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इजराइल की सत्ता का नया समीकरण: क्या अरब पार्टियां बनेंगी नेतन्याहू की विदाई की वजह? 19 सीटों ने बढ़ाई सियासी हलचल

यरुशलम: इजराइल की राजनीति में एक बार फिर अरब पार्टियों की भूमिका चर्चा के केंद्र में आ गई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता को चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों को समर्थन की जरूरत है। ऐसे में संसद की 19 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली अरब पार्टियां सरकार गठन के समीकरण में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, इन पार्टियों का समर्थन हासिल करना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा।

इजराइल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें हासिल हुई हैं। वहीं, अरब पार्टियों के खाते में 19 सीटें आई हैं। ऐसे में सरकार गठन के लिए अरब दलों का रुख बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।

पहले भी यहूदी नेतृत्व वाली सरकारों का समर्थन कर चुकी हैं अरब पार्टियां

इजराइल की राजनीति में अरब पार्टियों का यह रुख नया नहीं है। इतिहास में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जब उन्होंने यहूदी नेतृत्व वाली सरकारों को समर्थन देकर सत्ता का समीकरण बदलने में अहम भूमिका निभाई।

साल 1992 से 1995 के बीच प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन की सरकार को हदाश और मदा जैसी अरब पार्टियों ने संसद में बाहर से समर्थन दिया था। ये दल सरकार का हिस्सा नहीं बने थे, लेकिन इनके समर्थन ने राबिन सरकार को महत्वपूर्ण विधायी फैसले लेने में मदद की। इसी दौर में इजराइल और फलस्तीन के बीच ऐतिहासिक ओस्लो समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

2021 में पहली बार सरकार का हिस्सा बनी अरब पार्टी

जून 2021 में इजराइल की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला। मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली राअम (यूनाइटेड अरब लिस्ट) स्वतंत्र अरब पार्टी के रूप में पहली बार सरकार में शामिल हुई।

राअम ने आठ दलों के गठबंधन को समर्थन दिया था। इस गठबंधन में दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथी यहूदी पार्टियां शामिल थीं। इसका प्रमुख उद्देश्य बेंजामिन नेतन्याहू के लंबे राजनीतिक शासन को समाप्त करना था।

इसके बाद नफ्ताली बेनेट प्रधानमंत्री बने और बाद में यायर लैपिड ने प्रधानमंत्री पद संभाला।

मंसूर अब्बास ने उस समय अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि अरब पार्टियों को हमेशा विपक्ष में बैठने के बजाय सत्ता में भागीदारी की कोशिश करनी चाहिए। उनका मानना था कि सरकार में शामिल होकर अरब समुदायों के लिए अधिक बजट, बेहतर शिक्षा, सड़कें, बुनियादी सुविधाएं और अपराध नियंत्रण जैसे मुद्दों पर ठोस काम कराया जा सकता है।

2026 में अरब पार्टियों के सामने क्या हैं विकल्प?

मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में अरब पार्टियों के सामने दो रास्ते हैं। पहला, विपक्षी गठबंधन में शामिल होकर सरकार का हिस्सा बनना और दूसरा, सरकार में शामिल हुए बिना बाहर से समर्थन देना।

राअम प्रमुख मंसूर अब्बास ने संकेत दिया है कि उनकी पार्टी आइजेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने के लिए तैयार है। दूसरी ओर, जॉइंट लिस्ट के नेता यूसुफ जबरीन ने बाहर से अल्पमत सरकार को समर्थन देने की संभावना जताई है। हालांकि, उनकी पार्टी सरकार में शामिल होने के पक्ष में नहीं है।

अरब दलों की प्राथमिकताओं में अरब बहुल इलाकों में बढ़ते अपराध पर नियंत्रण, सुरक्षा व्यवस्था में सुधार, शिक्षा, विकास और नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

विपक्ष के लिए समर्थन हासिल करना आसान नहीं

अरब पार्टियों के समर्थन की संभावनाओं के बावजूद इजराइल की राजनीति में इस मुद्दे पर मतभेद साफ दिखाई दे रहे हैं।

गादी आइजेनकोट पहले ही अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने की संभावना को खारिज कर चुके हैं। नेतन्याहू, नफ्ताली बेनेट और एविगडोर लिबरमैन भी अरब दलों के साथ सरकार बनाने को लेकर अनिच्छुक रहे हैं।

इसके विपरीत, सेंट्रिस्ट नेता यायर गोलान ने अरब नागरिकों के साथ मिलकर सरकार बनाने का समर्थन किया है।

इस बीच, व्हाइट हाउस भी नेतन्याहू और आइजेनकोट के बीच राजनीतिक समझौते की संभावनाएं तलाश रहा है।

क्या नेतन्याहू की सत्ता का समीकरण बदल पाएंगी अरब पार्टियां?

मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि किसी भी गठबंधन के लिए 61 सीटों का बहुमत हासिल करना आसान नहीं है। अरब पार्टियों की 19 सीटें इस राजनीतिक गणित को बदलने की क्षमता रखती हैं। लेकिन केवल सीटों की संख्या से सरकार बनना तय नहीं होगा। इसके लिए वैचारिक मतभेदों को दूर करना और साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमति बनाना भी जरूरी होगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अरब पार्टियां अपने समुदाय के विकास और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देते हुए यहूदी नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन का साथ देंगी या फिर सरकार से बाहर रहकर समर्थन देने का विकल्प चुनेंगी?

फिलहाल इजराइल की राजनीति में अरब दलों का रुख सत्ता गठन की सबसे महत्वपूर्ण पहेलियों में से एक बना हुआ है। आने वाले दिनों में उनके फैसले से न केवल नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति प्रभावित हो सकती है, बल्कि इजराइल की भविष्य की सरकार की दिशा भी तय हो सकती है।

फिलहाल इजराइल की राजनीति में अरब दलों का रुख सत्ता गठन की सबसे महत्वपूर्ण पहेलियों में से एक बना हुआ है। आने वाले दिनों में उनके फैसले से न केवल नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति प्रभावित हो सकती है, बल्कि इजराइल की भविष्य की सरकार की दिशा भी तय हो सकती है।

 

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