नई दिल्ली। वीर सावरकर को लेकर दिए गए विवादित बयान पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती दिखाई दे रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में चल रही मानहानि मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने राहुल गांधी की टिप्पणियों पर कड़ी नाराजगी जताई और स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि इतिहास और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को राजनीतिक बयानबाजी का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।
अदालत की टिप्पणी से बढ़ी राजनीतिक हलचल
सुनवाई के दौरान राहुल गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी पेश हुए। इसी दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि क्या केवल अंग्रेजों को लिखे गए पत्रों के आधार पर किसी स्वतंत्रता सेनानी को “ब्रिटिशों का सेवक” कहा जा सकता है?
पीठ ने कहा कि महात्मा गांधी भी ब्रिटिश वायसराय को लिखे पत्रों में “Your Faithful Servant” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे। अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या इसका अर्थ यह लगाया जाए कि गांधीजी ब्रिटिशों के सेवक थे? अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि ऐतिहासिक संदर्भों को तोड़-मरोड़ कर राजनीतिक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
हालांकि, सोशल मीडिया और कुछ वायरल दावों में यह कहा गया कि अदालत ने गांधीजी को ब्रिटिशों से ₹1200 वेतन मिलने का जिक्र किया या राहुल गांधी के वकील “निरुत्तर” हो गए। उपलब्ध न्यायिक रिपोर्टों और मीडिया कवरेज में इस दावे की पुष्टि नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक सुनवाई रिपोर्टों में मुख्य रूप से “Your Faithful Servant” वाली टिप्पणी और स्वतंत्रता सेनानियों के सम्मान पर अदालत की नाराजगी का उल्लेख है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला राहुल गांधी द्वारा वर्ष 2022 में महाराष्ट्र के अकोला में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान दिए गए उस बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने वीर सावरकर को लेकर कथित तौर पर “माफी वीर” और ब्रिटिशों से पेंशन लेने जैसी टिप्पणियां की थीं। इसके बाद उनके खिलाफ मानहानि की शिकायत दर्ज कराई गई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा राहत देने से इनकार किए जाने के बाद राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगाई है, लेकिन साथ ही राहुल गांधी को भविष्य में स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ “गैर-जिम्मेदाराना बयान” न देने की चेतावनी भी दी।
“स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान नहीं होना चाहिए” — सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि महाराष्ट्र में वीर सावरकर को बड़ी संख्या में लोग सम्मान और श्रद्धा से देखते हैं। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं को अपने शब्दों के प्रभाव को समझना चाहिए।
पीठ ने टिप्पणी की, “यह हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के साथ व्यवहार करने का तरीका नहीं है।” अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में इस तरह की टिप्पणियां दोहराई गईं तो सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेने पर भी विचार कर सकता है।
सावरकर पर देश की राजनीति क्यों बंट जाती है?
विनायक दामोदर सावरकर भारतीय राजनीति के सबसे विवादित लेकिन प्रभावशाली ऐतिहासिक व्यक्तित्वों में से एक रहे हैं। एक पक्ष उन्हें क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी और राष्ट्रवादी विचारक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष अंग्रेजों को लिखी गई दया याचिकाओं को लेकर उनकी आलोचना करता रहा है।
बीजेपी और हिंदुत्व संगठनों ने हमेशा सावरकर को राष्ट्रवादी नायक बताया है, जबकि कांग्रेस और विपक्ष के कुछ नेता समय-समय पर उनके ब्रिटिश शासन से जुड़े पत्रों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। यही कारण है कि सावरकर का मुद्दा अक्सर अदालत से लेकर संसद और चुनावी मंचों तक राजनीतिक बहस का केंद्र बन जाता है।
कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी पर स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान करने का आरोप लगाया है। वहीं कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अदालत ने केवल ऐतिहासिक संदर्भों की बात की है और राजनीतिक दल इस पर अनावश्यक बयानबाजी कर रहे हैं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने वीर सावरकर, महात्मा गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े ऐतिहासिक विमर्श को फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।














