नई दिल्ली/लखनऊ: Supreme Court of India ने लखनऊ के अकबर नगर क्षेत्र के 91 निवासियों की उस शिकायत पर महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि सितंबर 2023 में मकान गिराए जाने के बाद विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान उनके नाम उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची से हटा दिए गए।
सोमवार (23 फरवरी) को मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant और न्यायमूर्ति Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने लखनऊ के जिला निर्वाचन अधिकारी को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं की शिकायतों की जांच कर उनका समाधान करें।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सितंबर 2023 में अकबर नगर में हुए विध्वंस अभियान के बाद वे स्थायी पते से वंचित हो गए। इसी आधार पर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।
याचिका सना परवीन और 90 अन्य लोगों की ओर से दायर की गई थी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम. आर. शमशाद ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल 2002 से मतदाता सूची में दर्ज हैं और 2025 की पुनरीक्षण प्रक्रिया तक सूची का हिस्सा रहे हैं। विस्थापन के कारण उन्हें मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई में संकेत दिया कि आवास संबंधी विवादित तथ्यों की जांच रिट याचिका के माध्यम से सीधे तौर पर करना उचित नहीं है। हालांकि, अदालत ने शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए जिला निर्वाचन अधिकारी को यह निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं के पूर्व मतदाता सूची में नाम, वर्तमान स्थिति और हटाए जाने के कारणों की तथ्यात्मक जांच करें।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जिला निर्वाचन अधिकारी से राहत नहीं मिलती है, तो याचिकाकर्ता Allahabad High Court की लखनऊ पीठ का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
विध्वंस और पुनर्वास का प्रभाव
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि वे अकबर नगर के दीर्घकालिक निवासी हैं और वर्षों से मतदाता सूची में उनके नाम दर्ज रहे हैं। हालांकि, क्षेत्र में अवैध निर्माणों को ध्वस्त किए जाने—जिसे पूर्व में अदालतों ने सही ठहराया था—के बाद पुनर्वास प्रक्रिया और स्थायी पते के अभाव के चलते उन्हें SIR प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया।
उनका कहना है कि वर्तमान में पहचान योग्य पते के अभाव को ही मतदाता सूची से हटाए जाने का मुख्य आधार बनाया गया है।
आगे क्या?
अब लखनऊ के जिला निर्वाचन अधिकारी को सभी तथ्यों का सत्यापन कर उचित निर्णय लेना होगा। यह मामला न केवल अकबर नगर के निवासियों के मताधिकार से जुड़ा है, बल्कि विस्थापन और नागरिक अधिकारों के व्यापक प्रश्न को भी सामने लाता है।
इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि मताधिकार एक संवैधानिक अधिकार है और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण किसी नागरिक को उससे वंचित नहीं किया जा सकता, जब तक कि तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट न हो जाए।














