कोरोना महामारी के बाद दुनिया में संक्रामक बीमारियों और खतरनाक रोगजनकों पर रिसर्च करने वाली हाई-सिक्योरिटी लैब्स की जरूरत और चर्चा दोनों बढ़ी हैं। ऐसी लैब्स का इस्तेमाल नई बीमारियों को समझने, जांच विकसित करने, वैक्सीन और दवाओं पर रिसर्च करने तथा भविष्य की महामारियों से निपटने की तैयारी के लिए किया जाता है।
हालांकि, रूस में एक लैब कर्मचारी की मौत के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं कि इन अत्यधिक सुरक्षित प्रयोगशालाओं में काम कितना सुरक्षित है और इनकी निगरानी के लिए वैश्विक स्तर पर पर्याप्त व्यवस्था मौजूद है या नहीं।
रूस की घटना के बाद फिर चर्चा में लैब सुरक्षा
रूस के साइबेरिया में एक हाई-सिक्योरिटी लैब में काम करने वाली 28 वर्षीय कर्मचारी की मौत के बाद यह मामला चर्चा में आया। रिपोर्टों में दावा किया गया कि 25 सितंबर को लैब में काम के दौरान एक टेस्ट ट्यूब टूट गई थी और उसमें खतरनाक बैक्टीरिया होने की बात कही गई।
हालांकि, कर्मचारी की मौत का कारण प्लेग संक्रमण था, यह अभी साबित नहीं हुआ है। रूस की स्वास्थ्य एजेंसी ने मौत का कारण अज्ञात निमोनिया बताया है। उनके संपर्क में आए करीब 200 लोगों को निगरानी में रखे जाने की जानकारी सामने आई है।
इस घटना ने उन लैब्स की सुरक्षा को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है, जहां गंभीर बीमारियां पैदा करने वाले रोगजनकों पर रिसर्च होती है।
क्या ये लैब वायरस बनाने के लिए होती हैं?
ऐसा कहना सही नहीं होगा कि BSL-3 या BSL-4 लैब्स का मुख्य उद्देश्य वायरस बनाना है। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से खतरनाक रोगजनकों को सुरक्षित तरीके से समझने, बीमारी की पहचान करने, वैक्सीन और उपचार विकसित करने तथा संक्रमण से निपटने की तैयारी के लिए किया जाता है।
कोरोना महामारी के दौरान ऐसी रिसर्च सुविधाओं की अहमियत पूरी दुनिया ने महसूस की। किसी नए संक्रमण की पहचान और उसके खिलाफ जांच, वैक्सीन या इलाज विकसित करने के लिए विशेष सुरक्षा वाली प्रयोगशालाओं की जरूरत होती है।
BSL-3 और BSL-4 में क्या अंतर है?
BSL-3 लैब: इनमें ऐसे रोगजनकों पर काम किया जाता है जो गंभीर बीमारी पैदा कर सकते हैं और कुछ मामलों में सांस के जरिए संक्रमण फैलने का जोखिम रखते हैं।
BSL-4 लैब: यह जैव-सुरक्षा का सबसे ऊंचा स्तर है। यहां बेहद गंभीर और खतरनाक रोगजनकों पर अत्यधिक नियंत्रित परिस्थितियों में रिसर्च की जाती है।
इन सुविधाओं में विशेष उपकरण, प्रशिक्षित कर्मचारी, नियंत्रित प्रवेश और कई स्तरों की सुरक्षा व्यवस्था जरूरी होती है।
दुनिया में कितनी हैं ऐसी लैब्स?
2025 में प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन के अनुसार, 149 देशों में करीब 3,515 BSL-3 लैब्स और 34 देशों में 110 BSL-4 लैब्स की पहचान की गई थी। यानी अध्ययन में कुल 3,625 हाई-कंटेनमेंट लैब्स सामने आईं।
BSL-4 सुविधाओं की संख्या पिछले कुछ दशकों में बढ़ी है। इसके पीछे महामारी की तैयारी, नई संक्रामक बीमारियों पर रिसर्च और जैव-चिकित्सा अनुसंधान में बढ़ता निवेश प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
लैब हादसों का रिकॉर्ड भी चिंता बढ़ाता है
हाई-सिक्योरिटी लैब्स में सुरक्षा के कई स्तर होने के बावजूद इतिहास में दुर्घटनाएं और संक्रमण की घटनाएं सामने आती रही हैं। 1900 से 2025 के बीच लैब से जुड़ी 1,126 घटनाओं का अध्ययन किए जाने का दावा किया गया है। इनमें कर्मचारियों के संक्रमित होने, सुरक्षा चूक और कुछ मामलों में संक्रमण के बाहर फैलने जैसी घटनाएं शामिल थीं।
इन घटनाओं से यह सवाल उठता है कि जैसे-जैसे खतरनाक रोगजनकों पर रिसर्च बढ़ रही है, वैसे-वैसे बायोसेफ्टी और निगरानी के मानकों को भी उतना ही मजबूत किया जा रहा है या नहीं।
कोरोना के बाद क्यों बढ़ा निवेश?
कोविड-19 महामारी ने दुनिया को दिखाया कि नई संक्रामक बीमारी के सामने आने पर वैज्ञानिक तैयारी कितनी महत्वपूर्ण होती है। वायरस की पहचान, टेस्टिंग, वैक्सीन और उपचार विकसित करने में अत्याधुनिक रिसर्च सुविधाओं की बड़ी भूमिका रही।
इसी वजह से कई देशों ने महामारी की तैयारी और जैव-चिकित्सकीय अनुसंधान के लिए अपनी हाई-कंटेनमेंट लैब क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया है।
AI और नई बायोटेक्नोलॉजी ने बढ़ाई चुनौती
AI और आधुनिक बायोटेक्नोलॉजी के विकास से बीमारी पर रिसर्च और दवा विकास की संभावनाएं बढ़ी हैं। लेकिन इसके साथ जैव-सुरक्षा और गलत इस्तेमाल से जुड़े जोखिमों पर भी ध्यान देना जरूरी हो गया है।
विशेषज्ञों के लिए चुनौती यही है कि वैज्ञानिक रिसर्च को आगे बढ़ाया जाए, लेकिन इसके साथ सुरक्षा प्रोटोकॉल, कर्मचारियों की ट्रेनिंग, स्वतंत्र निगरानी और आपातकालीन व्यवस्था को भी मजबूत रखा जाए।
जरूरत रिसर्च की भी, सुरक्षा की भी
दुनिया में हाई-सिक्योरिटी लैब्स की संख्या बढ़ना अपने आप में खतरे का प्रमाण नहीं है। इनका बड़ा हिस्सा बीमारी की रोकथाम और इलाज से जुड़ी रिसर्च के लिए काम करता है। लेकिन खतरनाक रोगजनकों के साथ काम होने के कारण सुरक्षा में छोटी सी चूक भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।
इसीलिए आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि दुनिया में कितनी BSL-3 और BSL-4 लैब्स हैं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि इन लैब्स में सुरक्षा, पारदर्शिता और निगरानी के मानक कितने मजबूत हैं।















