“राम गोपाल यादव के साथ धनराज परिमल नाथवानी—अखिलेश के फैसले ने याद दिलाया मुलायम दौर, जब समाजवादी राजनीति के दरवाजे उद्योगपतियों के लिए भी खुले थे”
लखनऊ: समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए अपने दो अधिकृत प्रत्याशियों के नाम घोषित कर दिए हैं—पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रो. राम गोपाल यादव और उद्योग एवं कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़े धनराज परिमल नाथवानी। दोनों बुधवार, 30 सितंबर को सुबह 11 बजे पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में नामांकन दाखिल करने वाले हैं।
पहली नजर में यह सामान्य राजनीतिक घोषणा है—एक तरफ पार्टी का पुराना, अनुभवी और संगठनात्मक चेहरा; दूसरी तरफ कॉरपोरेट और उद्योग जगत से आने वाला नया चेहरा। लेकिन राजनीति में नामों की सूची अक्सर सिर्फ नामों की सूची नहीं होती। खासकर तब, जब दूसरा नाम उत्तर प्रदेश की पारंपरिक समाजवादी राजनीति की सीमाओं से बाहर का हो और उसके पारिवारिक तथा पेशेवर संबंध देश के बड़े कॉरपोरेट नेटवर्क से जुड़े हों।
यहीं से कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है…………..और थोड़ी व्यंग्यात्मक भी।
क्योंकि कभी समाजवाद की राजनीति में सवाल यह होता था कि ‘गरीब, किसान, मजदूर और पिछड़े वर्ग की आवाज संसद तक कैसे पहुंचे?’ अब उसी राजनीतिक धारा की राज्यसभा सूची देखकर एक नया सवाल पैदा होता है—‘समाजवाद और कॉरपोरेट इंडिया के बीच की दूरी आखिर कितनी बची है?’
यह सवाल आलोचना के लिए नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए है।
राम गोपाल पुराने समाजवादी दस्तावेज, नाथवानी नया राजनीतिक संकेत
प्रो. राम गोपाल यादव का नाम समाजवादी पार्टी की राजनीति में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वह पार्टी के संस्थापक दौर से जुड़े वरिष्ठ नेताओं में हैं और लंबे समय से संसद में सपा का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।
इसके मुकाबले धनराज परिमल नाथवानी का चयन स्वाभाविक रूप से अधिक चर्चा पैदा करता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वह रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े वरिष्ठ कॉरपोरेट कार्यकारी हैं और अंबानी परिवार के साथ उनके करीबी संबंधों का भी उल्लेख किया गया है।
और यहां एक और दिलचस्प कड़ी सामने आती है।
धनराज परिमल नाथवानी, राज्यसभा सांसद परिमल नाथवानी के पुत्र हैं। परिमल नाथवानी वर्तमान में झारखंड से निर्दलीय राज्यसभा सांसद हैं और उनके पेशेवर परिचय में रिलायंस इंडस्ट्रीज के ग्रुप प्रेसिडेंट/कॉरपोरेट अफेयर्स से जुड़ी भूमिका दर्ज है।
अर्थात तस्वीर कुछ यूं बनती है—पिता राज्यसभा में, पुत्र अब राज्यसभा की दौड़ में; पिता का कॉरपोरेट कनेक्शन रिलायंस से, पुत्र का भी कॉरपोरेट परिचय रिलायंस से।
सियासत में इसे संयोग कहिए, रणनीति कहिए या बदलते समय की जरूरत—व्याख्या के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है।
मुलायम के दौर की याद क्यों आई?
