नई दिल्ली | ऊषा माहना “पर्दाफाश न्यूज”
“मुकेश जैन की शिकायत से गरमाया मामला, हिंदू संगठनों ने उठाए दिल्ली पुलिस की लाइसेंस नीति पर सवाल; सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और विस्फोटक नियमों को लेकर छिड़ी नई बहस”
दिल्ली में दिवाली के पटाखों को लेकर एक बार फिर सियासी और कानूनी आतिशबाजी शुरू हो गई है। इस बार मामला केवल पटाखों के धुएं, प्रदूषण और पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि अदालत के आदेशों, सरकारी विभागों की जवाबदेही, पटाखा कारोबारियों के भविष्य और धार्मिक अधिकारों की बहस तक पहुंच गया है। हिंदू संगठनों ने पटाखों के लाइसेंस जारी नहीं किए जाने पर दिल्ली पुलिस को घेरते हुए लोकपाल का दरवाजा खटखटाया है। इतना ही नहीं, संगठन अब न्यायपालिका के दरवाजे तक अपनी बात पहुंचाने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि वे संबंधित न्यायाधीशों से मिलकर पटाखों के लाइसेंस जारी करने का अनुरोध करेंगे।
अखिल भारत हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुन्ना कुमार शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित हिंदू संगठनों की बैठक में दिल्ली में पटाखा विक्रेताओं को लाइसेंस जारी नहीं किए जाने पर गहरी नाराजगी जाहिर की गई। बैठक में धर्म रक्षक श्री दारा सेना सहित विभिन्न हिंदू संगठनों के प्रतिनिधियों ने सवाल उठाया कि जब विस्फोटक नियम, 2008 में लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया का प्रावधान मौजूद है, तो फिर पटाखा कारोबारियों को लाइसेंस देने में देरी क्यों हो रही है?
बैठक में उठे सवालों का केंद्र दिल्ली पुलिस की वह दलील रही, जिसमें कथित तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का हवाला देकर लाइसेंस जारी नहीं किए जाने की बात कही जा रही है। हिंदू संगठनों का तर्क है कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया को प्रशासन अपनी सुविधा के अनुसार रोक नहीं सकता। उनके मुताबिक, यदि किसी न्यायिक आदेश के कारण लाइसेंस प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, तो उसकी स्पष्ट कानूनी स्थिति सामने रखी जानी चाहिए।
यानी सवाल सीधा है—कानून की किताब में एक व्यवस्था हो और जमीन पर प्रशासनिक कार्रवाई दूसरी दिशा में जाती दिखाई दे, तो जवाबदेही किसकी होगी? पुलिस की, सरकार की या फिर उस न्यायिक व्यवस्था की जिसके आदेशों का हवाला देकर पूरी प्रक्रिया रोकने की बात कही जा रही है?
लोकपाल पहुंची शिकायत, न्यायपालिका पर गंभीर आरोप
इस पूरे विवाद में नया मोड़ तब आया जब हिंदू संगठनों की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीशों के खिलाफ लोकपाल में शिकायत दर्ज कराने की जानकारी सामने आई। शिकायतकर्ता मुकेश जैन को इस मामले की कानूनी और तकनीकी जिम्मेदारी सौंपी गई। संगठन के अनुसार, मुकेश जैन आईआईटी रुड़की से शिक्षित मेटलर्जिकल इंजीनियर और पर्यावरण विषयों से जुड़े व्यक्ति हैं।
शिकायत में न्यायिक आदेशों, पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध और विस्फोटक नियमों के अनुपालन को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि पटाखों पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों और पूर्व न्यायिक निर्देशों की अनदेखी हुई है। हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोप अभी आरोप ही हैं। उनकी सत्यता, कानूनी स्वीकार्यता और संबंधित पक्षों का जवाब सक्षम संस्थाओं की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय हो सकता है।
शिकायतकर्ता ने अपनी याचिका का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2024 में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका सिविल संख्या 13029/1985 से संबंधित आईए संख्या 282141 दाखिल की थी। उनके अनुसार, 3 अप्रैल 2025 को न्यायमूर्ति अभय श्रीनिवास ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुयां के समक्ष भी पटाखों और प्रदूषण को लेकर अपनी दलीलें रखी थीं।
शिकायत में यह दावा किया गया है कि याचिकाकर्ता ने पटाखों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड गैस के प्रभाव को लेकर अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था। उन्होंने यह तर्क भी रखा था कि पटाखों से होने वाले प्रदूषण के आकलन में उनके अनुसार पर्याप्त वैज्ञानिक तथ्यों पर विचार नहीं किया गया।
यहीं से विवाद और दिलचस्प हो जाता है। एक तरफ पर्यावरण संरक्षण और वायु गुणवत्ता को लेकर अदालतों की चिंता है, तो दूसरी तरफ पटाखा समर्थक संगठन सवाल कर रहे हैं कि क्या प्रतिबंध लगाने से पहले सभी वैज्ञानिक पहलुओं और उपलब्ध आंकड़ों की निष्पक्ष समीक्षा की गई?
