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कश्मीर में RSS का नया दांव! पर्दे के पीछे से खुले मैदान में उतरा भारतीय मजदूर संघ

“पुलवामा के बारसू गांव में BMS का पहला स्थायी कार्यालय खुला, 20 लेबर यूनियनों से जुड़ाव का दावा; अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में संघ परिवार की बढ़ती सक्रियता के बीच संगठन की नई रणनीति पर निगाहें”

श्रीनगर/पुलवामा: कश्मीर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठनों की गतिविधियों को लेकर एक बार फिर बहस तेज होने के संकेत हैं। इस बार चर्चा के केंद्र में है भारतीय मजदूर संघ (BMS), जिसने दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के बारसू गांव में अपना पहला स्थायी कार्यालय खोलने की घोषणा की है। सोमवार को उद्घाटित इस कार्यालय को केवल एक संगठनात्मक ठिकाने के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह कदम घाटी में मजदूर संगठनों के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने, स्थानीय लोगों से सीधा संपर्क बढ़ाने और अब तक अपेक्षाकृत सीमित दायरे में चल रहे कामकाज को सार्वजनिक रूप देने की रणनीति का संकेत भी देता है।

भारतीय मजदूर संघ के लिए यह बदलाव इसलिए अहम है, क्योंकि कश्मीर में संगठन की गतिविधियों का संचालन पहले श्रीनगर के शिवपोरा इलाके में किराए की जगह से किया जाता था। अब स्थायी कार्यालय के जरिए संगठन अपने काम को अधिक व्यवस्थित और दृश्यमान बनाने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। हालांकि, इस कदम से घाटी में उसकी वास्तविक पहुंच कितनी बढ़ेगी और स्थानीय मजदूरों के बीच उसका प्रभाव किस स्तर तक पहुंचेगा, इसका आकलन आने वाले समय में ही हो सकेगा।

छिपकर नहीं, खुलकर काम करने का संदेश

भारतीय मजदूर संघ के कश्मीर प्रभारी समीर कुछे ने नए कार्यालय के उद्घाटन के बाद संगठन की बदली हुई कार्यशैली को रेखांकित किया। उनके मुताबिक, कश्मीर में परिस्थितियां बदल चुकी हैं और अब संगठन पुराने, गुप्त तरीके से काम करने के बजाय लोगों के बीच खुलकर अपनी गतिविधियां चलाना चाहता है।

उनका यह बयान संगठन की प्राथमिकताओं में बदलाव का संकेत देता है। किसी क्षेत्र में संगठन की मौजूदगी होना एक बात है, लेकिन स्थायी कार्यालय खोलकर सार्वजनिक रूप से काम करना दूसरी। कार्यालय स्थानीय संपर्क, बैठकों, मजदूरों की शिकायतों और संगठनात्मक समन्वय के लिए नियमित आधार उपलब्ध करा सकता है।

समीर कुछे ने यह भी कहा कि कश्मीर में किसी संगठन का कार्यालय होने का यह पहला अनुभव है। इस बयान को संगठन के अपने अनुभव और दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि घाटी में पहले कभी किसी अन्य संगठन के कार्यालय नहीं रहे हैं। यहां संदर्भ भारतीय मजदूर संघ की अपनी गतिविधियों और उसके नए कार्यालय से जुड़ा है।

बारसू ही क्यों बना नया केंद्र?

नए डिविजनल कार्यालय के लिए पुलवामा जिले के बारसू गांव का चयन भी संगठन की कार्ययोजना का हिस्सा माना जा रहा है। समीर कुछे के अनुसार, इस स्थान से दक्षिण कश्मीर और श्रीनगर, दोनों क्षेत्रों तक पहुंचना अपेक्षाकृत सुविधाजनक है।

संगठनात्मक दृष्टि से यह चयन महत्वपूर्ण हो सकता है। स्थायी कार्यालय होने से अलग-अलग इलाकों में काम करने वाले पदाधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित करना, बैठकों का आयोजन करना और मजदूरों की समस्याओं को एक साझा मंच पर उठाना आसान हो सकता है।