यहां इतिहास खुद दरवाजा खटखटाता है।
समाजवादी पार्टी के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के दौर में भी समाजवादी राजनीति और बड़े उद्योग समूहों के बीच दूरी हमेशा उतनी नहीं रही, जितनी मंचों पर समाजवाद की भाषा सुनकर महसूस होती थी।
2003 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने उत्तर प्रदेश विकास परिषद बनाई थी, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन सपा महासचिव अमर सिंह को दी गई थी। परिषद में बड़े औद्योगिक घरानों के प्रतिनिधियों को भी स्थान मिला था। समकालीन रिपोर्टों में अनिल अंबानी, सुब्रत राय, आदि गोदरेज और कुमार मंगलम बिड़ला जैसे नामों का उल्लेख मिलता है।
उस दौर में समाजवादी पार्टी की राजनीति के एक हिस्से का चेहरा अमर सिंह बने थे—एक ऐसा चेहरा जो दिल्ली के राजनीतिक गलियारों और कॉरपोरेट जगत के बीच पुल की तरह काम करता था। समकालीन विश्लेषणों में उन्हें उद्योगपतियों और सपा के बीच संपर्क-सूत्र के रूप में वर्णित किया गया।
यही वह दौर था जब ‘धर्मनिरपेक्ष समाजवाद’ की राजनीतिक भाषा के साथ उद्योग, निवेश और बड़े कारोबारी समूहों से संवाद भी चलता था।
2004 में तो रिलायंस से जुड़े अनिल अंबानी को समाजवादी पार्टी की ओर से राज्यसभा भेजे जाने की संभावना तक की खबरें प्रकाशित हुई थीं।
इसलिए आज धनराज नाथवानी के नाम पर उठ रही बहस को शून्य से पैदा हुई बहस कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
फर्क इतना है कि तब दरवाजा अमर सिंह के जरिए खुलता दिखाई देता था, आज टिकट सीधे उस व्यक्ति को मिल रहा है जिसका पेशेवर परिचय उसी कॉरपोरेट संसार से आता है।
यही बदलाव देखने लायक है।
तब अमर सिंह थे, आज धनराज नाथवानी हैं—लेकिन क्या कहानी वही है?
बिल्कुल वही कहना भी सही नहीं होगा।
मुलायम सिंह यादव का दौर अलग था। पार्टी की सामाजिक संरचना, राष्ट्रीय राजनीति, उत्तर प्रदेश की सत्ता और उस समय के राजनीतिक समीकरण अलग थे। अमर सिंह का राजनीतिक कद भी अलग था।
आज अखिलेश यादव की राजनीति का घोषित सामाजिक विमर्श ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समूहों को साथ लाने पर केंद्रित है। हालिया राजनीतिक अभियान में अखिलेश यादव ने इसी सामाजिक गठजोड़ को आगे बढ़ाने की कोशिश की है।
ऐसे में राज्यसभा के लिए कॉरपोरेट क्षेत्र से आने वाले व्यक्ति का चयन स्वाभाविक रूप से एक अलग तरह का संदेश पैदा करता है।
एक तरफ जमीन की राजनीति है।
दूसरी तरफ संसद के ऊपरी सदन की वह राजनीति है, जहां संख्या के साथ-साथ नेटवर्क, अनुभव, संस्थागत संपर्क और राष्ट्रीय स्तर की स्वीकार्यता का महत्व भी बढ़ जाता है।
और शायद यहीं अखिलेश यादव की राजनीति में दिखाई देने वाला परिवर्तन सबसे ज्यादा रोचक है।
समाजवाद अब सिर्फ लाल टोपी की राजनीति नहीं?
भारतीय राजनीति ने पिछले तीन दशकों में एक बात बार-बार साबित की है—विचारधारा और सत्ता की व्यावहारिक जरूरतों के बीच की रेखा हमेशा सीधी नहीं रहती।
समाजवादी पार्टी भी इससे अलग नहीं है।
मुलायम सिंह यादव के समय बड़े उद्योगपतियों से संवाद था। अमर सिंह इसका सबसे चर्चित चेहरा बने। अनिल अंबानी को लेकर राज्यसभा की चर्चाएं हुईं। उत्तर प्रदेश विकास परिषद में बड़े उद्योग समूहों को जोड़ा गया। इन सबके पीछे निवेश और विकास का तर्क भी सामने रखा गया।
आज अखिलेश यादव के सामने अलग चुनौती है।
उनकी पार्टी एक तरफ खुद को सामाजिक न्याय की राजनीति के रूप में स्थापित करना चाहती है, दूसरी तरफ उसे राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी राजनीति भी करनी है जिसमें उद्योग, निवेश, अर्थव्यवस्था और बड़े संस्थागत नेटवर्क से संवाद अपरिहार्य है।
तो क्या नाथवानी का चयन इसी बदलाव का प्रतीक है?