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सल्फर डाइऑक्साइड को वातावरण शुद्ध करने वाली गैस मानने का दावा स्थापित वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है। यह गैस स्वयं एक वायु प्रदूषक है और इसके स्वास्थ्य तथा पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं। इसी तरह पटाखों के प्रदूषण संबंधी प्रभावों का आकलन वैज्ञानिक माप, प्रदूषक तत्वों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
एमसी मेहता और पर्यावरण संबंधी याचिकाओं पर भी निशाना
शिकायत में पर्यावरण मामलों के याचिकाकर्ता एमसी मेहता की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। मुकेश जैन ने अपनी शिकायत में उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए यह दावा किया है कि पटाखों पर प्रतिबंध लगाने की मांग के पीछे ऐसे हित काम कर रहे हैं, जिनसे पटाखा उद्योग और उससे जुड़े कारोबारियों को नुकसान पहुंच रहा है।
शिकायतकर्ता ने कुछ पर्यावरण संगठनों, वकीलों और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े व्यक्तियों की भूमिका पर भी संदेह जताया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि पटाखों के खिलाफ प्रस्तुत आंकड़ों और दलीलों की निष्पक्षता की जांच होनी चाहिए।
शिकायत में विदेशी एजेंसियों से जुड़े षड्यंत्र और देश की आबादी को महामारी के खतरे में डालने जैसे अत्यंत गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि, इन दावों के समर्थन में स्वतंत्र रूप से प्रमाणित साक्ष्य सामने आए हैं या नहीं, इसकी पुष्टि आवश्यक है। इन्हें फिलहाल शिकायतकर्ता के आरोपों से आगे तथ्य नहीं माना जा सकता।
इस पूरे प्रकरण में एक अहम सवाल यह भी है कि पर्यावरण संरक्षण की मांग और धार्मिक परंपराओं के पालन के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? क्या पर्यावरण के नाम पर हर परंपरा पर एकतरफा प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, या फिर धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच ऐसा रास्ता तलाशा जाना चाहिए, जिसमें कानून और विज्ञान दोनों की भूमिका स्पष्ट हो?
ग्रीन पटाखों के पुराने आदेशों का हवाला
हिंदू संगठनों ने अपनी आपत्ति में सर्वोच्च न्यायालय के रिट पेटिशन सिविल संख्या 728/2015 से संबंधित ग्रीन पटाखों के आदेशों का भी उल्लेख किया है। उनका दावा है कि अदालत ने पहले ग्रीन पटाखों के निर्माण, बिक्री और इस्तेमाल को लेकर जो व्यवस्था निर्धारित की थी, उसकी भावना के अनुरूप कार्रवाई नहीं हो रही है।
संगठनों का कहना है कि यदि ग्रीन पटाखों के लिए निर्धारित मानकों और नियमों के तहत लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था मौजूद है, तो सभी पटाखों को एक ही श्रेणी में रखकर कारोबारियों के लिए रास्ता बंद करना उचित नहीं है।
उनका तर्क है कि पर्यावरण की चिंता अपनी जगह है, लेकिन नियमों के अनुरूप कारोबार करने वाले दुकानदारों को भी अपना पक्ष रखने और कानूनी प्रक्रिया के तहत लाइसेंस प्राप्त करने का अवसर मिलना चाहिए।
हालांकि, ग्रीन पटाखों की अनुमति का अर्थ यह नहीं है कि हर प्रकार के पटाखे, हर स्थान और हर समय इस्तेमाल किए जा सकते हैं। न्यायालयों के आदेश, स्थानीय प्रशासन के निर्देश और प्रदूषण नियंत्रण संबंधी शर्तें लागू रहती हैं। ऐसे में वास्तविक विवाद यह है कि संबंधित आदेशों की सही व्याख्या क्या है और प्रशासन उनका पालन किस तरह कर रहा है?
तीन दिन की राहत और कारोबारियों की बढ़ती बेचैनी
शिकायत में वर्ष 2025 की दीपावली का भी उल्लेख किया गया है। मुकेश जैन के अनुसार, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ ने दीपावली के अवसर पर तीन दिनों के लिए पटाखों पर लगी रोक में सीमित राहत प्रदान की थी।
इसका हवाला देते हुए शिकायतकर्ता ने सवाल उठाया है कि जब कुछ परिस्थितियों में पटाखों को लेकर राहत दी जा सकती है, तो फिर नियमों के अनुरूप लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता क्यों नहीं है?
