“गोंडा में BJP नेता ब्रजभूषण शरण सिंह का बड़ा हमला, बोले—“पहले चुनाव आयोग की नियुक्ति पर कोई प्रक्रिया नहीं थी, अब संसद के बनाए कानून पर सवाल क्यों?” सुप्रीम कोर्ट के फैसले, नियुक्ति प्रक्रिया और चुनावी व्यवस्था को लेकर विपक्ष से पूछे तीखे सवाल”
गोंडा, उत्तर प्रदेश।
भारत की चुनावी व्यवस्था को लेकर जारी राजनीतिक बहस अब सिर्फ EVM, चुनाव आयोग और चुनावी निष्पक्षता तक सीमित नहीं रह गई है। यह विवाद उस संवैधानिक व्यवस्था के केंद्र तक पहुंच चुका है, जिसके तहत देश के निर्वाचन तंत्र का संचालन और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति होती है। इसी मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के गोंडा में BJP नेता ब्रजभूषण शरण सिंह ने विपक्ष पर जोरदार राजनीतिक पलटवार करते हुए नियुक्ति प्रक्रिया के इतिहास को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया।
ब्रजभूषण शरण सिंह ने चुनाव आयोग से जुड़े मौजूदा विवाद पर बोलते हुए कहा कि एक दौर ऐसा था जब देश में निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति को लेकर कोई स्पष्ट वैधानिक प्रक्रिया मौजूद नहीं थी। उन्होंने उस दौर की तुलना बेहद तीखे शब्दों में “हिटलर जैसी तानाशाही” से की। हालांकि यह उनकी राजनीतिक टिप्पणी और उपमा है, न कि किसी न्यायिक संस्था द्वारा स्थापित निष्कर्ष।
उनका मुख्य सवाल था—अगर आज चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो पहले यह बताया जाए कि जब कोई स्पष्ट कानून या निर्धारित प्रक्रिया नहीं थी, तब निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियां किस आधार पर होती थीं?
यहीं से ब्रजभूषण शरण सिंह ने राजनीतिक बहस को मौजूदा विवाद से उठाकर पुराने दौर की नियुक्तियों तक पहुंचा दिया।
“जब कोई कानून नहीं था, तब नियुक्तियां कैसे होती थीं?”
ब्रजभूषण शरण सिंह के मुताबिक, करीब 2023 के आसपास निर्वाचन आयोग से संबंधित एक मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचा। उन्होंने कहा कि उस समय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह सवाल उठा कि आखिर निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है।
उनके अनुसार, उस समय यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट वैधानिक व्यवस्था का अभाव था।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत संसद ने कानून बनाया। ब्रजभूषण शरण सिंह ने इसी घटनाक्रम को अपनी दलील का आधार बनाते हुए कहा कि यदि संसद ने संवैधानिक तरीके से कानून बनाया है और उस कानून को अदालत में चुनौती दी गई है, तो जब तक अदालत उस कानून को रद्द नहीं करती, तब तक उसे प्रभावी कानून के रूप में देखा जाना चाहिए।
उनका सवाल सीधा था—आज कानून बनने के बाद उस पर सवाल उठाने वाले लोग उस दौर की नियुक्तियों का हिसाब क्यों नहीं मांगते, जब स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया ही मौजूद नहीं थी?
तीन सदस्यीय समिति पर उठे सवाल
ब्रजभूषण शरण सिंह ने मौजूदा नियुक्ति व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि कानून के तहत चयन समिति में तीन सदस्य रखे गए हैं। उनके बयान के अनुसार, इसमें देश के प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक व्यक्ति शामिल होता है।
उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, लेकिन अभी तक अदालत ने इस कानून को निरस्त नहीं किया है।
यहां ब्रजभूषण ने राजनीतिक बहस को एक अहम संवैधानिक सवाल से जोड़ दिया—किसी कानून से असहमति और उस कानून के अवैध होने में अंतर है।
यानी यदि संसद ने कानून बनाया है और अदालत ने अभी तक उसे रद्द नहीं किया है, तो राजनीतिक स्तर पर उसकी आलोचना अपनी जगह हो सकती है, लेकिन उसे स्वतः असंवैधानिक मान लेना अलग बात है।
यही वह बिंदु है जिस पर BJP नेता विपक्ष से जवाब मांगते दिखाई दिए।
“नवीन चावला की नियुक्ति कैसे हुई?”
ब्रजभूषण शरण सिंह ने अपने बयान में पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला का नाम लेते हुए सवाल किया—“नवीन चावला की नियुक्ति कैसे हुई?”