इसे तथ्य के रूप में कहना जल्दबाजी होगी।
लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह चयन उस पारंपरिक धारणा को चुनौती देता है जिसमें समाजवादी राजनीति और कॉरपोरेट जगत को दो अलग-अलग खेमों में रखा जाता था।
कभी समाजवादी राजनीति में मंच से कहा जाता था कि सत्ता गरीब के लिए है।
फिर राजनीति ने उद्योगपति को मंच पर बुलाया।
फिर उद्योगपति राजनीति के मंच का हिस्सा बना।
और अब उद्योग जगत से जुड़ा व्यक्ति सीधे राज्यसभा के टिकट पर आ गया।
इतिहास की किताब शायद मुस्कुराकर पूछ रही होगी—
‘समाजवाद बदला है या समाजवाद की परिभाषा?’
लेकिन राजनीति का उत्तर इतना आसान नहीं है।
क्योंकि राज्यसभा स्वयं ऐसी जगह है जहां क्षेत्रीय दल अक्सर ऐसे लोगों को भेजते रहे हैं जिनका राजनीतिक जीवन पारंपरिक चुनावी राजनीति से अलग रहा है। कभी वकील, कभी अर्थशास्त्री, कभी पत्रकार, कभी अभिनेता और कभी उद्योग जगत से जुड़े लोग उच्च सदन पहुंचते रहे हैं।
इसलिए धनराज नाथवानी का चयन केवल इसलिए असामान्य नहीं कहा जा सकता कि वह कॉरपोरेट क्षेत्र से आते हैं।
असली राजनीतिक प्रश्न यह है कि सपा इस चयन के जरिए किस तरह का संबंध स्थापित करना चाहती है और आने वाले समय में उस संबंध का स्वरूप क्या होगा।
इसका उत्तर आने वाले महीनों की राजनीति देगी।
पिता झारखंड से, पुत्र उत्तर प्रदेश से—राज्यसभा का भूगोल भी दिलचस्प
परिमल नाथवानी वर्तमान में झारखंड का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। PRS के रिकॉर्ड के अनुसार उनका मौजूदा राज्यसभा कार्यकाल 22 जून 2026 से शुरू हुआ है और वह निर्दलीय सदस्य हैं।
अब उनके पुत्र धनराज को उत्तर प्रदेश से सपा उम्मीदवार बनाया गया है।
यानी परिवार की राजनीतिक उपस्थिति दो अलग राज्यों के राज्यसभा भूगोल में दिखाई दे सकती है।
राजनीतिक आलोचक इसे परिवारवाद, कॉरपोरेट नेटवर्क या प्रभावशाली संपर्कों के चश्मे से देख सकते हैं। दूसरी तरफ समर्थक इसे अनुभव, संपर्क और पेशेवर क्षमता को राजनीति में लाने की कोशिश कह सकते हैं।
इन दोनों व्याख्याओं में से कौन भविष्य में अधिक सार्थक साबित होगी, यह आज तय करना संभव नहीं है।
लेकिन सवाल पूछना पूरी तरह जायज है।
अखिलेश की राजनीति में ‘पुराना समाजवाद’ और ‘नया नेटवर्क’ साथ-साथ
आज की घोषणा का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश शायद यही है कि समाजवादी पार्टी अपने पुराने संगठनात्मक स्तंभों को छोड़ नहीं रही है।
राम गोपाल यादव उसी निरंतरता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वहीं धनराज नाथवानी एक ऐसे नेटवर्क की ओर संकेत करते हैं जो उद्योग, कॉरपोरेट प्रशासन और राष्ट्रीय स्तर के प्रभावशाली संस्थागत संपर्कों से जुड़ा है।
एक तरफ राम गोपाल यादव—संगठन और पुरानी राजनीतिक स्मृति।
दूसरी तरफ धनराज नाथवानी—कॉरपोरेट और नई राजनीतिक पहुंच।
और दोनों को एक साथ रखना अपने आप में एक राजनीतिक तस्वीर है।
यह तस्वीर कहती है कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी शायद केवल अतीत की समाजवादी पहचान के सहारे आगे नहीं बढ़ना चाहती।
लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस बदलाव की कीमत पार्टी की मूल सामाजिक राजनीति को न चुकानी पड़े।
2027 से पहले का संदेश?
