“अरुणाचल में सियांग परियोजना के बहाने विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और कॉरपोरेट हितों का नया सियासी समीकरण; सवाल यह है कि बांध से बिजली निकलेगी या आदिवासियों की जमीन, संस्कृति और लोकतांत्रिक आवाज भी पानी में समा जाएगी?”
अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में इन दिनों सिर्फ नदी का पानी नहीं, बल्कि राजनीति, विकास और जनता के अधिकारों का टकराव भी उफान पर है। एक तरफ सरकार 11,200 मेगावाट की विशाल जलविद्युत परियोजना को राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और चीन की चुनौती का जवाब बताकर पेश कर रही है, तो दूसरी तरफ स्थानीय आदिवासी समुदाय अपनी जमीन, जंगल, खेत, संस्कृति और अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। सत्ता के गलियारों में इस परियोजना को भविष्य की ऊर्जा क्रांति का प्रतीक बताया जा रहा है, लेकिन घाटी के गांवों में लोगों के सामने भविष्य का सवाल कुछ और है—अगर हमारी जमीन ही नहीं बचेगी, तो इस विकास का लाभ किसे मिलेगा?
सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (एसयूएमपी) कोई छोटी-मोटी बिजली परियोजना नहीं है। लगभग 250 मीटर ऊंचे प्रस्तावित बांध और करीब 9.2 अरब घन मीटर जल भंडारण क्षमता वाली इस परियोजना को देश की सबसे बड़ी जलविद्युत योजनाओं में शामिल किया जा रहा है। अनुमान है कि इसके कारण 27 गांव जलमग्न हो सकते हैं और करीब 1.5 लाख लोगों के विस्थापन की आशंका है। नदी के किनारे फैले उपजाऊ धान के खेत, पुश्तैनी जमीन और सदियों से विकसित आदिवासी जीवन पद्धति पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
लेकिन सत्ता के लिए विकास का गणित अक्सर जमीन पर रहने वाले लोगों के गणित से अलग होता है। सरकारी फाइलों में हजारों मेगावाट बिजली, निवेश, राजस्व और रणनीतिक महत्व के आंकड़े चमकते हैं। वहीं गांवों में लोग यह हिसाब लगा रहे हैं कि अगर खेत डूब गए, घर उजड़ गए और नदी से उनका रिश्ता टूट गया, तो मुआवजे की रकम से उनकी पीढ़ियों का इतिहास कैसे खरीदा जाएगा?
सहमति का रास्ता बंद, समिति का दरवाजा खुला
इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प पहलू सरकार का राजनीतिक रवैया है। स्थानीय समुदाय लंबे समय से परियोजना के पूर्व-व्यवहार्यता सर्वेक्षण, ड्रिलिंग और उससे जुड़ी गतिविधियों पर सवाल उठा रहे हैं। उनकी मांग सीधी है—पहले पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए, संभावित नुकसान का निष्पक्ष आकलन हो, प्रभावित लोगों की वास्तविक सहमति ली जाए और पुनर्वास की ठोस योजना सामने रखी जाए।
लेकिन लोकतंत्र में जनता सवाल पूछे तो उसका जवाब देना जितना जरूरी होता है, सत्ता के लिए उतना ही असुविधाजनक भी हो सकता है। 23 सितंबर 2026 को अरुणाचल प्रदेश मंत्रिमंडल ने परियोजना से जुड़े सर्वेक्षण और गतिविधियों के मार्गदर्शन तथा समन्वय के लिए एक अधिकार प्राप्त उच्चस्तरीय समिति के गठन को मंजूरी दे दी। समिति बन गई, लेकिन जनता के सवालों का समाधान अब भी अधूरा है।
यहीं से राजनीति की असली पटकथा शुरू होती दिखाई देती है। आरोप हैं कि गांवों में परियोजना समर्थक माहौल बनाने के लिए ग्राम प्रधानों, पंचायत प्रतिनिधियों और सरकारी अधिकारियों को सक्रिय किया जा रहा है। दूसरी ओर विरोध करने वालों को राष्ट्रविरोधी, समाजविरोधी और विकासविरोधी बताने की कोशिशों के आरोप सामने आ रहे हैं।
यह एक सुविधाजनक राजनीतिक फार्मूला है। पहले किसी परियोजना को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ दीजिए, फिर उसके विरोध को राष्ट्रहित के खिलाफ बताना आसान हो जाता है। सवाल उठाने वाला नागरिक अचानक विकास का विरोधी घोषित कर दिया जाता है। लेकिन लोकतंत्र में सरकार की हर योजना का समर्थन करना नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य नहीं है। सरकार को सवालों का जवाब देना पड़ता है, न कि सवाल पूछने वालों की देशभक्ति का प्रमाणपत्र मांगना चाहिए।
बांध से पहले भरोसे की नींव क्यों नहीं?
रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना के विरोध को देखते हुए तीनों जिलों में अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है। 23 अक्टूबर की रात पासीघाट में तनाव ने हिंसक रूप ले लिया। कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा राजनीतिक नेताओं के आवासों में तोड़फोड़ और कथित तौर पर पुलिस थाने, एनएचपीसी कार्यालय तथा पुलिस वाहनों को आग लगाने की घटनाएं सामने आईं।
हिंसा किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन का समाधान नहीं हो सकती। सार्वजनिक संपत्ति और लोगों की सुरक्षा से खिलवाड़ स्वीकार्य नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि हिंसा की घटनाओं को आधार बनाकर पूरे जनआंदोलन की मूल मांगों को खारिज न कर दिया जाए। असली सवाल यह है कि आखिर एक ऐसी परियोजना के खिलाफ लोगों का अविश्वास इतना गहरा क्यों हुआ, जिसे सरकार उनके भविष्य के लिए लाभकारी बता रही है?
सरकार को यह समझना होगा कि सुरक्षा बलों की मौजूदगी से किसी परियोजना को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती। बंदूक के साये में सर्वेक्षण कराया जा सकता है, लेकिन भरोसा पैदा नहीं किया जा सकता। किसी गांव के लोगों को चुप कराया जा सकता है, मगर उनकी जमीन और पहचान को लेकर उठे सवालों को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।
सुबनसिरी और दिबांग: विकास के पुराने प्रयोग, नए सवाल
सियांग परियोजना की कहानी को समझने के लिए पूर्वोत्तर की पिछली बड़ी जलविद्युत योजनाओं का इतिहास देखना जरूरी है। सुबनसिरी नदी पर बड़े बांध की कल्पना 1950 के दशक में सामने आई थी। 1982 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड ने इस दिशा में परियोजना योजना तैयार की। बाद में इसे छह छोटी परियोजनाओं में बांटने का प्रस्ताव भी आया। वर्ष 2000 में इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी एनएचपीसी को सौंप दी गई।
इसके बाद दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना सामने आई। 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसकी आधारशिला रखी। जुलाई 2019 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी मिलने के बाद 9 मार्च 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके निर्माण की औपचारिक शुरुआत की।
लेकिन इन परियोजनाओं के साथ विरोध और पर्यावरणीय चिंताएं भी लगातार चलती रहीं। निचली सुबनसिरी परियोजना को लेकर लंबे समय तक आंदोलन हुए। बाढ़, नदी के कटाव, भूकंपीय जोखिम, जैव विविधता के नुकसान और स्थानीय आजीविका पर प्रभाव जैसे मुद्दे उठाए गए। परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकार्यता और उसके निचले इलाकों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सवाल बने रहे।
रंगनाडी जलविद्युत परियोजना से जुड़ी बार-बार की समस्याओं ने भी स्थानीय लोगों की आशंकाओं को मजबूत किया। जब अपेक्षाकृत छोटी परियोजना के अनुभव भरोसा नहीं जगा पाए, तो उससे कहीं विशाल बांध के प्रति लोगों से आंख मूंदकर विश्वास करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
कॉरपोरेट हितों का गणित और विकास की चमकदार पैकेजिंग
अरुणाचल प्रदेश में जलविद्युत विकास लंबे समय से एक बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में देखा जाता रहा है। नवंबर 2005 में राज्य सरकार ने 57,000 मेगावाट बिजली उत्पादन के लक्ष्य वाली जलविद्युत नीति घोषित की। इसके बाद सार्वजनिक और निजी कंपनियों के साथ कई समझौता ज्ञापन किए गए।
आरोप रहे हैं कि कुछ निजी कंपनियों के पास जलविद्युत परियोजनाओं के विकास का पर्याप्त अनुभव नहीं था, इसके बावजूद अग्रिम भुगतान के आधार पर उन्हें परियोजनाएं आवंटित की गईं। ऐसे मामलों ने परियोजना आवंटन की पारदर्शिता, सरकारी जवाबदेही और पर्यावरणीय हितों से ऊपर व्यावसायिक लाभ को प्राथमिकता देने के सवाल खड़े किए हैं।
बांध विरोधी आंदोलनों को कमजोर करने के लिए कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व यानी सीएसआर के तहत स्थानीय स्तर पर कई गतिविधियां भी चलाई गईं। सुअर पालन, रेशम कीट पालन, हथकरघा, सड़क निर्माण, ग्रामीण विद्युतीकरण और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देने जैसी पहलें की गईं।
इन योजनाओं में अपने आप में कुछ गलत नहीं है। ग्रामीण विकास और रोजगार का विस्तार जरूरी है। लेकिन सवाल तब उठता है जब विकास की छोटी-छोटी सुविधाओं को एक विशाल परियोजना की सामाजिक स्वीकृति हासिल करने का माध्यम बना दिया जाए। सड़क बनाना अच्छी बात है, लेकिन क्या सड़क के बदले पुश्तैनी जमीन छोड़ देना भी विकास का सौदा माना जाएगा? रोजगार देना जरूरी है, लेकिन क्या रोजगार के नाम पर लोगों से उनकी सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक संसाधनों पर पारंपरिक अधिकार छोड़ने की उम्मीद की जा सकती है?