यह सवाल उन्होंने केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति को लेकर नहीं, बल्कि उस समय की पूरी नियुक्ति व्यवस्था के संदर्भ में उठाया।
उनका तर्क है कि यदि वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया पर लगातार सवाल खड़े किए जा रहे हैं, तो राजनीतिक दलों को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि पहले के समय में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियां किस औपचारिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत होती थीं।
इसी क्रम में उन्होंने पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एम.एस. गिल का नाम भी लिया और पूछा—“एम.एस. गिल की नियुक्ति कैसे हुई?”
ब्रजभूषण के इन सवालों का राजनीतिक संदेश साफ है—बहस केवल आज की व्यवस्था पर नहीं होनी चाहिए; पुराने दौर की व्यवस्था और उसके मानकों पर भी समान रूप से चर्चा होनी चाहिए।
हालांकि इन नियुक्तियों से संबंधित तथ्य, प्रक्रिया और संवैधानिक स्थिति का अंतिम आकलन आधिकारिक रिकॉर्ड और संबंधित कानूनी दस्तावेजों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। राजनीतिक मंच से उठाए गए सवाल अपने आप में न्यायिक निष्कर्ष नहीं माने जा सकते।
2014 के बाद क्यों बदला चुनावी नैरेटिव?
ब्रजभूषण शरण सिंह ने अपने बयान में चुनावी राजनीति को 2014 के बाद के राजनीतिक बदलाव से भी जोड़ दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि 2014 के बाद कुछ लोगों को चुनावी व्यवस्था पर इसलिए परेशानी होने लगी क्योंकि “उनके किले एक-एक करके ढहने लगे।”
यह टिप्पणी सीधे तौर पर विपक्षी राजनीतिक दलों की चुनावी हार और उसके बाद उठे चुनाव संबंधी सवालों पर निशाना साधती है।
उनके बयान का आशय यह था कि जब तक राजनीतिक परिणाम कुछ दलों के पक्ष में आते रहे, तब तक चुनाव प्रक्रिया और EVM को लेकर वैसी आपत्तियां सामने नहीं आईं जैसी बाद के वर्षों में देखने को मिलीं।
यही तर्क उन्होंने EVM के सवाल से जोड़ते हुए कहा कि देश में EVM से पहले भी चुनाव होते थे। लेकिन अब जब राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं और चुनावी परिणाम कुछ दलों के पक्ष में नहीं आ रहे, तब चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाने लगे हैं।
यह आरोप राजनीतिक है और इसे संबंधित विपक्षी दलों के जवाब के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
“पहले EVM सही थी, अब सवाल क्यों?”
ब्रजभूषण शरण सिंह का सबसे आक्रामक हमला चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे सवालों पर था।
उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि जब पहले चुनाव हुए और EVM का इस्तेमाल हुआ, तब चुनाव प्रक्रिया को लेकर इतनी आपत्तियां क्यों नहीं थीं? अगर चुनावी व्यवस्था पहले सही थी, तो आज अचानक उसी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न क्यों लगाया जा रहा है?
उनकी दलील का केंद्र यह है कि चुनाव परिणाम बदलने के साथ चुनाव प्रक्रिया पर विश्वास भी नहीं बदलना चाहिए।
हालांकि दूसरी ओर, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा हो सकता है, बशर्ते आरोप तथ्य, प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रिया के आधार पर रखे जाएं। इसी तरह चुनाव आयोग या मौजूदा व्यवस्था का बचाव भी केवल राजनीतिक बयानबाजी के बजाय आधिकारिक तथ्यों और कानूनी स्थिति के आधार पर होना चाहिए।
#WATCH | Gonda, Uttar Pradesh | On the ECI controversy, BJP leader Brij Bhushan Sharan Singh says, “There was a Hitler-like dictatorship in this country regarding the Election Commission when there was no law at all. Around 2023, a case went to the Supreme Court, and at that time, the Supreme Court asked what the procedure was for appointing the Election Commissioner. Until then, there was no procedure at all in our country. That was when there was a Hitler-like dictatorship. On the instructions of the Supreme Court, a law was made by the Parliament elected in a constitutional manner. In that law, it was decided that (within the committee) one member would be the country’s Prime Minister, the second member would be the Leader of the Opposition, and the third member would be a person nominated by the Prime Minister. This law has also been challenged in the Supreme Court, but until now, no one has annulled this law… I want to ask these people: how was Naveen Chawla’s appointment done?… How was MS Gill’s appointment done?… They started having problems after 2014 because their fortresses started crumbling one by one… Elections were held even before EVMs, but back then the EVM was right; India’s election process was right, but now these things are coming to light as one by one their fortresses crumble…”
— ANI (@ANI) October 4, 2026
असली लड़ाई EVM की है या भरोसे की?
