पंजाब की राजनीति इस वक्त बदले, बवाल और भय के विस्फोटक मोड़ पर खड़ी है—और इस सियासी तूफान के बीच फंसे हैं पूर्व क्रिकेटर, राज्यसभा सांसद Harbhajan Singh। जैसे ही हरभजन सिंह ने Aam Aadmi Party का साथ छोड़कर Bharatiya Janata Party का दामन थामा, वैसे ही उनका सुरक्षा कवच कथित तौर पर रातोंरात गायब हो गया। और फिर जो हुआ उसने पंजाब की सियासत को शर्मसार कर दिया—घर के बाहर उग्र प्रदर्शन, दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘गद्दार’, नारों से दहला माहौल, और परिवार के सिर पर मंडराता सीधा खतरा। मामला इतना गंभीर हो गया कि आखिरकार Punjab and Haryana High Court को हस्तक्षेप करना पड़ा और पंजाब सरकार को सख्त आदेश देना पड़ा कि हरभजन सिंह और उनके परिवार को कोई शारीरिक नुकसान नहीं होना चाहिए।
यह अब कोई साधारण सुरक्षा विवाद नहीं रह गया है। यह सवाल बन चुका है—क्या पंजाब में पार्टी बदलने की सजा सुरक्षा छीनकर दी जा रही है? क्या सियासी निष्ठा बदलते ही एक सांसद को खुले खतरे के बीच छोड़ दिया गया? हरभजन सिंह ने हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में साफ आरोप लगाया है कि पंजाब पुलिस ने उनका सुरक्षा घेरा बिना ताजा खतरा मूल्यांकन, बिना नोटिस, बिना सुनवाई का मौका दिए मनमाने तरीके से वापस ले लिया। यानी न चेतावनी, न कारण, न वैकल्पिक इंतजाम—सीधा सुरक्षा हटाओ और सांसद को जोखिम में छोड़ दो।
24 अप्रैल को हरभजन सिंह ने Aam Aadmi Party से किनारा कर Bharatiya Janata Party का झंडा थाम लिया। पंजाब की सत्ता के लिए यह बड़ा राजनीतिक झटका था। लेकिन असली सनसनी इसके बाद शुरू हुई। हरभजन के मुताबिक, अगले ही दिन सुबह उनके घर पर तैनात पंजाब पुलिसकर्मी हटा लिए गए। सुरक्षा की यह दीवार जैसे ही टूटी, दोपहर होते-होते उग्र भीड़ उनके जालंधर स्थित आवास तक पहुंच गई। नारे लगे, हंगामा हुआ और घर की बाहरी दीवारों पर स्प्रे पेंट से लिख दिया गया—‘गद्दार’। सिर्फ एक शब्द नहीं, यह खुला सियासी संदेश था—जो सत्ता छोड़ेंगे, उन्हें सार्वजनिक रूप से निशाना बनाया जाएगा।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि याचिका में दावा किया गया है कि स्थानीय पुलिस मौके पर मौजूद थी, लेकिन उसने भीड़ को रोकने या कार्रवाई करने में कोई तत्परता नहीं दिखाई। अगर यह आरोप सही है तो मामला और भी विस्फोटक हो जाता है—क्योंकि तब यह सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि कथित प्रशासनिक मौन की आड़ में हुआ मनोवैज्ञानिक हमला बन जाता है। सवाल उठ रहा है कि क्या एक राज्यसभा सांसद को राजनीतिक लाइन बदलने के बाद जानबूझकर असुरक्षित छोड़ा गया?
मामले की गंभीरता को देखते हुए Punjab and Haryana High Court ने इसे हल्का नहीं लिया। जस्टिस जगमोहन बंसल ने पंजाब सरकार को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट अंतरिम आदेश दिया कि हरभजन सिंह और उनके परिवार को राज्य में किसी प्रकार की शारीरिक क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। अगली सुनवाई 12 मई को होगी, लेकिन अदालत की यह टिप्पणी अपने आप में पंजाब सरकार के लिए बड़ा न्यायिक झटका मानी जा रही है। अदालत ने साफ संकेत दे दिया है कि यदि सुरक्षा हटाने के बाद खतरे की घटनाएं सामने आई हैं, तो राज्य जवाबदेही से बच नहीं सकता।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा विरोधाभास भी सामने आया। जहां पंजाब पुलिस ने सुरक्षा हटाई, वहीं केंद्र सरकार ने हरभजन सिंह के जालंधर आवास के बाहर Central Reserve Police Force के जवान तैनात कर दिए। यानी एक सरकारी तंत्र को खतरा दिखा, दूसरे ने सुरक्षा वापस ले ली। यही विरोधाभास अब राजनीतिक शक को और गहरा कर रहा है। क्या राज्य सरकार को खतरा नहीं दिखा, या फिर उसने देखना नहीं चाहा?
अब यह मामला हरभजन सिंह की निजी सुरक्षा से बहुत आगे निकल चुका है। यह पंजाब की राजनीति में बदले की संस्कृति, प्रशासनिक निष्पक्षता और सत्ता के इस्तेमाल पर राष्ट्रीय बहस बन चुका है। विपक्ष पूछ रहा है—
क्या पार्टी छोड़ना अब अपराध है?
क्या सुरक्षा हटाना राजनीतिक संदेश था?
क्यों बिना खतरा समीक्षा के सुरक्षा छीनी गई?
क्यों भीड़ सांसद के घर तक पहुंची?
क्यों ‘गद्दार’ लिखे जाने तक सिस्टम मौन रहा?
ये सवाल सिर्फ अदालत में नहीं, टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक दहाड़ रहे हैं।
एक पार्टी बदली।
एक सुरक्षा घेरा हटा।
एक भीड़ घर पहुंची।
एक दीवार पर लिखा गया—गद्दार।
और अब एक हाईकोर्ट की फटकार ने पंजाब सरकार को सीधे कठघरे में खड़ा कर दिया है।
यह सिर्फ हरभजन सिंह की कहानी नहीं—यह उस सियासी माहौल की कहानी है जहां सत्ता छोड़ना, खतरे को न्योता देने जैसा दिखाया जा रहा है।














