Friday, October 2, 2026
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महागठबंधन में महाभारत! MLC चुनाव में आमने-सामने कांग्रेस-RJD, गठबंधन की एकजुटता पर बड़ा सवाल

“आठ सीटों पर चुनाव से पहले ही खुल गई विपक्षी एकता की गांठ—कांग्रेस ने पांच उम्मीदवार उतारे, चार सीटों पर RJD पहले से मैदान में; अब ‘साथ’ की राजनीति में ‘सामने-सामने’ का मुकाबला”

पटना। बिहार विधान परिषद की चार शिक्षक और चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की आठ सीटों पर होने वाला चुनाव अभी मतदान की चौखट तक पहुंचा भी नहीं है, लेकिन महागठबंधन के भीतर राजनीतिक टकराव की तस्वीर साफ दिखाई देने लगी है। सीटों के तालमेल को लेकर सहयोगी दलों के बीच सहमति बनने से पहले ही कांग्रेस ने पांच सीटों पर अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी। दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल यानी RJD इन आठ में से चार सीटों पर पहले ही अपने प्रत्याशी घोषित कर चुका है।

नतीजा यह कि जिन दलों को चुनावी मैदान में एक-दूसरे के साथ खड़ा होना था, उनमें से कम से कम चार सीटों पर दोनों के उम्मीदवार आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। यह स्थिति सिर्फ प्रत्याशियों की घोषणा तक सीमित नहीं है। इसके साथ ही महागठबंधन के भीतर संवाद, सीट बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।

गठबंधन में बातचीत बाकी, उम्मीदवार मैदान में पहले

कांग्रेस की ओर से जारी सूची में दरभंगा शिक्षक सीट से डॉ. मदन मोहन झा, कोसी स्नातक सीट से मनोज कुमार जायसवाल, दरभंगा स्नातक सीट से रजनीकांत पाठक, पटना शिक्षक सीट से डॉ. संजय यादव और पटना स्नातक सीट से डॉ. असदुल्लाह खान को उम्मीदवार बनाया गया है।

दूसरी तरफ RJD ने पटना शिक्षक सीट से डॉ. संजीव कुमार सिंह, पटना स्नातक से दिलीप कुमार, कोसी स्नातक से नीतेश कुमार और दरभंगा स्नातक से अनिल कुमार झा को प्रत्याशी घोषित किया है।

यानी चार निर्वाचन क्षेत्रों—पटना शिक्षक, पटना स्नातक, कोसी स्नातक और दरभंगा स्नातक—में कांग्रेस और RJD के उम्मीदवार एक ही चुनावी मैदान में उतरते नजर आ रहे हैं।

यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब दोनों दल एक ही राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा हैं, तो क्या इन सीटों पर अंतिम समय तक कोई समझौता होगा या फिर गठबंधन के भीतर ही दोस्ताना मुकाबले का रास्ता खुला रहेगा?

चार सीटों पर सीधा टकराव, किसका दावा कितना मजबूत?

विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक सीटों का चुनाव सामान्य विधानसभा चुनाव से अलग होता है। यहां मतदाताओं का दायरा और चुनावी समीकरण अलग प्रकृति के होते हैं। ऐसे में उम्मीदवारों का व्यक्तिगत प्रभाव, संगठन की सक्रियता, स्थानीय समीकरण और मतदाताओं से लंबे समय का संपर्क महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

यही कारण है कि इन सीटों पर एक ही गठबंधन के दो दलों के प्रत्याशियों का मैदान में उतरना चुनावी गणित को जटिल बना सकता है।

कांग्रेस की ओर से पांच नाम घोषित किए जाने के बाद पार्टी ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वह इन सीटों पर अपने राजनीतिक दावे को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रही। वहीं RJD पहले ही चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार चुका है। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या दोनों दल नामांकन की अंतिम तारीख से पहले कोई साझा फार्मूला तैयार कर पाते हैं।

कांग्रेस का सवाल—पहले बातचीत क्यों नहीं?

कांग्रेस नेताओं की ओर से यह बात सामने आई है कि RJD को उम्मीदवार घोषित करने से पहले कांग्रेस से बातचीत करनी चाहिए थी। पार्टी नेताओं के अनुसार, गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर संवाद की प्रक्रिया पूरी होने से पहले उम्मीदवारों की घोषणा से असमंजस पैदा हुआ है।

यह राजनीतिक आपत्ति अब सिर्फ टिकट वितरण तक सीमित नहीं रह गई है। इसके पीछे गठबंधन के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया का सवाल भी जुड़ गया है।

अगर दो सहयोगी दल एक ही सीट पर अलग-अलग उम्मीदवार खड़े करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से उनके समर्थकों के सामने भी असमंजस पैदा हो सकता है। किस उम्मीदवार के पक्ष में संगठन पूरी ताकत लगाएगा? कार्यकर्ताओं को किस दिशा में काम करने का निर्देश मिलेगा? और अगर दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच अंतिम समझौता नहीं हुआ तो स्थानीय स्तर पर चुनावी अभियान किस तरह चलेगा?

इन सवालों का जवाब अभी स्पष्ट नहीं है।

RJD और कांग्रेस की दूरी का असर चुनावी रणनीति पर?