ब्रजभूषण शरण सिंह के बयान ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है—भारत में चुनावों पर राजनीतिक भरोसा आखिर किस आधार पर तय होगा?
क्या चुनाव परिणाम अनुकूल हों तो व्यवस्था निष्पक्ष और परिणाम प्रतिकूल हों तो व्यवस्था संदिग्ध?
या फिर चुनाव आयोग, नियुक्ति प्रक्रिया, EVM, मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर हर राजनीतिक दल को समान मानक अपनाने चाहिए?
लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल सत्ता पक्ष की चिंता नहीं हो सकती और न ही विपक्ष की आलोचना को मात्र राजनीतिक असंतोष कहकर खारिज किया जा सकता है। लेकिन किसी भी गंभीर आरोप के लिए तथ्य और प्रमाण जरूरी हैं।
यही वजह है कि ब्रजभूषण शरण सिंह के बयान को महज राजनीतिक हमला मानकर खारिज करना भी इस बहस को अधूरा छोड़ देगा और उनके आरोपों को अंतिम सत्य मान लेना भी उचित नहीं होगा।
विपक्ष से सीधा सवाल, लेकिन जवाब भी जरूरी
ब्रजभूषण शरण सिंह ने जिस अंदाज में सवाल उठाए हैं, उन्होंने विपक्ष के सामने राजनीतिक चुनौती जरूर खड़ी कर दी है। उनका कहना है कि यदि आज नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो पुराने दौर की नियुक्तियों पर भी समान कसौटी लागू होनी चाहिए।
लेकिन लोकतांत्रिक जवाबदेही का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि विपक्ष चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया, EVM या चुनाव संचालन को लेकर कोई गंभीर आरोप लगाता है, तो उसे भी ठोस तथ्य, दस्तावेज और प्रमाण सामने रखने चाहिए।
किसी भी लोकतांत्रिक संस्था की विश्वसनीयता केवल आरोप और प्रत्यारोप से मजबूत नहीं होती।
चुनाव आयोग पर बहस अब और तीखी होगी
गोंडा से उठी ब्रजभूषण शरण सिंह की आवाज दरअसल देश की चुनावी राजनीति में चल रही उस बड़ी बहस का हिस्सा है, जिसमें एक तरफ निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया पर प्रश्न हैं, तो दूसरी तरफ BJP और उसके नेता विपक्ष की आलोचना को राजनीतिक सुविधा के चश्मे से देखने का आरोप लगा रहे हैं।
इस पूरे विवाद में सबसे जरूरी बात यही है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को लेकर होने वाली बहस तथ्यों, कानून और संस्थागत पारदर्शिता के दायरे में रहे।
ब्रजभूषण शरण सिंह ने अपने तीखे बयान से विपक्ष के सामने कई सवाल जरूर रख दिए हैं—नवीन चावला की नियुक्ति कैसे हुई? एम.एस. गिल की नियुक्ति किस व्यवस्था के तहत हुई? जब स्पष्ट वैधानिक प्रक्रिया नहीं थी, तब नियुक्तियों का आधार क्या था? और अगर संसद द्वारा बनाए गए वर्तमान कानून को अदालत ने अब तक रद्द नहीं किया है, तो उसे लेकर राजनीतिक आपत्तियों की संवैधानिक सीमा क्या है?
इन सवालों के जवाब राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि कानून, आधिकारिक रिकॉर्ड और संवैधानिक संस्थाओं की कसौटी पर तलाशे जाने चाहिए।
क्योंकि सवाल केवल इस बात का नहीं है कि कौन चुनाव जीता और कौन हारा।
सवाल यह है कि भारत के लोकतंत्र में चुनाव पर भरोसा कैसे कायम रहेगा—और उस भरोसे की कसौटी सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए एक समान होगी या नहीं।
ब्रजभूषण शरण सिंह ने विपक्ष पर हमला बोलकर बहस को नया मोड़ दे दिया है। अब देखना यह होगा कि विपक्ष इन सवालों का राजनीतिक जवाब देता है, कानूनी जवाब देता है या पुराने नियुक्ति रिकॉर्ड सामने रखकर पूरी बहस को एक नए मोर्चे पर ले जाता है।
पर्दाफाश न्यूज़ की नजर में असली मुद्दा किसी एक दल की जीत या हार नहीं, बल्कि चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता के भरोसे का है।















