“दिशा बताने वाला बोर्ड गायब, विज्ञापन का बोलबाला—तेज रफ्तार एक्सप्रेसवे पर हजारों यात्रियों की सुरक्षा दांव पर”
पर्दाफाश न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट
नोएडा, 26 सितंबर 2026। नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे को शहर की तेज रफ्तार और आधुनिक कनेक्टिविटी की पहचान माना जाता है। लेकिन इसी एक्सप्रेसवे के एक महत्वपूर्ण एग्जिट पॉइंट पर दिशा-सूचक बोर्ड का गायब होना अब गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। नोएडा से ग्रेटर नोएडा की ओर जाने वाले मार्ग पर सेक्टर-105, सेक्टर-108, सेक्टर-82, एटीएस हेमलेट, गेझा, भगेल और आसपास की बड़ी ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों की ओर जाने वाले पहले एग्जिट पॉइंट पर वर्तमान में आधिकारिक दिशा-सूचक बोर्ड नहीं होने का मुद्दा सामने आया है।
सेक्टर-105 आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने इस स्थिति को यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय बताते हुए तत्काल कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि इस एग्जिट से प्रतिदिन बड़ी संख्या में वाहन गुजरते हैं और बोर्ड के अभाव में खासकर अनजान वाहन चालकों को अंतिम समय पर एग्जिट का पता चलता है।
रफ्तार 80-100, फैसला कुछ सेकंड में—फिर गलती की गुंजाइश कितनी?
एक्सप्रेसवे पर वाहन सामान्य सड़कों की तुलना में अधिक गति से चलते हैं। ऐसे में किसी एग्जिट की जानकारी पर्याप्त दूरी पहले मिलना जरूरी होता है, ताकि चालक सुरक्षित तरीके से लेन बदल सके और मोड़ के लिए पहले से तैयारी कर सके।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष के अनुसार, जिस स्थान पर पहले सेक्टर-105 और सेक्टर-108 के लिए स्पष्ट दिशा-सूचक बोर्ड लगा था, वह अब मौजूद नहीं है। उनका आरोप है कि वहां व्यावसायिक विज्ञापन लगाने के कारण मूल दिशा-सूचक बोर्ड हटा दिया गया।
यही वह बिंदु है जहां सवाल केवल एक बोर्ड का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि क्या सड़क सुरक्षा से जुड़ी जरूरी जानकारी को किसी भी व्यावसायिक गतिविधि के आगे पीछे किया जा सकता है?
यदि कोई चालक पहली बार इस मार्ग से गुजर रहा हो और उसे एग्जिट का संकेत समय रहते न मिले, तो उसके सामने सीमित विकल्प बचते हैं—अचानक ब्रेक लगाना, तेजी से लेन बदलना या एग्जिट मिस कर आगे निकल जाना। इनमें से किसी भी स्थिति में पीछे से आ रहे तेज रफ्तार वाहनों के कारण जोखिम पैदा हो सकता है।
एक बोर्ड गायब, लेकिन खतरा कई गुना?
शहरों में साइन बोर्ड केवल रास्ता बताने के लिए नहीं होते। वे यातायात व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। विशेष रूप से एक्सप्रेसवे पर दिशा-सूचक संकेत चालक को पहले से निर्णय लेने का अवसर देते हैं।
सेक्टर-105 आरडब्ल्यूए की ओर से उठाए गए मुद्दे के मुताबिक, इस एग्जिट का इस्तेमाल केवल एक-दो सेक्टर के लोग नहीं करते। आसपास विकसित हो चुकी बड़ी आवासीय सोसायटियों के कारण यहां रोजाना बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी, नौकरीपेशा लोग, कैब चालक, डिलीवरी वाहन और बाहर से आने वाले लोग आवाजाही करते हैं।
ऐसे में बोर्ड का न होना स्थानीय लोगों के लिए भले ही रोजमर्रा की परेशानी हो, लेकिन किसी बाहरी चालक के लिए यह अचानक सामने आने वाली यातायात चुनौती बन सकता है।
‘विज्ञापन बनाम जनसुरक्षा’ का सवाल
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष दिव्य कृष्णात्रेय ने आरोप लगाया है कि व्यावसायिक विज्ञापन लगाने की होड़ में मूल दिशा-सूचक बोर्ड को हटा दिया गया।
यह आरोप गंभीर है और इसकी निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। यदि वास्तव में किसी अधिकृत या अनधिकृत विज्ञापन के लिए जनसुविधा से जुड़े साइन बोर्ड को हटाया गया है, तो यह जांच का विषय बनता है कि ऐसा निर्णय किस स्तर पर हुआ, किसकी अनुमति से हुआ और सुरक्षा मानकों का पालन कैसे सुनिश्चित किया गया।
दूसरी ओर, यदि बोर्ड किसी अन्य प्रशासनिक, तकनीकी या सड़क प्रबंधन संबंधी कारण से हटाया गया है, तो संबंधित विभाग को इसकी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
जनता का सवाल सीधा है—बोर्ड क्यों हटाया गया और उसकी जगह नया बोर्ड अब तक क्यों नहीं लगाया गया?
