“श्रीलंका की समुद्री सीमा से भारत ने फिर दिखाई अपनी ताकत, INS तीर, INS सुजाता और ICGS सारथी की मौजूदगी ने बढ़ाई हिंद महासागर में हलचल; SLNS विजयबाहु के साथ PASSEX के जरिए नौसैनिक तालमेल का प्रदर्शन, आखिर कोलंबो के इस दौरे के पीछे क्या है भारत की बड़ी रणनीति?”
हिंद महासागर की लहरें भले ही ऊपर से शांत दिखाई देती हों, लेकिन इनके नीचे भू-राजनीति की एक ऐसी हलचल चल रही है, जिसका असर आने वाले वर्षों में एशिया की रणनीतिक तस्वीर तय कर सकता है। एक तरफ चीन अपनी नौसैनिक मौजूदगी, बंदरगाहों और समुद्री साझेदारियों के जरिए हिंद महासागर में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ रक्षा सहयोग को नई धार देने में जुटा है। इस समुद्री शतरंज में श्रीलंका की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। वजह साफ है, श्रीलंका सिर्फ भारत का पड़ोसी देश नहीं, बल्कि उन महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों के करीब स्थित है, जिनसे दुनिया का बड़ा हिस्सा कारोबार करता है।
इसी रणनीतिक पृष्ठभूमि में भारतीय नौसेना के पहले ट्रेनिंग स्क्वाड्रन का श्रीलंका दौरा महज एक औपचारिक सद्भावना यात्रा बनकर नहीं रह जाता। कोलंबो में सफल प्रवास पूरा करने के बाद 29 अक्टूबर को भारतीय नौसेना के जहाजों का रवाना होना भारत की समुद्री कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। इस दौरे में INS तीर, INS सुजाता और भारतीय तटरक्षक जहाज ICGS सारथी शामिल रहे। तीनों जहाजों की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि भारत अपने समुद्री पड़ोस में सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशिक्षण, सहयोग और ऑपरेशनल तालमेल के स्तर पर भी रिश्तों को मजबूत कर रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि भारत और श्रीलंका के रिश्तों में समुद्र हमेशा से एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा है। लेकिन मौजूदा दौर में इस रिश्ते का महत्व और बढ़ गया है। अब मामला सिर्फ मछुआरों, समुद्री व्यापार या पारंपरिक मित्रता तक सीमित नहीं है। इसके पीछे क्षेत्रीय सुरक्षा, सामरिक संतुलन, समुद्री निगरानी और हिंद महासागर में प्रभाव बनाए रखने जैसी बड़ी चुनौतियां भी खड़ी हैं।
कोलंबो की यात्रा, लेकिन संदेश पूरे हिंद महासागर के लिए
भारतीय नौसेना के पहले ट्रेनिंग स्क्वाड्रन का कोलंबो पहुंचना और वहां से रवाना होना अपने आप में एक सामान्य नौसैनिक गतिविधि लग सकती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार जहाजों की आवाजाही भी उतना ही संदेश देती है, जितना किसी बड़े राजनयिक सम्मेलन में दिया गया बयान।
इस दौरे का प्रमुख उद्देश्य भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री सहयोग, रक्षा संबंधों और आपसी तालमेल को मजबूत करना था। यात्रा के दौरान भारतीय नौसेना के अधिकारियों ने श्रीलंकाई नौसेना के वेस्टर्न नेवल एरिया के कमांडर से मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों के बीच नौसैनिक सहयोग और प्रशिक्षण से जुड़े विषयों पर बातचीत हुई।
दोनों देशों के नौसैनिक प्रशिक्षुओं को एक-दूसरे की प्रशिक्षण सुविधाओं और ऑपरेशनल गतिविधियों को समझने का अवसर भी मिला। इसका महत्व केवल इतना नहीं है कि दो देशों के अधिकारी एक-दूसरे की कार्यप्रणाली से परिचित हुए। असली फायदा तब सामने आता है, जब किसी समुद्री संकट, आपात स्थिति या संयुक्त अभियान के दौरान दोनों देशों की नौसेनाएं एक-दूसरे के साथ बेहतर तालमेल बैठा सकें।
यानी आज प्रशिक्षण के नाम पर जो समझ विकसित की जा रही है, वह कल समुद्र में किसी वास्तविक चुनौती का सामना करने में काम आ सकती है।
PASSEX: रवाना होते जहाजों ने समुद्र में भी दिखाई साझेदारी
इस पूरे दौरे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहा दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच हुआ PASSEX यानी Passage Exercise।
कोलंबो से रवाना होते समय भारतीय नौसेना के जहाजों ने श्रीलंकाई नौसेना के युद्धपोत SLNS विजयबाहु के साथ संयुक्त समुद्री अभ्यास किया। इस अभ्यास का उद्देश्य दोनों नौसेनाओं के बीच ऑपरेशनल तालमेल और इंटरऑपरेबिलिटी को बेहतर बनाना था।
