“CNLU में बिना स्क्रिप्ट खुला संवाद, विरोध के अधिकार से लेकर महंगी कानूनी शिक्षा और युवा वकीलों के भविष्य तक उठे तीखे सवाल”
पर्दाफाश न्यूज़: पटना
न्यायपालिका को लेकर आम धारणा अक्सर यही रहती है कि अदालतों में सवाल सीमित होते हैं, जवाब कानूनी भाषा में आते हैं और न्याय की पूरी प्रक्रिया एक निर्धारित औपचारिकता के भीतर आगे बढ़ती है। लेकिन पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (CNLU) में 25 सितंबर को कुछ अलग तस्वीर दिखाई दी। यहां भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत अदालत की औपचारिक सीमाओं से बाहर निकलकर सीधे कानून के उन विद्यार्थियों के बीच पहुंचे, जो आने वाले वर्षों में इसी न्याय व्यवस्था का हिस्सा बनने वाले हैं। CNLU की आधिकारिक इवेंट सूची में भी इस कार्यक्रम को “Perspect & Open House: Beyond Opinions Towards Understanding” के रूप में दर्ज किया गया है।
अशोक ऑडिटोरियम में हुआ यह संवाद सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था। सवाल छात्रों के थे और जवाब सीधे CJI के। कोई तैयार स्क्रिप्ट नहीं, कोई पूर्व निर्धारित प्रश्नावली नहीं और न ही संवाद को केवल औपचारिक भाषण तक सीमित रखने की कोशिश।
यही इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता रही।
जब CJI के सामने छात्रों ने खोल दिए सवालों के पन्ने
यह पहल विश्वविद्यालय के छात्रों की ओर से की गई थी। अकादमिक एवं डिबेटिंग कमिटी और लीगल एड सेल ने मिलकर कार्यक्रम का आयोजन किया। CNLU की लीगल एड व्यवस्था भी छात्रों को कानूनी जागरूकता और जरूरतमंदों को कानूनी सहायता से जोड़ने के उद्देश्य पर आधारित है।
ऐसे में जब देश के सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख स्वयं छात्रों के सामने बैठे, तो संवाद केवल पढ़ाई या करियर तक सीमित रहना स्वाभाविक नहीं था।
छात्रों ने न्याय व्यवस्था, विरोध के अधिकार, कानूनी शिक्षा की लागत और युवा वकीलों के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों जैसे मुद्दे सामने रखे।
यहां सवाल करने वाला छात्र सिर्फ विद्यार्थी नहीं था—वह भविष्य का वकील, न्यायाधीश, विधि विशेषज्ञ और संवैधानिक व्यवस्था का संभावित भागीदार था।
विरोध किया तो अपराधी क्यों समझा जाए?
कार्यक्रम में एक छात्रा ने शांतिपूर्ण छात्र विरोध और पुलिस के रवैये को लेकर सवाल उठाया।
इस सवाल पर CJI सूर्य कांत ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर न्यायपालिका की प्रतिबद्धता दोहराई। यह बात खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगस्त 2026 में NALSAR के छात्रों से जुड़े विवाद के दौरान भी CJI की अध्यक्षता वाली पीठ ने छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर जोर दिया था। अदालत में CJI ने कहा था कि छात्रों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठाने का अधिकार है और सवाल किया था कि किसी बाहरी संस्था को छात्रों और CJI के बीच संवाद में हस्तक्षेप क्यों करना चाहिए।
यानी पटना में छात्रों के सामने कही गई बात को उस व्यापक न्यायिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
लोकतंत्र में असहमति की आवाज कितनी जगह पाएगी?