सिर्फ एक्सप्रेसवे नहीं, सार्वजनिक संपत्तियों पर भी सवाल
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष ने शहर की सार्वजनिक संपत्तियों और दीवारों पर अवैध विज्ञापन तथा पोस्टर लगाए जाने का मुद्दा भी उठाया है।
उनका आरोप है कि शहर के कई हिस्सों में सरकारी संपत्तियों और सार्वजनिक दीवारों पर विज्ञापन चिपकाए या लगाए जा रहे हैं, जिससे सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचने के साथ शहर के सौंदर्य पर भी असर पड़ रहा है।
यह मुद्दा केवल सौंदर्यीकरण तक सीमित नहीं है। सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाने वाले विज्ञापनों की अनुमति, उनका आकार, स्थान, दृश्यता और यातायात सुरक्षा से उनका संबंध महत्वपूर्ण विषय हैं। विशेषकर उन स्थानों पर जहां वाहन चालकों को दिशा, गति या एग्जिट संबंधी जानकारी चाहिए, वहां किसी भी विज्ञापन की स्थिति की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
नोएडा प्राधिकरण से सीधा सवाल
आरडब्ल्यूए ने नोएडा प्राधिकरण के महाप्रबंधक ए. के. अरोड़ा से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
मांग है कि प्रथम एग्जिट पॉइंट पर तुरंत एक बड़ा, स्पष्ट और रिफ्लेक्टिव दिशा-सूचक बोर्ड लगाया जाए, ताकि दिन के साथ-साथ रात में भी वाहन चालकों को पर्याप्त दूरी से एग्जिट की जानकारी मिल सके।
इसके साथ ही यह भी मांग की गई है कि यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी व्यावसायिक गतिविधि के कारण दिशा-सूचक बोर्ड हटाया गया या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
‘पहले सुरक्षा, बाद में विज्ञापन’—यही होना चाहिए मूल सिद्धांत
किसी भी विकसित शहर की पहचान केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और एक्सप्रेसवे से नहीं होती। असली कसौटी यह होती है कि आम नागरिक उन सड़कों पर कितना सुरक्षित और सहज महसूस करता है।
नोएडा को आधुनिक शहर के रूप में विकसित करने की दिशा में बड़े स्तर पर सड़क और परिवहन ढांचा तैयार हुआ है। लेकिन सड़क के किनारे लगा एक छोटा-सा दिशा-सूचक बोर्ड भी उस पूरे ढांचे का अहम हिस्सा होता है।
यदि चालक को यह पता ही न हो कि उसे किस एग्जिट से निकलना है, तो चौड़ी और तेज रफ्तार सड़क भी उसके लिए परेशानी का कारण बन सकती है।
रात के समय चुनौती और बढ़ सकती है
रात में दृश्यता कम होने के कारण दिशा-सूचक बोर्ड का रिफ्लेक्टिव होना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। बाहर से आने वाले चालक, कैब ड्राइवर या पहली बार इस मार्ग पर आने वाला व्यक्ति केवल सड़क देखकर सही एग्जिट का अनुमान नहीं लगा सकता।
ऐसे में पर्याप्त दूरी पहले लगाया गया स्पष्ट रिफ्लेक्टिव बोर्ड चालक को लेन बदलने और सुरक्षित तरीके से एग्जिट लेने का समय देता है।
आरडब्ल्यूए की मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि नया बोर्ड केवल लगाया ही न जाए, बल्कि उसकी दृश्यता, ऊंचाई, आकार, स्थान और रिफ्लेक्टिव गुणवत्ता भी ऐसी हो कि वह तेज रफ्तार यातायात के बीच आसानी से दिखाई दे।
अब कार्रवाई का इंतजार
सेक्टर-105 आरडब्ल्यूए ने प्रशासन से तत्काल कदम उठाने की मांग की है। क्षेत्रीय निवासियों को उम्मीद है कि नोएडा प्राधिकरण इस मामले को केवल शिकायत के रूप में नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा से जुड़े विषय के रूप में देखेगा।
सवाल यह नहीं कि एक साइन बोर्ड की कीमत कितनी है। सवाल यह है कि उस बोर्ड के न होने से पैदा होने वाला जोखिम कितना बड़ा हो सकता है।
अगर एक दिशा-सूचक बोर्ड हजारों यात्रियों को समय रहते सही एग्जिट की जानकारी दे सकता है, तो उसे हटने के बाद महीनों तक उसकी जगह खाली रहना अपने आप में व्यवस्था के लिए सवाल खड़ा करता है।
पर्दाफाश न्यूज़ का सवाल
क्या एक्सप्रेसवे पर विज्ञापन की चमक दिशा-सूचक बोर्ड की जरूरत पर भारी पड़ सकती है?
क्या किसी व्यावसायिक हित के कारण यातायात सुरक्षा से जुड़े संकेतों को हटाया जा सकता है?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर प्रशासन को पहले से पता है कि यहां रोजाना हजारों वाहन गुजरते हैं, तो स्पष्ट साइन बोर्ड लगाने में देरी क्यों?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग की कार्रवाई से ही मिलेगा।
फिलहाल जरूरत किसी आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि तत्काल समाधान की है। प्रथम एग्जिट पॉइंट पर स्पष्ट, बड़ा और रिफ्लेक्टिव दिशा-सूचक बोर्ड लगाया जाना चाहिए तथा विज्ञापन और सार्वजनिक संपत्ति से जुड़े नियमों की जांच कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
क्योंकि सड़क पर वाहन चालक से गलती की कीमत कभी-कभी केवल कुछ सेकंड में बहुत बड़ी हो सकती है।
पर्दाफाश न्यूज़ की नजर अब इस बात पर रहेगी कि नोएडा प्राधिकरण इस शिकायत पर क्या कार्रवाई करता है और कब तक करता है।















