लंदन के Embankment स्टेशन पर साल 2007 से एक अजीब सिलसिला शुरू हुआ।
हर रोज़ एक महिला स्टेशन आती। प्लेटफॉर्म पर बैठती, कुछ देर ट्रेनों को देखती, एक खास अनाउंसमेंट सुनती और फिर चुपचाप वापस लौट जाती।
न उसे कहीं जाना होता था, न किसी ट्रेन में सफर करना होता था।
वह आती थी तो सिर्फ एक आवाज़ सुनने के लिए…
लोगों के लिए वह महज़ एक सामान्य रेलवे अनाउंसमेंट थी, लेकिन उस महिला के लिए उस आवाज़ की कीमत पूरी दुनिया से बढ़कर थी।
उस आवाज़ में उसका बीता हुआ कल था, उसकी मोहब्बत थी और उसकी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा था।
उस महिला का नाम था मार्गरेट मैक्कलम (Margaret McCollum)। वह पेशे से डॉक्टर थीं। उनके पति ऑसवॉल्ड लॉरेंस (Oswald Laurence) की 2007 में मृत्यु हो गई थी।
उनके पति की आवाज़ में ही Embankment स्टेशन पर यह अनाउंसमेंट रिकॉर्ड की गई थी—
“Mind the gap.”
यानी प्लेटफॉर्म और ट्रेन के बीच की दूरी का ध्यान रखें।
पति के जाने के बाद मार्गरेट के पास उनकी यादों के अलावा कुछ नहीं बचा था। लेकिन उस स्टेशन पर एक चीज़ अब भी मौजूद थी, जो उन्हें ऐसा महसूस कराती थी जैसे उनके पति कहीं गए नहीं हैं।
वह रोज़ स्टेशन आतीं, प्लेटफॉर्म पर बैठतीं और अपने पति की आवाज़ सुनतीं।
ज़रा सोचिए…
जब पूरी दुनिया के लिए वह आवाज़ सिर्फ एक अनाउंसमेंट थी, तब मार्गरेट के लिए वही आवाज़ उनके पति की मौजूदगी थी।
वह आवाज़ सुनकर शायद कुछ पलों के लिए उन्हें लगता होगा कि सब कुछ पहले जैसा है। जैसे उनके पति अभी भी उनके आसपास हैं। जैसे जिंदगी ने उनसे सब कुछ नहीं छीना है।
फिर आया नवंबर 2012…
एक दिन मार्गरेट हमेशा की तरह स्टेशन पहुँचीं, लेकिन उस दिन कुछ अलग था। स्टेशन पर नई डिजिटल अनाउंसमेंट प्रणाली लगा दी गई थी।
अब वहाँ उनके पति की आवाज़ नहीं गूँजती थी।
वह आवाज़, जिसे सुनने के लिए वह पाँच साल से रोज़ स्टेशन आती थीं, अचानक हमेशा के लिए खामोश हो चुकी थी।
मार्गरेट ने स्टेशन के अधिकारियों से संपर्क किया और अपनी पूरी कहानी बताई। उन्होंने अपने पति की उस रिकॉर्डिंग की एक कॉपी माँगी।
जब स्टेशन के डायरेक्टर निगेल होलनेस (Nigel Holness) को इस कहानी के बारे में पता चला, तो उन्होंने मार्गरेट की भावनाओं को समझा।
काफी कोशिशों के बाद उन्हें उनके पति की रिकॉर्डिंग की एक कॉपी दिलवाई गई।
इतना ही नहीं, उनके पति की आवाज़ को Embankment स्टेशन पर दोबारा चलाने की व्यवस्था भी की गई।
ताकि मार्गरेट जब चाहें, वहाँ आकर अपने पति की आवाज़ सुन सकें।
कहते हैं, वह आवाज़ आज भी उस स्टेशन की यादों का हिस्सा है।
लेकिन इस कहानी में सबसे ज्यादा रुलाने वाली बात यह नहीं है कि एक महिला पाँच साल तक अपने पति की आवाज़ सुनने स्टेशन आती रही।
सबसे ज्यादा रुलाने वाली बात तो यह है कि…
जिस आवाज़ को सुनने के लिए वह रोज़ अपना घर छोड़कर स्टेशन जाती थी, कभी वही आवाज़ उसके घर में हर रोज़ गूँजती होगी।
कभी शायद सुबह उठते ही पति की आवाज़ सुनाई देती होगी। कभी किसी बात पर हँसी-मज़ाक होता होगा। कभी छोटी-छोटी बातों पर नोकझोंक भी होती होगी।
तब शायद उसने कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन ऐसा आएगा, जब उसी आवाज़ को सुनने के लिए उसे अपना घर छोड़कर रेलवे स्टेशन आना पड़ेगा।
हम सबकी ज़िंदगी में भी कोई न कोई ऐसी आवाज़ है।
माँ की आवाज़, जो बार-बार खाना खाने के लिए बुलाती है।
पिता की आवाज़, जो हर बात पर समझाते हैं।
जीवनसाथी की आवाज़, जिसकी रोज़ की बातें कभी-कभी हमें शोर लगने लगती हैं।
किसी अपने की आवाज़, जिसे सुनने का मन न होने पर हम कह देते हैं—अभी नहीं, बाद में बात करेंगे।
लेकिन हमें यह एहसास नहीं होता कि जिन आवाज़ों से आज कभी-कभी हम परेशान हो जाते हैं, कल उन्हीं आवाज़ों को सुनने के लिए हमारी रूह तरस सकती है।
ज़िंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जब अपने पास होते हैं, तो उनकी बातें आम लगती हैं… और जब वे चले जाते हैं, तो उनकी खामोशी उम्र भर सताती है।
इसलिए अगर आपके माँ-बाप ज़िंदा हैं, तो आज उनके पास बैठिए। अगर आपका कोई अपना आपका इंतज़ार करता है, तो उसके साथ कुछ वक्त बिताइए। अगर किसी अपने की आवाज़ सुन सकते हैं, तो सुन लीजिए।
क्योंकि हर बिछड़ने वाले की आवाज़ लौटकर नहीं आती।
और अंत में बस दिलीप साहब की याद दिलाती ये पंक्तियाँ—
“वक्त रहते जो आवाज़ शोर लगती है,
वक्त गुजर जाने के बाद वही आवाज़ सुकून बन जाती है।”
कभी-कभी इंसान को किसी की अहमियत तब समझ आती है, जब उसे पुकारने वाला हमेशा के लिए खामोश हो चुका होता है।
इसलिए अपनों को वक्त दीजिए… क्योंकि तस्वीरें यादें संभाल सकती हैं, रिकॉर्डिंग आवाज़ बचा सकती है, लेकिन बीता हुआ वक्त और इंसान कभी वापस नहीं ला सकतीं। 💔