यह सवाल केवल विश्वविद्यालय परिसर का सवाल नहीं है। यह उस संवैधानिक संस्कृति का सवाल है जिसमें नागरिक और छात्र अपनी असहमति व्यक्त कर सकते हैं।
CJI के जवाब पर ऑडिटोरियम में तालियों की गूंज इस बात का संकेत थी कि छात्रों के लिए यह मुद्दा केवल सैद्धांतिक नहीं बल्कि बेहद वास्तविक है।
NALSAR विवाद की छाया में CNLU का संवाद
CNLU में यह कार्यक्रम ऐसे समय हुआ जब देश में कानून के छात्रों और CJI के बीच संवाद को लेकर पहले ही सार्वजनिक बहस हो चुकी थी।
NALSAR से जुड़े विवाद में छात्रों के विरोध, बार काउंसिल ऑफ इंडिया की कार्रवाई और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने यह सवाल खड़ा किया था कि कानून पढ़ने वाले छात्रों को संस्थागत असहमति व्यक्त करने की कितनी स्वतंत्रता होनी चाहिए। उस मामले में CJI की पीठ ने छात्रों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर स्पष्ट टिप्पणी की थी।
इस पृष्ठभूमि में CNLU का खुला संवाद और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
यहां छात्रों ने केवल CJI को सुना नहीं, बल्कि उनसे सवाल भी किए।
कानून पढ़ना आसान नहीं, कानून की लड़ाई लड़ना उससे भी कठिन
संवाद का दूसरा बड़ा मुद्दा युवा वकीलों की आर्थिक स्थिति रही।
कानून की डिग्री हासिल करने के बाद बार में प्रवेश करना अपने आप में करियर की गारंटी नहीं है। खासकर पहली पीढ़ी के युवा वकीलों के सामने शुरुआती वर्षों में आर्थिक संघर्ष एक बड़ी चुनौती हो सकता है।
CJI सूर्य कांत ने इसी वास्तविकता को रेखांकित करते हुए युवा वकीलों के लिए पेशेवर सहायता की आवश्यकता पर बात की।
यह मुद्दा केवल CNLU के मंच से उठी कोई सामान्य चिंता नहीं है। जून 2026 में Sarika Tyagi बनाम Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में युवा वकीलों के लिए “Young Lawyers’ Professional Assistance Fund” की आवश्यकता पर विस्तार से विचार किया गया। अदालत ने आर्थिक रूप से कमजोर और पहली पीढ़ी के वकीलों को शुरुआती पेशेवर वर्षों में सहायता देने के लिए संरचित व्यवस्था की बात कही।
अदालत के आदेश में यह भी विचार रखा गया कि शुरुआती वर्षों में आर्थिक सहायता उन्हें पेशे में टिके रहने में मदद कर सकती है और समय के साथ सहायता कम की जा सकती है ताकि वकील आत्मनिर्भर बन सकें।
इसलिए CNLU में युवा वकीलों की चिंता केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं रही—यह न्याय व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा संस्थागत प्रश्न बन चुकी है।
‘दान’ नहीं, पेशे के भविष्य में निवेश
CJI के संवाद का एक अहम संदेश यही था कि युवा वकीलों को शुरुआती दौर में सहायता देना किसी पर एहसान या दान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कानूनी पेशे की मजबूती इस बात पर भी निर्भर करती है कि आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली युवा इस पेशे में टिक पाएंगे या नहीं।
अगर कोई युवा वकील केवल इसलिए पेशा छोड़ देता है क्योंकि वह शुरुआती वर्षों का खर्च नहीं उठा सकता, तो नुकसान केवल उस व्यक्ति का नहीं है।
नुकसान न्याय व्यवस्था का भी है।
क्योंकि अदालतों को ऐसे वकीलों की आवश्यकता होती है जो कानून को समझते हों, तथ्यों पर पकड़ रखते हों और समाज के विभिन्न वर्गों की आवाज अदालत तक पहुंचा सकें।
छात्रों ने पूछा—फीस इतनी बढ़ेगी तो पढ़ेगा कौन?
ओपन हाउस में कानून की बढ़ती फीस और अपर्याप्त स्कॉलरशिप को लेकर भी चिंता सामने आई।
यह सवाल सीधे उच्च शिक्षा की पहुंच से जुड़ता है।
कानून की पढ़ाई को अगर लगातार महंगा बनाया जाता है और आर्थिक सहायता सीमित रहती है, तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या विधि शिक्षा सभी प्रतिभाशाली छात्रों के लिए समान रूप से उपलब्ध रह पाएगी?
CJI ने इस चिंता पर ध्यान देने का आश्वासन दिया।
यह आश्वासन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कानून की शिक्षा केवल व्यक्तिगत करियर का माध्यम नहीं है। यही विद्यार्थी आगे चलकर अदालतों, बार, न्यायिक सेवाओं, अकादमिक संस्थानों और सार्वजनिक संस्थाओं में भूमिका निभाते हैं।
CNLU के वीसी ने रख दिया चार साल की लॉ डिग्री का प्रस्ताव
कार्यक्रम में CNLU के वाइस-चांसलर प्रोफेसर फैजान मुस्तफा ने भी कानूनी शिक्षा की मौजूदा संरचना को लेकर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा।
उन्होंने पांच वर्षीय लॉ डिग्री को चार साल में पूरा करने और अंतिम वर्ष को अनिवार्य कोर्ट अप्रेंटिसशिप के रूप में रखने का सुझाव दिया।
साथ ही न्यायिक सेवा परीक्षाओं के लिए अलग से एक वर्ष की प्रैक्टिस की आवश्यकता को समाप्त करने की बात सामने रखी गई।
इस प्रस्ताव के पीछे मूल विचार यही है कि कानून की पढ़ाई केवल किताबों और कक्षाओं तक सीमित न रहे, बल्कि छात्रों को अदालतों की वास्तविक कार्यप्रणाली से भी जोड़ा जाए।
यानी छात्र जब डिग्री लेकर बाहर निकले तो उसके पास केवल डिग्री न हो—बल्कि अदालत, केस, बहस और न्यायिक प्रक्रिया की व्यावहारिक समझ भी हो।
कक्षा से कोर्ट तक—क्या बदलनी होगी पूरी व्यवस्था?
