निजामाबाद/तेलंगाना: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संघ की स्थापना डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने भारत को औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त कराने और समाज में एकता स्थापित करने के उद्देश्य से की थी। उन्होंने कहा कि हेडगेवार का लक्ष्य हिंदू समाज को ऐसा बनाना था जो मजबूत, निडर और सद्गुणी हो।
शनिवार, 11 अप्रैल को तेलंगाना के निजामाबाद जिले के कंदकुर्थी गांव में श्री केशव स्पूर्ति मंदिर के उद्घाटन के बाद आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने हेडगेवार के जीवन, विचार और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि हेडगेवार ने ब्रिटिश शासन को समाप्त करने के लिए राजनीतिक और सशस्त्र प्रतिरोध सहित कई माध्यमों से काम किया था।
भागवत ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हेडगेवार ने यह समझा कि भारत की गुलामी का कारण केवल बाहरी शक्तियां नहीं थीं, बल्कि समाज के भीतर मौजूद कुछ कमजोरियां भी थीं। उनके अनुसार, हेडगेवार को यह महसूस हुआ कि समाज में एकता की कमी थी, जिसे दूर करना बेहद जरूरी था। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज विविधताओं का सम्मान करता है, लेकिन सामूहिक शक्ति और संगठन उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि हेडगेवार की सोच केवल विरोध की नहीं थी, बल्कि निर्माण की थी। उनका उद्देश्य किसी के खिलाफ संगठन खड़ा करना नहीं था, बल्कि समाज को संगठित कर राष्ट्र को सशक्त बनाना था। भागवत ने कहा कि हिंदुत्व का अर्थ अपने मार्ग पर चलते हुए दूसरों का सम्मान करना और सौहार्दपूर्ण जीवन जीना है।
उन्होंने यह भी कहा कि हेडगेवार चाहते थे कि हिंदू समाज में साहस, आत्मबल और नैतिकता का विकास हो। भागवत के अनुसार, संघ की प्रार्थना भी इन्हीं मूल्यों को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि हेडगेवार मानते थे कि भारत को स्वतंत्रता के लिए बार-बार संघर्ष न करना पड़े, इसके लिए समाज की आंतरिक कमजोरियों को दूर करना जरूरी है।
भागवत ने आगे कहा कि उस दौर के नेताओं ने अपने-अपने तरीके से देशसेवा का रास्ता चुना, जबकि हेडगेवार ने देश को स्वतंत्र कराने और समाज को संगठित करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। उन्होंने कहा कि इसी जिम्मेदारी की भावना से आरएसएस की स्थापना हुई थी। संघ, उनके अनुसार, किसी के विरुद्ध नहीं बल्कि सभी के कार्यों को आगे बढ़ाने और मातृभूमि को गुलामी से मुक्त करने के लिए बनाया गया था।
भागवत के इस संबोधन को संघ के इतिहास, उसके उद्देश्य और डॉ. हेडगेवार की विचारधारा को समझने के एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। उनके बयान ने एक बार फिर इस चर्चा को जन्म दिया है कि सामाजिक एकता, संगठन और आत्मबल किस तरह राष्ट्रनिर्माण की बुनियादी शर्तें बन सकते हैं।