विकास का अर्थ केवल इतना नहीं कि किसी इलाके में बिजली उत्पादन हो और बाहर की अर्थव्यवस्था को उसका लाभ मिले। विकास का असली अर्थ यह भी है कि जिस समाज की जमीन और संसाधनों का इस्तेमाल हो रहा है, उसकी जिंदगी पहले से बेहतर हो।
चीन का डर: राष्ट्रीय सुरक्षा या घरेलू सवालों से बचने का आसान रास्ता?
सियांग परियोजना के समर्थन में चीन के तिब्बत क्षेत्र में मेडोग बांध परियोजना का तर्क भी प्रमुखता से सामने रखा जा रहा है। सरकार के नजरिये से सीमा के निकट नदी पर चीन की विशाल परियोजना भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय हो सकती है। इस तर्क को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल उठाने भर से स्थानीय नागरिकों के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। चीन के बांध का जवाब क्या अपने ही नागरिकों के घर और खेत डुबोकर दिया जाएगा? क्या रणनीतिक जरूरतों के नाम पर स्थानीय समुदायों की सहमति, पर्यावरणीय सुरक्षा और पुनर्वास की जिम्मेदारी गौण हो सकती है?
यहां एक और विरोधाभास दिखाई देता है। सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर परियोजना को जरूरी बताती है, जबकि स्थानीय लोगों के सामने उनकी अपनी सुरक्षा का सवाल खड़ा है—भूकंप की आशंका, बांध की सुरक्षा, नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव, विस्थापन और भविष्य की आजीविका।
देश की सीमाओं की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन देश के भीतर रहने वाले नागरिकों की जमीन, सम्मान और अधिकार भी राष्ट्रीय हित का ही हिस्सा हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय अधिकारों को एक-दूसरे का दुश्मन बनाकर पेश करना समस्या का समाधान नहीं है।
208 परियोजनाओं का मास्टर प्लान और 6.43 लाख करोड़ का सवाल
अक्टूबर 2025 में जारी ब्रह्मपुत्र बेसिन की जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली निकासी की मास्टर योजना इस पूरे विवाद को और व्यापक बना देती है। इसमें 12 उप-बेसिनों में 208 बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं की रूपरेखा शामिल है। इनकी संभावित स्थापित क्षमता 64.9 गीगावाट बताई गई है। इसके अतिरिक्त पंप्ड स्टोरेज परियोजनाओं से 11.1 गीगावाट क्षमता जोड़ने की योजना है।
कुल मिलाकर 76 गीगावाट तक बिजली के प्रसारण के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने का प्रस्ताव है, जिस पर अनुमानित निवेश करीब 6.43 लाख करोड़ रुपये का है।
आंकड़े निश्चित रूप से बड़े हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस पूरी योजना में नदी किनारे रहने वाले समुदायों की भूमिका क्या है? क्या वे सिर्फ संसाधन उपलब्ध कराने वाले लोग हैं, या निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी उनका बराबर का अधिकार है?
