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इजराइल में कैसे चुना जाता है प्रधानमंत्री? भारत से कितना अलग है चुनावी सिस्टम, समझिए पूरा गणित

नई दिल्ली। इजराइल में प्रधानमंत्री का चुनाव भारत की तरह सीधे जनता के वोट से नहीं होता। यहां मतदाता किसी प्रधानमंत्री उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं। इसके बाद संसद में सीटों के समीकरण और गठबंधन की ताकत तय करती है कि देश की सत्ता किसके हाथ में जाएगी। यही वजह है कि इजराइल में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद सरकार बनना तय नहीं होता।

120 सीटों वाली संसद, बहुमत के लिए 61 का आंकड़ा

इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। चुनाव में पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर सीटें बांटी जाती हैं। हालांकि, संसद में प्रवेश के लिए किसी पार्टी को कुल वैध वोटों का कम से कम 3.25 प्रतिशत हासिल करना होता है।

इस व्यवस्था में कई राजनीतिक दल संसद तक पहुंच सकते हैं। लेकिन किसी एक पार्टी के लिए अपने दम पर बहुमत हासिल करना मुश्किल रहता है। इसलिए सरकार बनाने के लिए अलग-अलग दलों के बीच गठबंधन करना अहम हो जाता है।

कैसे तय होता है प्रधानमंत्री का नाम?

चुनाव के नतीजे आने के बाद राजनीतिक दल बहुमत जुटाने की कोशिश करते हैं। जिस नेता के नेतृत्व में 61 सांसदों का समर्थन हासिल हो जाता है, उसके लिए सरकार बनाने का रास्ता खुलता है। गठबंधन बनाने की प्रक्रिया में कई बार छोटे दल भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

यदि तय समय में कोई नेता बहुमत का समर्थन नहीं जुटा पाता, तो राजनीतिक संकट पैदा हो सकता है और नए चुनाव की नौबत आ सकती है। ऐसी स्थिति में नई सरकार बनने तक मौजूदा प्रधानमंत्री कार्यवाहक रूप में जिम्मेदारी संभालते हैं।

क्या है बेडर-ऑफर कानून?

इजराइल में पार्टियों को मिलने वाली सीटों का बंटवारा बेडर-ऑफर कानून के तहत होता है। इसमें पहले उन पार्टियों के वोटों को गिना जाता है जो 3.25 प्रतिशत की न्यूनतम सीमा पार करती हैं। इसके बाद वोटों के अनुपात के आधार पर सीटों का आवंटन किया जाता है।

पहले चरण में पार्टियों को पूरी सीटें मिलती हैं। बची हुई सीटों के लिए एक तय गणना पद्धति अपनाई जाती है, जिसमें पार्टियों के वोट और उनकी मौजूदा सीटों के आधार पर तुलना होती है। इस तरह कुल 120 सीटों का बंटवारा पूरा किया जाता है।

भारत और इजराइल के चुनाव में सबसे बड़ा अंतर

भारत में लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्र से उम्मीदवार चुनते हैं। जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वह सीट जीत जाता है। इसे फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली कहा जाता है। इसके विपरीत, इजराइल में मतदाता राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं और सीटें मुख्य रूप से वोटों के अनुपात में बांटी जाती हैं।

भारत में किसी पार्टी को कुल वोटों का बहुमत मिले बिना भी लोकसभा में बहुमत मिल सकता है। इजराइल में वोटों के अनुपात में सीटें मिलने के कारण छोटी पार्टियों को भी संसद में प्रतिनिधित्व का अवसर मिलता है। हालांकि, इससे गठबंधन सरकार बनाना और उसे स्थिर बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

नेतन्याहू के सामने क्या है चुनौती?

इजराइल की राजनीति में बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से एक प्रमुख चेहरा रहे हैं। लेकिन किसी भी चुनाव में सत्ता का भविष्य केवल सबसे बड़ी पार्टी बनने से तय नहीं होता। चुनाव के बाद गठबंधन सहयोगियों का समर्थन, साझा नीतियां और 61 सीटों का आंकड़ा सबसे महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

इसलिए इजराइल के चुनाव में असली परीक्षा केवल मतदान के दिन नहीं, बल्कि नतीजों के बाद शुरू होती है। यह देखना अहम होता है कि कौन-सा राजनीतिक गठबंधन बहुमत जुटाने में सफल रहता है और कौन-सा नेता सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचता है।

इजराइल का चुनावी मॉडल राजनीतिक दलों को उनके वोटों के अनुपात में प्रतिनिधित्व देता है, जबकि भारत में उम्मीदवार अपने निर्वाचन क्षेत्र में सबसे अधिक वोट पाकर जीतते हैं। दोनों प्रणालियों के अपने फायदे और चुनौतियां हैं। इजराइल में गठबंधन की राजनीति सत्ता का निर्णायक आधार है, जबकि भारत में चुनाव क्षेत्रवार जीत और संसद में कुल सीटों के आधार पर सरकार तय होती है।

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