दक्षिण कश्मीर में अपनी गतिविधियों को व्यवस्थित करने के साथ-साथ श्रीनगर तक संपर्क बनाए रखना BMS के लिए विस्तार का रास्ता खोल सकता है। लेकिन किसी कार्यालय का खुलना और व्यापक जनसमर्थन हासिल करना दो अलग-अलग पड़ाव हैं। संगठन को यह साबित करना होगा कि उसकी मौजूदगी केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि मजदूरों की रोजमर्रा की समस्याओं से जुड़ी हुई है।

20 लेबर यूनियनों से जुड़ाव का दावा

भारतीय मजदूर संघ का दावा है कि कश्मीर में करीब 20 लेबर यूनियन उससे जुड़ी हुई हैं। संगठन के मुताबिक, इनमें से अधिकतर यूनियन दक्षिण कश्मीर में सक्रिय हैं। नए कार्यालय को इन संगठनों के बीच तालमेल बेहतर करने और मजदूरों तथा स्थानीय लोगों के साथ संवाद मजबूत करने के उद्देश्य से खोला गया है।

यदि यह नेटवर्क सक्रिय और प्रभावी साबित होता है, तो BMS को घाटी में अपने संगठनात्मक विस्तार के लिए पहले से मौजूद आधार मिल सकता है। विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली यूनियनों को एक मंच पर लाना, उनकी समस्याओं को संकलित करना और संबंधित मुद्दों को प्रशासन के सामने उठाना किसी भी मजदूर संगठन की कार्यक्षमता बढ़ा सकता है।

हालांकि, 20 यूनियनों से जुड़ाव का दावा संगठन की ओर से किया गया है। इन यूनियनों की सदस्य संख्या, सक्रियता, क्षेत्रवार मौजूदगी और उनके जरिए प्रतिनिधित्व किए जाने वाले मजदूरों की संख्या का स्वतंत्र विवरण सामने आए बिना इस नेटवर्क की वास्तविक ताकत का निश्चित आकलन नहीं किया जा सकता।

यही वह कसौटी होगी, जिस पर BMS के नए कार्यालय की उपयोगिता को परखा जाएगा। क्या संगठन स्थानीय मजदूरों के वेतन, रोजगार, कामकाजी परिस्थितियों, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देगा? क्या वह असंगठित क्षेत्र के कामगारों तक पहुंच बनाएगा? और क्या मजदूरों की शिकायतों के समाधान के लिए नियमित व्यवस्था विकसित करेगा? इन सवालों के जवाब ही उसकी वास्तविक भूमिका तय करेंगे।

RSS परिवार की घाटी में सक्रियता का व्यापक संदर्भ

भारतीय मजदूर संघ का नया कार्यालय ऐसे समय में खुला है, जब जम्मू-कश्मीर में अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव के बाद राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक परिस्थितियों में बड़े परिवर्तन हुए हैं। इसी अवधि के बाद से RSS और उससे जुड़े संगठनों की घाटी में गतिविधियों तथा सार्वजनिक मौजूदगी को लेकर चर्चा भी होती रही है।

ऐतिहासिक रूप से RSS और उसके सहयोगी संगठनों की कश्मीर घाटी में गतिविधियां कई तरह की परिस्थितियों से प्रभावित रही हैं। 1990 के आसपास उग्रवाद बढ़ने और कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन के दौर में संगठन की गतिविधियों को भी झटका लगा था। उस समय से पहले कश्मीरी पंडित समुदाय के बीच संघ की कुछ मौजूदगी थी।

बाद के वर्षों में संघ से जुड़े विभिन्न संगठनों ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी गतिविधियां जारी रखने या उन्हें नए सिरे से विकसित करने की कोशिश की। इनमें सेवा कार्य, शैक्षिक सहयोग और सामाजिक गतिविधियां भी शामिल रही हैं। सेवा भारती जैसे संगठन की गतिविधियों को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाता है।

ऐसे परिदृश्य में BMS का स्थायी कार्यालय खोलना संघ परिवार से जुड़े संगठनों की गतिविधियों के एक अलग आयाम को सामने लाता है। यहां फोकस केवल सामाजिक या सेवा गतिविधियों तक सीमित नहीं, बल्कि मजदूर संगठनों के साथ समन्वय और श्रमिकों के बीच संगठनात्मक आधार मजबूत करने पर भी है।

