोई गंभीर कमी थी या नहीं।

सबसे बड़ा सवाल: बैंक में पैसा सुरक्षित है, तो सिस्टम में सेंध कैसे लगी?

ग्रेटर नोएडा की ऐच्छर शाखा का यह मामला बैंकिंग व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल खड़ा करता है।

ग्राहक बैंक को अपनी रकम इसलिए सौंपता है क्योंकि उसे भरोसा होता है कि बैंक के भीतर लेनदेन की निगरानी होगी, उसकी अनुमति के बिना कोई रकम नहीं निकाली जा सकेगी और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी उसे समय पर मिल जाएगी।

लेकिन यदि बैंक की शिकायत में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला दिखाएगा कि केवल डिजिटल सिस्टम, पासवर्ड और बैंकिंग प्रक्रिया मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी निगरानी भी जरूरी है।

छह अधिकारियों की यूजर आईडी का इस्तेमाल, मोबाइल अलर्ट में कथित बदलाव, एफडी बंद करने की प्रक्रिया और लेनदेन से जुड़े वाउचर का रिकॉर्ड में नहीं मिलना ऐसे पहलू हैं जिनकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए।

फिलहाल CBI की FIR किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का अंतिम फैसला नहीं है। आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

लेकिन इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बैंक में जमा ग्राहकों की रकम की सुरक्षा को लेकर उठे सवालों का जवाब केवल निलंबन और FIR से नहीं मिलेगा।

जवाब तब मिलेगा, जब यह स्पष्ट होगा कि ग्राहकों की रकम किसने ट्रांसफर की, किसके कहने पर की, बैंक के सिस्टम में कथित सेंध कैसे लगी और जिम्मेदार लोगों तक जांच की आंच कहां तक पहुंचती है।

क्योंकि बैंक की शाखा में ग्राहक अपनी जमा पूंजी छोड़कर जाता है, अपना भरोसा नहीं। और जब उसी भरोसे पर सवाल उठते हैं, तो जांच केवल खातों का हिसाब नहीं करती—पूरी व्यवस्था की जवाबदेही भी तय करती है।

अब देखना यह है कि CBI की जांच में बैंकिंग सिस्टम के भीतर छिपे कथित खेल की परतें कितनी दूर तक खुलती हैं और ग्राहकों की मेहनत की कमाई के मामले में आखिर जवाबदेही किसकी तय होती है।

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