यह प्रस्ताव कई बड़े सवाल खड़े करता है।
क्या मौजूदा कानूनी शिक्षा में पर्याप्त व्यावहारिक प्रशिक्षण है?
क्या छात्रों को कोर्ट की वास्तविक प्रक्रिया से पर्याप्त समय पहले परिचित कराया जाता है?
क्या न्यायिक सेवा की तैयारी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सकता है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या कानूनी शिक्षा ऐसी हो सकती है जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर छात्र भी बराबरी के साथ आगे बढ़ सकें?
CNLU का यह संवाद इन सवालों को सामने लेकर आया है।
सवाल सिर्फ CJI से नहीं, पूरी व्यवस्था से है
पटना के इस ओपन हाउस की असली ताकत शायद यही रही कि इसमें संवाद एकतरफा नहीं था।
CJI ने छात्रों को केवल संबोधित नहीं किया।
उन्होंने छात्रों की बात सुनी।
विरोध के अधिकार पर सवाल आया तो जवाब मिला।
युवा वकीलों की आर्थिक कठिनाइयों की बात हुई तो संस्थागत सहायता की जरूरत सामने आई।
फीस का सवाल उठा तो ध्यान देने का आश्वासन मिला।
और कानूनी शिक्षा की संरचना पर विश्वविद्यालय की ओर से बदलाव का प्रस्ताव सामने आया।
यानी मंच पर केवल भाषण नहीं हुआ—बल्कि न्याय व्यवस्था की अगली पीढ़ी ने अपने भविष्य से जुड़े प्रश्न सीधे देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति के सामने रखे।
पर्दाफाश न्यूज़ का सवाल: क्या संवाद की यह संस्कृति आगे भी चलेगी?
CNLU का ओपन हाउस एक कार्यक्रम से आगे जाकर एक महत्वपूर्ण संस्थागत प्रयोग के रूप में सामने आया है।
अगर कानून के विद्यार्थी देश के मुख्य न्यायाधीश से बिना औपचारिकता के सवाल कर सकते हैं, अगर असहमति पर बातचीत हो सकती है, अगर युवा वकीलों की आर्थिक समस्याओं को न्याय व्यवस्था के भविष्य से जोड़कर देखा जा सकता है और अगर कानूनी शिक्षा की संरचना पर खुलकर बहस हो सकती है—तो यह संवाद आगे भी जारी रहना चाहिए।
क्योंकि न्याय केवल अदालत की चारदीवारी में पैदा नहीं होता।
न्याय की समझ विश्वविद्यालयों में बनती है।
वह सवालों से मजबूत होती है।
बहस से परिपक्व होती है।
और असहमति को सुनने की क्षमता से लोकतांत्रिक बनती है।
पटना के CNLU में CJI सूर्य कांत और कानून के छात्रों के बीच हुआ यह संवाद इसी व्यापक सवाल को सामने रखता है—क्या आने वाली न्याय व्यवस्था ऐसी होगी जहां सवाल पूछने वाले छात्रों को सिर्फ कानून पढ़ाया जाएगा, या उन्हें कानून और न्याय के बीच के फर्क को समझने का अवसर भी दिया जाएगा?
CJI सूर्य कांत का यह संवाद कम-से-कम इतना जरूर दिखाता है कि सर्वोच्च न्यायिक संस्था और कानून के विद्यार्थियों के बीच सीधी बातचीत संभव है।
अब निगाह इस बात पर होगी कि इस संवाद में उठे सवाल—युवा वकीलों की आर्थिक सुरक्षा, कानूनी शिक्षा की लागत, व्यावहारिक प्रशिक्षण और शांतिपूर्ण छात्र विरोध के अधिकार—कितनी दूर तक संस्थागत बदलाव का रास्ता बनाते हैं।
क्योंकि सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत है—लेकिन सवालों का जवाब व्यवस्था किस रूप में देती है, असली परीक्षा वहीं से शुरू होती है।