महागठबंधन की राजनीति में सीटों का बंटवारा हमेशा से संवेदनशील विषय रहा है। बिहार में कांग्रेस और RJD दोनों का अपना संगठनात्मक आधार और राजनीतिक इतिहास है। लेकिन विधान परिषद चुनाव जैसे सीमित निर्वाचन क्षेत्रों वाले मुकाबले में सीटों पर दावा कई बार सामान्य चुनाव से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

यही वजह है कि उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक संदेश भी निकलते हैं।

कांग्रेस के लिए अपने उम्मीदवार घोषित करना संगठन को सक्रिय करने और अपने दावे को सार्वजनिक रूप से दर्ज कराने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। वहीं RJD पहले ही चार सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर चुका है। अब दोनों पक्षों को अपने-अपने राजनीतिक और संगठनात्मक दावों के बीच संतुलन बनाना होगा।

NDA को मिला महागठबंधन पर हमला करने का मौका

महागठबंधन के भीतर उम्मीदवारों को लेकर बनी स्थिति ने NDA नेताओं को भी विपक्ष पर निशाना साधने का अवसर दिया है। NDA की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि जब विपक्षी दल चुनाव से पहले ही एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतार रहे हैं, तो वे एकजुट चुनावी रणनीति कैसे लागू करेंगे?

हालांकि, चुनावी राजनीति में सहयोगी दलों के बीच सीटों को लेकर मतभेद होना अपने आप में अंतिम राजनीतिक परिणाम का संकेत नहीं माना जा सकता। अंतिम स्थिति नामांकन और नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

लेकिन इतना जरूर है कि फिलहाल महागठबंधन की सीट-समझौता प्रक्रिया सवालों के घेरे में है।

6 अक्टूबर तक नामांकन, 9 अक्टूबर तक तस्वीर बदलने का मौका

बिहार विधान परिषद की इन आठ सीटों के लिए मतदान 23 अक्टूबर को होगा। मतगणना 27 अक्टूबर को होगी। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है। 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी, जबकि उम्मीदवार 9 अक्टूबर तक नाम वापस ले सकेंगे।

यानी राजनीतिक दलों के पास अभी अंतिम समझौते के लिए समय मौजूद है।

इसी अवधि में यह तय हो सकता है कि कांग्रेस और RJD अपने-अपने उम्मीदवारों के साथ चुनाव मैदान में बने रहते हैं या किसी साझा रणनीति के तहत कुछ सीटों पर उम्मीदवारों में बदलाव अथवा नाम वापसी होती है।

इसलिए मौजूदा तस्वीर को अंतिम चुनावी मुकाबला मानना जल्दबाजी होगी।

सवाल सिर्फ आठ सीटों का नहीं, गठबंधन के तालमेल का भी

इन चुनावों का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश सिर्फ यह नहीं होगा कि कौन उम्मीदवार जीतता है। उससे पहले यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि गठबंधन के भीतर सीटों को लेकर सहमति किस तरह बनती है।

क्या सहयोगी दलों के बीच उम्मीदवार घोषित करने से पहले पर्याप्त संवाद हुआ था? अगर नहीं हुआ तो इसकी वजह क्या थी? क्या दोनों दल स्थानीय स्तर पर अपने-अपने संगठन की ताकत के आधार पर सीटों पर दावा कर रहे हैं? और क्या नामांकन वापसी तक कोई साझा फॉर्मूला निकल सकता है?

इन सवालों पर फिलहाल राजनीतिक बयानबाजी तेज हो रही है।

‘एकजुटता’ के दावे और जमीनी चुनावी गणित आमने-सामने

राजनीतिक गठबंधन केवल मंच साझा करने या संयुक्त बयान जारी करने से मजबूत नहीं होता। चुनावी मैदान में सीटों का तालमेल, उम्मीदवार चयन और कार्यकर्ताओं के बीच स्पष्ट संदेश भी उसकी अहम परीक्षा होते हैं।

बिहार विधान परिषद की इन आठ सीटों पर कांग्रेस और RJD की मौजूदा स्थिति इसी परीक्षा का एक उदाहरण है।

एक तरफ महागठबंधन की राजनीति में व्यापक विपक्षी एकता का दावा किया जाता है, दूसरी तरफ चार सीटों पर दोनों सहयोगी दलों के उम्मीदवारों की मौजूदगी ने व्यावहारिक स्तर पर अलग तस्वीर पैदा कर दी है।

यही विरोधाभास अब चुनावी चर्चा के केंद्र में है।

अब निगाह 9 अक्टूबर पर—कौन पीछे हटेगा, कौन डटा रहेगा?

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तारीख 9 अक्टूबर है। नाम वापसी की समयसीमा समाप्त होने के बाद ही यह साफ होगा कि कांग्रेस और RJD के बीच आमने-सामने का मुकाबला वास्तव में होता है या फिर गठबंधन धर्म निभाने के लिए किसी स्तर पर समझौता किया जाता है।

23 अक्टूबर को मतदान और 27 अक्टूबर को मतगणना होगी, लेकिन उससे पहले 6 से 9 अक्टूबर के बीच की राजनीतिक गतिविधियां इन आठ सीटों के चुनावी समीकरण को पूरी तरह बदल सकती हैं।

पर्दाफाश न्यूज़ की नजर में असली सवाल यही है—महागठबंधन के घटक दल चुनाव मैदान में एक-दूसरे के खिलाफ उतरकर अपनी-अपनी ताकत आजमाएंगे या अंतिम क्षण में साझा रणनीति बनाकर मतदाताओं के सामने एक उम्मीदवार का विकल्प रखेंगे?

फिलहाल तस्वीर अधूरी है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि बिहार विधान परिषद की आठ सीटों का चुनाव केवल उम्मीदवारों की राजनीतिक परीक्षा नहीं बनने जा रहा। यह कांग्रेस और RJD के बीच चुनावी तालमेल, संगठनात्मक संवाद और गठबंधन की व्यावहारिक राजनीति की भी परीक्षा बन चुका है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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