ब्रह्मपुत्र घाटी भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है। यहां किसी भी विशाल बांध परियोजना का मूल्यांकन केवल बिजली उत्पादन की क्षमता के आधार पर नहीं हो सकता। पर्यावरणीय प्रभाव, सामाजिक लागत, आपदा प्रबंधन, निचले इलाकों की सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को भी उतना ही महत्व देना होगा।
असली लड़ाई बांध की नहीं, विकास की परिभाषा की है
सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट की योजना 2013 में दो अलग-अलग परियोजनाओं के रूप में बनाई गई थी। सियांग अपर चरण-1 की क्षमता 6,000 मेगावाट और चरण-2 की क्षमता 3,750 मेगावाट प्रस्तावित थी। 26 सितंबर 2017 को मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाले राज्य प्रतिनिधिमंडल और नीति आयोग के बीच बातचीत के बाद योजना में बदलाव किया गया। इसके बाद एक ही 250 मीटर ऊंचे बांध के जरिए 11,200 मेगावाट उत्पादन की परिकल्पना सामने आई।
सरकारी गणित में एक विशाल बांध से लागत कम और उत्पादन अधिक हो सकता है। लेकिन घाटी के निवासियों के लिए इसका मतलब संभावित रूप से एक बहुत बड़ा सामाजिक और पारिस्थितिक बदलाव है।
यही कारण है कि इस आंदोलन को केवल बांध विरोधी आंदोलन कहना इसकी वास्तविक प्रकृति को छोटा कर देना होगा। यह अपनी पुश्तैनी जमीन पर अधिकार, पारंपरिक जीवन पद्धति, सांस्कृतिक पहचान और विकास के नाम पर लिए जाने वाले फैसलों में भागीदारी का आंदोलन है।
सरकार को यह भी याद रखना चाहिए कि विकास का कोई भी मॉडल जनता के भरोसे के बिना टिकाऊ नहीं हो सकता। यदि परियोजना इतनी ही जरूरी और लाभकारी है, तो उसके समर्थकों को खुले मंच पर उसके लाभ और नुकसान दोनों का हिसाब रखने में परेशानी क्यों होनी चाहिए? यदि पर्यावरणीय सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं, तो सभी अध्ययन सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते? यदि विस्थापन की आशंका है, तो प्रभावित परिवारों के लिए स्पष्ट और कानूनी रूप से बाध्यकारी पुनर्वास योजना पहले क्यों नहीं रखी जाती?
सरकार के सामने अब भी एक रास्ता खुला है
पूर्वोत्तर में जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए नॉर्थ ईस्ट वॉटर मैनेजमेंट अथॉरिटी (न्यूमा) का विचार भी लंबे समय से सामने आता रहा है। 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस तरह के एकीकृत संस्थागत तंत्र की अवधारणा प्रस्तुत की थी। 2022 में इससे संबंधित विधेयक संसद में सूचीबद्ध हुआ, लेकिन उसे पेश नहीं किया जा सका। 2020 में संसदीय स्थायी समिति और 2023 में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री ने भी ऐसे संस्थागत ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया था।
ऐसी व्यवस्था पूर्वोत्तर की नदियों के प्रबंधन, अंतरराज्यीय समन्वय, परियोजनाओं के मूल्यांकन और पर्यावरणीय जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
आज जरूरत है कि केंद्र और अरुणाचल प्रदेश सरकार सियांग परियोजना पर जल्दबाजी में आगे बढ़ने के बजाय व्यापक सामाजिक, पर्यावरणीय और भूकंपीय प्रभावों का स्वतंत्र आकलन कराएं। सभी रिपोर्टें सार्वजनिक हों। प्रभावित गांवों के लोगों से वास्तविक और स्वतंत्र संवाद हो। पुनर्वास, मुआवजे और आजीविका की गारंटी केवल भाषणों में नहीं, बल्कि स्पष्ट कानूनी प्रावधानों में हो।
आखिर विकास का मतलब यह नहीं हो सकता कि कुछ लोगों के लिए बिजली पैदा करने के नाम पर दूसरे लोगों का पूरा संसार ही अंधेरे में धकेल दिया जाए।
सियांग की लड़ाई सरकार और जनता के बीच किसी प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं बननी चाहिए। यह लोकतंत्र की परीक्षा है—क्या सरकार जनता की सहमति से विकास करना चाहती है या विकास के नाम पर जनता से सहमति हासिल करने का दबाव बनाना चाहती है?
बांध बनेंगे तो बिजली पैदा होगी, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन अगर उसके साथ गांव, खेत, जंगल, संस्कृति और लोगों का भरोसा भी डूब गया, तो उस बिजली की चमक विकास की नहीं, एक बड़े राजनीतिक विरोधाभास की गवाही देगी।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सियांग पर बांध बनेगा या नहीं। असली सवाल यह है कि विकास की इस विशाल इमारत की नींव में आखिर किसकी जमीन, किसका भविष्य और किसकी आवाज दबाई जाएगी?
और इस सवाल का जवाब किसी सरकारी समिति की बंद फाइल में नहीं, सियांग घाटी के उन लोगों के बीच मिलना चाहिए, जिनकी जिंदगी पर इस परियोजना का सबसे गहरा असर पड़ने वाला है।