हालांकि, अलग-अलग संगठनों की गतिविधियों, उद्देश्यों और कार्यक्षेत्रों को एक जैसा मानना उचित नहीं होगा। भारतीय मजदूर संघ की नई पहल का मूल्यांकन उसके अपने घोषित उद्देश्यों, वास्तविक कामकाज और स्थानीय स्तर पर उसके प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।

राजनीतिक बहस से आगे, स्थानीय स्वीकार्यता की असली परीक्षा

कश्मीर में RSS से जुड़े संगठनों की मौजूदगी को लेकर राजनीतिक मतभेद पहले भी सामने आते रहे हैं। कुछ राजनीतिक नेताओं ने क्षेत्र में संघ की गतिविधियों और विस्तार की कोशिशों की आलोचना की है। ऐसे में BMS के स्थायी कार्यालय को लेकर भी राजनीतिक और वैचारिक प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।

लेकिन इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि स्थानीय मजदूर और समुदाय इसे किस नजर से देखते हैं। किसी संगठन की रणनीति, उसका घोषित उद्देश्य और उसकी सार्वजनिक छवि महत्वपूर्ण होते हैं, मगर जमीनी स्वीकार्यता उसके काम से बनती है।

यदि BMS वास्तव में मजदूरों की समस्याओं को उठाता है, रोजगार से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाता है और श्रमिकों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने का काम करता है, तो उसका कार्यालय स्थानीय स्तर पर उपयोगी साबित हो सकता है। इसके उलट, यदि गतिविधियां केवल संगठनात्मक विस्तार और बैठकों तक सीमित रहती हैं, तो स्थायी कार्यालय खुलने का असर सीमित रह सकता है।

यहां राजनीतिक नारेबाजी के बजाय तथ्यों और परिणामों पर ध्यान देना जरूरी होगा। कार्यालय खुलना एक तथ्य है, 20 यूनियनों से जुड़ाव संगठन का दावा है और घाटी में व्यापक प्रभाव स्थापित होना अभी भविष्य की कसौटी है। इन तीनों बातों को अलग-अलग समझना ही इस घटनाक्रम की संतुलित तस्वीर पेश करता है।

आगे की राह: मौजूदगी से प्रभाव तक का सफर

बारसू में स्थायी कार्यालय खोलकर भारतीय मजदूर संघ ने कश्मीर में अपने कामकाज को अधिक औपचारिक और सार्वजनिक बनाने की दिशा में कदम उठाया है। इससे संगठन को अपने स्थानीय नेटवर्क को सक्रिय करने, पदाधिकारियों के बीच समन्वय बढ़ाने और मजदूरों के साथ नियमित संपर्क स्थापित करने में मदद मिल सकती है।

लेकिन स्थायी कार्यालय अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं है। असली चुनौती यह होगी कि संगठन अपने दावों को जमीन पर परिणामों में बदल सके। उसे यह दिखाना होगा कि वह किन श्रमिक समस्याओं पर काम कर रहा है, कितने लोगों तक पहुंच बना रहा है और उसके प्रयासों से मजदूरों को किस तरह का ठोस लाभ मिल रहा है।

कश्मीर में किसी भी संगठन के लिए स्थानीय परिस्थितियों, सामाजिक संवेदनशीलताओं और लोगों की प्राथमिकताओं को समझना जरूरी है। यहां संगठनात्मक विस्तार का मूल्यांकन केवल कार्यालयों या सदस्यता के दावों से नहीं, बल्कि जनता के साथ बने भरोसे और वास्तविक कामकाज से भी होगा।

निष्कर्ष यह है कि पुलवामा के बारसू गांव में BMS का पहला स्थायी कार्यालय खुलना संगठन के लिए एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक पड़ाव है। RSS से जुड़े इस मजदूर संगठन ने अब तक के अपने कामकाज को अधिक सार्वजनिक रूप देने का संदेश दिया है। लेकिन कश्मीर में उसकी नई रणनीति कितनी सफल होगी, यह इस बात से तय होगा कि कार्यालय से निकलने वाली गतिविधियां स्थानीय मजदूरों की जरूरतों से कितना जुड़ती हैं और संगठन अपने घोषित उद्देश्यों को कितनी प्रभावी ढंग से पूरा करता है।

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VIKAS TRIPATHI
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