PASSEX को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि समुद्र में सिर्फ युद्धपोतों की मौजूदगी ही ताकत नहीं होती। असली क्षमता इस बात से तय होती है कि अलग-अलग देशों के जहाज एक साथ कितनी कुशलता से काम कर सकते हैं। संचार व्यवस्था, संकेतों का आदान-प्रदान, समुद्री संचालन और एक-दूसरे की कार्यप्रणाली को समझना ऐसे अभ्यासों का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
यही वजह है कि इस तरह के अभ्यासों को केवल दिखावटी सैन्य गतिविधि मानना सही नहीं होगा। इनसे भविष्य में संयुक्त समुद्री अभियानों, मानवीय सहायता, आपदा राहत और समुद्री सुरक्षा से जुड़े मिशनों में सहयोग की संभावनाएं मजबूत होती हैं।
यहां एक अहम राजनीतिक संदेश भी छिपा है। भारत यह दिखाना चाहता है कि हिंद महासागर में सुरक्षा का सवाल केवल किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं है। क्षेत्र के देशों के बीच विश्वास और सहयोग के बिना समुद्री सुरक्षा का मजबूत ढांचा तैयार नहीं किया जा सकता।
चीन की बढ़ती मौजूदगी और भारत की बेचैनी की असली वजह
अब सवाल उठता है कि भारत श्रीलंका के साथ अपने नौसैनिक संबंधों को इतनी गंभीरता से क्यों मजबूत कर रहा है? इसका जवाब चीन की बढ़ती समुद्री सक्रियता में छिपा है।
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी आर्थिक और रणनीतिक भागीदारी का विस्तार किया है। बंदरगाहों के विकास, बुनियादी ढांचे में निवेश, समुद्री संपर्क और रक्षा सहयोग के जरिए उसने इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है।
श्रीलंका इस रणनीतिक समीकरण में बेहद महत्वपूर्ण है। हिंद महासागर के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के करीब स्थित होने के कारण इस द्वीपीय देश का भौगोलिक महत्व बहुत अधिक है। यहां होने वाली किसी भी बड़ी रणनीतिक गतिविधि पर भारत की नजर रहना स्वाभाविक है।
चीन की समुद्री रणनीति को लेकर भारत की चिंताएं केवल सैन्य जहाजों की आवाजाही तक सीमित नहीं हैं। इसके पीछे बंदरगाहों, समुद्री लॉजिस्टिक्स, आर्थिक निर्भरता और दीर्घकालिक रणनीतिक प्रभाव का पूरा गणित है।
हालांकि, हर चीनी निवेश को सैन्य गतिविधि मान लेना भी सही नहीं होगा। लेकिन भारत के लिए यह जरूरी है कि हिंद महासागर में किसी बाहरी शक्ति की बढ़ती मौजूदगी के बीच उसके अपने समुद्री हित सुरक्षित रहें।
यही वह बिंदु है, जहां श्रीलंका भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
श्रीलंका: छोटा देश, लेकिन समुद्री राजनीति में बड़ी भूमिका
श्रीलंका का आकार भले ही भारत या चीन जैसा न हो, लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति उसे असाधारण रणनीतिक महत्व देती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के कई महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग उसके आसपास से गुजरते हैं। इन मार्गों से ऊर्जा संसाधनों, औद्योगिक सामान और अन्य जरूरी वस्तुओं की आवाजाही होती है।
भारत जैसे देश के लिए इन समुद्री मार्गों की सुरक्षा आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों से जुड़ी हुई है।
अगर हिंद महासागर में समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने, आपात परिस्थितियों में प्रतिक्रिया देने और समुद्री अपराधों को रोकने की क्षमता मजबूत करनी है, तो श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के साथ सहयोग जरूरी है।
भारत के सामने एक और चुनौती है। उसे अपने पड़ोसियों के साथ ऐसे रिश्ते बनाने हैं, जिनमें सहयोग तो हो, लेकिन किसी देश की संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति पर दबाव डालने का संदेश न जाए।
श्रीलंका भी अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग देशों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। वह भारत के साथ करीबी रिश्ते रखता है, लेकिन चीन समेत अन्य देशों के साथ आर्थिक और राजनयिक सहयोग भी जारी रखता है।
ऐसे में भारत के लिए सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती श्रीलंका को किसी खेमे में धकेलना नहीं, बल्कि उसे भरोसेमंद समुद्री साझेदार बनाए रखना है।