उत्तर प्रदेश में 2027 की विधानसभा राजनीति की तैयारी पहले ही शुरू हो चुकी है। अखिलेश यादव की हालिया गतिविधियों में पीडीए और गठबंधन की राजनीति प्रमुख विषय हैं।
ऐसे समय में राज्यसभा के उम्मीदवार का चयन भी राजनीतिक संदेशों से खाली नहीं माना जाएगा।
पर सवाल यह है कि पार्टी अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को क्या संदेश दे रही है?
क्या यह संकेत है कि समाजवादी पार्टी अब सामाजिक न्याय की राजनीति के साथ कॉरपोरेट और उद्योग जगत से भी संवाद बढ़ाना चाहती है?
या यह सिर्फ राज्यसभा के लिए एक व्यक्ति का चयन है, जिसका व्यापक राजनीतिक अर्थ निकालना जल्दबाजी होगा?
दोनों संभावनाएं खुली हैं।
और शायद राजनीति की खूबसूरती भी यही है—नामांकन पत्र में सिर्फ नाम लिखा जाता है, लेकिन उसके पीछे कई संदेश पढ़े जाते हैं।
समय बदल गया है, राजनीति भी
मुलायम सिंह यादव के दौर में समाजवाद के मंच पर उद्योगपतियों की मौजूदगी को लेकर सवाल उठे थे। उस समय अमर सिंह की भूमिका पर भी खूब बहस हुई। उद्योग और राजनीति के रिश्तों को लेकर आलोचनाएं भी हुईं और निवेश तथा विकास के पक्ष में तर्क भी दिए गए।
आज वही समाजवादी राजनीति एक नई पीढ़ी के नेतृत्व में आगे बढ़ रही है।
फर्क यह है कि अब अमर सिंह नहीं हैं।
लेकिन राजनीति और कॉरपोरेट जगत के बीच संवाद की जरूरत खत्म नहीं हुई।
बस माध्यम बदल गया है।
और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे तीखा व्यंग्य है—
जिस पार्टी की राजनीतिक स्मृति ‘नेता जी’ के किसान-मजदूर वाले समाजवाद से शुरू होती है, उसकी राज्यसभा की नई तस्वीर में एक तरफ वही पुराने समाजवादी स्तंभ हैं और दूसरी तरफ रिलायंस से जुड़े कॉरपोरेट संसार का प्रतिनिधि चेहरा।
समय ने समाजवाद को खत्म नहीं किया।
समय ने उसके साथ कुछ नए शब्द जोड़ दिए हैं—निवेश, नेटवर्क, कॉरपोरेट संपर्क और राष्ट्रीय प्रभाव।
अब देखना यह है कि यह नया अध्याय समाजवादी पार्टी की राजनीति को कितना बदलता है।
क्योंकि राजनीति में टिकट केवल संसद तक पहुंचने का रास्ता नहीं होता।
कभी-कभी वह पार्टी के बदलते चरित्र का आईना भी बन जाता है।
और आज समाजवादी पार्टी के सामने रखा यह आईना यही दिखा रहा है कि ‘समाजवाद’ की पुरानी तस्वीर के फ्रेम में अब कॉरपोरेट इंडिया का चेहरा भी जगह बना चुका है।
फिलहाल तथ्य इतना ही है कि सपा ने प्रो. राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया है और दोनों के नामांकन की घोषणा अखिलेश यादव की मौजूदगी में की गई है। बाकी अर्थ—राजनीतिक, वैचारिक और रणनीतिक—समय के साथ स्पष्ट होंगे।















