नई दिल्ली: कक्षा 8 की सोशल साइंस की एनसीईआरटी पुस्तक में भारतीय न्यायपालिका को लेकर प्रकाशित आपत्तिजनक सामग्री पर Supreme Court of India ने सख्त रुख अपनाया है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हम बिना शर्त माफी स्वीकार नहीं करेंगे। यह जानना जरूरी है कि ऐसी पुस्तक आखिर छपी कैसे?”
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अध्याय पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते हुए पुस्तक की छपी प्रतियों के प्रकाशन, बिक्री और डिजिटल साझा करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही अदालत ने फिजिकल कॉपियों को जब्त करने का आदेश भी दिया है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि किसी भी रूप में पुस्तक की सामग्री साझा करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को निर्धारित की गई है।
क्या है पूरा मामला?
NCERT ने 24 फरवरी 2026 को कक्षा 8 के लिए “Exploring Society: India and Beyond, Vol II” नामक सोशल साइंस (भाग-2) की पुस्तक जारी की थी। पुस्तक के अध्याय 4 — “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” (पृष्ठ 125-142) में कथित रूप से न्यायपालिका को भ्रष्ट व्यवस्था के रूप में दर्शाने और लंबित मामलों को लेकर विवादित टिप्पणियां शामिल थीं।
इस सामग्री पर आपत्ति जताते हुए शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने वितरण पर रोक लगाने के निर्देश दिए। NCERT ने बिक्री रोकते हुए बयान जारी किया कि यह त्रुटि अनजाने में हुई है और संस्था न्यायपालिका का पूर्ण सम्मान करती है।
सुनवाई के दौरान क्या कहा गया?
सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल (SG) ने बताया कि बाजार में उपलब्ध किताबों को वापस लिया जा चुका है। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि यह “एक सुनियोजित कदम” प्रतीत होता है, जिसमें भारतीय न्यायपालिका को भ्रष्ट बताने का प्रयास किया गया।
उन्होंने कहा, “यदि हम अभी बिना शर्त माफी स्वीकार कर लें तो भविष्य में कोई भी ऐसा कर सकता है। हम इस संस्थान की गरिमा को नुकसान नहीं पहुंचने देंगे।”
न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि डिजिटल युग में पुस्तक की हजारों प्रतियां बन चुकी होंगी और यह जानना जरूरी है कि यह कैसे संभव हुआ। उन्होंने कहा कि विवादित अंश सार्वजनिक डोमेन में हैं, जिन्हें हटाने के आदेश जारी किए जाने चाहिए।
CJI ने कहा, “इसका परिणाम मामूली नहीं है। उन्होंने गोली चलाई है—न्यायपालिका आज खून से लथपथ है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जांच तब तक जारी रहेगी जब तक जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान नहीं हो जाती।
कोर्ट का सख्त संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैधानिक प्रावधानों का प्रयोग करते हुए आवश्यक आदेश जारी किए जाएंगे। अदालत ने दोहराया कि न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है और उसकी गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता।
SG ने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार विरोधी रुख नहीं अपना रही है और जो भी जिम्मेदार पाया जाएगा, उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।
आगे क्या?
अब सबकी निगाहें 11 मार्च की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। यह मामला न केवल शिक्षा व्यवस्था बल्कि संस्थागत गरिमा और अभिव्यक्ति की सीमाओं को लेकर भी व्यापक बहस का विषय बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रकरण पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा प्रक्रिया, संपादकीय जिम्मेदारी और डिजिटल युग में सामग्री के प्रसार से जुड़े नियमों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है।