भारत की रणनीति: सिर्फ युद्धपोत नहीं, भरोसे का नेटवर्क भी
भारतीय नौसेना का यह दौरा भारत की व्यापक समुद्री रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। भारत लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में एक जिम्मेदार और भरोसेमंद समुद्री सुरक्षा साझेदार की भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
इस रणनीति में संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम, समुद्री निगरानी, क्षमता निर्माण और मानवीय सहायता जैसे कई पहलू शामिल हैं।
#WATCH | Ships of the First Training Squadron (1TS) of the Indian Navy, comprising INS Tir, INS Sujata and ICGS Sarathi, departed Colombo, Sri Lanka, on 29 Oct 26, marking the conclusion of a successful port call. The visit featured bilateral engagements between the Indian Navy (IN) and the Sri Lanka Navy (SLN), reinforcing defence cooperation and the maritime partnership between the two nations.
During the port call, the Senior Officer, 1TS, accompanied by the Commanding Officers of the ships, called on the Commander, Western Naval Area, SLN. The interaction reaffirmed the close bilateral ties and the shared commitment of both navies to enhancing maritime cooperation.
— ANI (@ANI) October 30, 2026
INS तीर और INS सुजाता जैसे प्रशिक्षण जहाजों की भूमिका इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि इनके माध्यम से भारतीय नौसैनिक प्रशिक्षुओं को समुद्री परिस्थितियों का व्यावहारिक अनुभव मिलता है। दूसरी तरफ मित्र देशों के नौसैनिकों के साथ संपर्क बढ़ने से संस्थागत स्तर पर संबंध मजबूत होते हैं।
ICGS सारथी की मौजूदगी इस दौरे को एक और आयाम देती है। भारतीय तटरक्षक बल की भागीदारी समुद्री सुरक्षा के व्यापक पहलुओं की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है। समुद्र में केवल सैन्य खतरे ही चुनौती नहीं होते। तस्करी, अवैध गतिविधियां, समुद्री दुर्घटनाएं और आपदा जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए भी देशों के बीच सहयोग जरूरी है।
इसलिए भारत की समुद्री कूटनीति का असली लक्ष्य केवल अपनी सैन्य ताकत दिखाना नहीं, बल्कि ऐसा सहयोगी नेटवर्क तैयार करना है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत कर सके।
पर्दे के पीछे की कहानी: समुद्र में प्रभाव की लड़ाई, जमीन पर कूटनीति
हिंद महासागर में चीन और भारत की प्रतिस्पर्धा को केवल सैन्य शक्ति की तुलना के रूप में देखना अधूरा होगा। यह प्रभाव, भरोसे और क्षेत्रीय साझेदारी की लड़ाई भी है।
चीन आर्थिक निवेश और बुनियादी ढांचे के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाता है, जबकि भारत भौगोलिक निकटता, ऐतिहासिक संबंधों, सुरक्षा सहयोग और प्रशिक्षण के माध्यम से अपने पड़ोसियों के साथ रिश्ते मजबूत करने की कोशिश करता है।
दोनों देशों के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन क्षेत्रीय देशों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल हमेशा रहता है कि वे अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हुए दोनों शक्तियों के साथ किस तरह संतुलन स्थापित करें।
श्रीलंका के लिए भी यह आसान स्थिति नहीं है। उसे अपनी आर्थिक जरूरतों, राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना होता है। भारत के लिए जरूरी है कि वह श्रीलंका को केवल रणनीतिक नक्शे पर एक महत्वपूर्ण स्थान के रूप में न देखे, बल्कि उसकी चिंताओं और प्राथमिकताओं को भी समझे।
यहीं भारत की कूटनीति की असली परीक्षा होती है। समुद्र में युद्धपोत भेजना आसान हो सकता है, लेकिन लंबे समय तक विश्वास कायम रखना कहीं अधिक कठिन काम है।
भारतीय नौसेना का कोलंबो दौरा इसी व्यापक समीकरण का हिस्सा है। अधिकारियों की मुलाकात, प्रशिक्षुओं का आपसी संवाद और SLNS विजयबाहु के साथ PASSEX जैसी गतिविधियां दिखाती हैं कि भारत अपने समुद्री रिश्तों को केवल औपचारिक मुलाकातों तक सीमित नहीं रखना चाहता।
क्या चीन को मिला कोई सीधा संदेश?