पटाखा कारोबारियों की चिंता भी कम नहीं है। दीपावली का कारोबार उनके लिए पूरे साल की कमाई का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। लाइसेंस समय पर न मिलना, प्रतिबंधों को लेकर अनिश्चितता और प्रशासनिक आदेशों में स्पष्टता की कमी छोटे दुकानदारों को आर्थिक संकट में डाल सकती है।
व्यापारियों का सवाल है कि यदि उन्हें कारोबार नहीं करना है तो प्रशासन स्पष्ट आदेश दे, लेकिन यदि नियमों के तहत कारोबार की अनुमति है तो लाइसेंस देने की प्रक्रिया को अनिश्चितता में क्यों रखा जाए?
अब न्यायाधीशों के घर तक पहुंचेगी संगठन की बात!
इस विवाद का सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील पहलू हिंदू संगठनों की आगे की रणनीति है। बैठक में निर्णय लिया गया कि संगठन संबंधित न्यायाधीशों से मिलकर अपनी बात रखेंगे और पटाखों के लाइसेंस जारी करने के पक्ष में अनुरोध करेंगे।
संगठनों का कहना है कि वे संवाद के जरिए न्यायपालिका तक अपनी चिंताएं पहुंचाना चाहते हैं। उनका उद्देश्य यह समझाना है कि पटाखों के मामले में धार्मिक परंपराओं, व्यापारियों के अधिकारों और मौजूदा कानूनी प्रावधानों पर भी विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि, इस मामले में यह स्पष्ट रहना जरूरी है कि न्यायाधीशों से संपर्क का कोई भी प्रयास स्थापित न्यायिक शिष्टाचार और कानूनी मर्यादाओं के अनुरूप होना चाहिए। किसी न्यायाधीश के निजी आवास पर जाकर लंबित न्यायिक मामले में व्यक्तिगत आग्रह करना उचित न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता। पक्षकारों के पास अपनी बात रखने के लिए अदालत और निर्धारित कानूनी मंच उपलब्ध हैं।
धर्म, पर्यावरण और कारोबार के बीच असली लड़ाई किसकी?
दरअसल, पटाखों का यह विवाद अब केवल आसमान में रोशनी और आवाज तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे धार्मिक भावनाएं, पर्यावरण संबंधी चिंताएं, न्यायिक अधिकार, सरकारी राजस्व और एक बड़े कारोबार का भविष्य भी जुड़ गया है।
हिंदू संगठनों का आरोप है कि पटाखों पर प्रतिबंध से धार्मिक परंपराओं को प्रभावित किया जा रहा है। वहीं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पक्षों का मानना है कि प्रदूषण के गंभीर प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दोनों पक्षों के बीच बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि फैसले भावनाओं या आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्यों और लागू कानूनों के आधार पर होने चाहिए।
लोकपाल में शिकायत दर्ज होने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शिकायत पर क्या कार्रवाई होती है, क्या संबंधित आरोपों की जांच के लिए कोई आधार बनता है और क्या शिकायतकर्ता को अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत करने पड़ते हैं।
दिल्ली पुलिस की ओर से भी लाइसेंस जारी नहीं करने के संबंध में स्पष्ट कानूनी स्थिति सामने आना जरूरी है, ताकि कारोबारियों के बीच बनी अनिश्चितता दूर हो सके।
अब गेंद किसके पाले में?
इस पूरे घटनाक्रम ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं मिलने वाला। क्या दिल्ली पुलिस के पास लाइसेंस रोकने का स्पष्ट कानूनी आधार है? क्या शिकायत में उठाए गए न्यायिक और प्रशासनिक सवालों की जांच संभव है? क्या ग्रीन पटाखों को लेकर पहले दिए गए आदेशों की सही व्याख्या हो रही है? और सबसे अहम, क्या धार्मिक परंपराओं तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच कोई व्यावहारिक समाधान निकाला जा सकता है?
फिलहाल हिंदू संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। लोकपाल में शिकायत, न्यायिक आदेशों पर सवाल और संबंधित न्यायाधीशों से संवाद की तैयारी ने इस मुद्दे को नई राजनीतिक गर्मी दे दी है।
दिवाली पर पटाखे जलेंगे या नहीं, यह फैसला अंततः लागू कानूनों और न्यायिक आदेशों के दायरे में ही होगा। लेकिन इतना तय है कि इस बार पटाखों की लड़ाई केवल बाजारों में नहीं, बल्कि कानून, अदालत और सियासत के गलियारों में भी गूंज रही है।
धुएं पर बहस अपनी जगह है, लेकिन अब सवाल यह है कि इस पूरे विवाद में कानून की असली रोशनी किसके पक्ष में चमकेगी?