इस सवाल का जवाब थोड़ा सावधानी से समझने की जरूरत है। भारतीय नौसेना की इस यात्रा को चीन के खिलाफ किसी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई या चेतावनी के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। दौरे का घोषित उद्देश्य श्रीलंका के साथ प्रशिक्षण, रक्षा सहयोग और समुद्री तालमेल बढ़ाना था।
लेकिन व्यापक रणनीतिक संदर्भ में इसका संदेश जरूर है।
भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि हिंद महासागर में उसकी समुद्री सुरक्षा से जुड़े हितों को नजरअंदाज न किया जा सके। वह अपने पड़ोसियों के साथ ऐसे संबंध विकसित करना चाहता है, जिनसे क्षेत्र में किसी भी बाहरी शक्ति के बढ़ते प्रभाव के बीच संतुलन बना रहे।
दूसरे शब्दों में कहें तो भारत का जवाब केवल जहाजों की संख्या बढ़ाना नहीं है। वह सहयोगियों की संख्या, आपसी विश्वास और समुद्री संचालन की साझा क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है।
यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिंद महासागर में स्थिरता किसी एक देश के हित में नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के आर्थिक और सामरिक भविष्य के लिए जरूरी है।
असली परीक्षा अब आगे होगी
भारतीय नौसेना का पहला ट्रेनिंग स्क्वाड्रन 29 अक्टूबर को कोलंबो से रवाना हो गया। लेकिन इस यात्रा का रणनीतिक महत्व जहाजों के वापस लौटने के साथ खत्म नहीं होता।
असली सवाल यह होगा कि इस दौरे से बने संपर्क और आपसी समझ को भविष्य में कितनी मजबूती मिलती है। क्या दोनों देशों के बीच संयुक्त अभ्यासों का दायरा बढ़ेगा? क्या प्रशिक्षण और समुद्री निगरानी में सहयोग और गहरा होगा? क्या हिंद महासागर की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत और श्रीलंका एक अधिक मजबूत साझेदारी विकसित कर पाएंगे?
इन सवालों के जवाब आने वाला समय देगा।
फिलहाल इतना साफ है कि हिंद महासागर में प्रभाव की लड़ाई केवल बड़े युद्धपोतों और सैन्य अड्डों से नहीं जीती जाएगी। इसके लिए भरोसा, साझेदारी और लगातार सक्रिय कूटनीति की जरूरत होगी।
भारत ने कोलंबो से रवाना होते अपने जहाजों के जरिए इसी दिशा में एक और कदम बढ़ाया है। समुद्र में SLNS विजयबाहु के साथ हुआ PASSEX भले ही एक सीमित नौसैनिक अभ्यास रहा हो, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश कहीं व्यापक है।
चीन हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश में है, तो भारत भी अपने समुद्री पड़ोस को खाली मैदान छोड़ने के मूड में नहीं है। फर्क बस इतना है कि इस समुद्री शतरंज में भारत की अगली चाल केवल ताकत दिखाने की नहीं, बल्कि पड़ोसियों का भरोसा जीतने की भी है।















