“मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने मामला रखने के बाद अब प्राधिकरण की कार्रवाई पर नजर; छोटी निर्माण संबंधी आपत्तियों के चलते खरीद-बिक्री, नामांतरण और बैंक ऋण तक प्रभावित होने की शिकायत”
नोएडा: नोएडा विधायक पंकज सिंह ने शहर के हजारों आवंटियों से जुड़े धारा-10 के नोटिसों का मुद्दा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने उठाया है। वर्षों से लंबित फाइलों और छोटी-छोटी निर्माण संबंधी आपत्तियों के कारण संपत्तियों की खरीद-बिक्री, नामांतरण और बैंक ऋण जैसी प्रक्रियाओं के प्रभावित होने की शिकायतों के बीच अब इस मामले में प्राधिकरण की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।
उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, सितंबर 2025 में विधायक पंकज सिंह ने मुख्यमंत्री के समक्ष धारा-10 के नोटिसों का मामला रखा था। अक्टूबर 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट में भी विधायक के हवाले से कहा गया था कि उन्होंने यह विषय मुख्यमंत्री के सामने उठाया है और इसके समाधान की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
अब करीब 31 हजार संपत्तियों पर नोटिस जारी किए जाने की रिपोर्ट सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि इनमें कितने मामलों का निस्तारण हो चुका है और कितनी फाइलें आज भी लंबित हैं।
पंकज सिंह के हस्तक्षेप से फिर चर्चा में आया पुराना मामला
नोएडा में धारा-10 के नोटिसों को लेकर आवंटियों की शिकायतें नई नहीं हैं। लंबे समय से अलग-अलग सेक्टरों के निवासी इस व्यवस्था में सुधार और लंबित मामलों के समाधान की मांग करते रहे हैं।
इसी क्रम में विधायक पंकज सिंह ने भी इस मुद्दे को उठाया। अक्टूबर 2025 की हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, सेक्टर-22 के निवासियों का एक प्रतिनिधिमंडल धारा-10 के नोटिस हटवाने की मांग लेकर विधायक से मिला था। रिपोर्ट में विधायक के हवाले से बताया गया कि मामला मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जा चुका है।
विधायक की ओर से ऐसे मामलों के निस्तारण के लिए न्यायसंगत नीति बनाए जाने की मांग की गई। इससे साफ है कि मामला केवल किसी एक सेक्टर या कुछ संपत्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़ी संख्या में आवंटियों की संपत्तियों से जुड़ा प्रशासनिक विषय बन चुका है।
31 हजार संपत्तियों पर नोटिस, लेकिन कितनी फाइलें हुईं साफ?
धारा-10 के मामले में सबसे ज्यादा चर्चा करीब 31 हजार संपत्तियों पर जारी नोटिसों को लेकर है। उपलब्ध स्थानीय रिपोर्ट में इस संख्या का उल्लेख किया गया है। हालांकि अलग-अलग समय की रिपोर्टों में नोटिस पाने वाले आवंटियों की संख्या अलग-अलग बताई गई है।
एक रिपोर्ट में करीब 3,500 आवंटियों को धारा-10 के नोटिस दिए जाने का उल्लेख मिलता है, जबकि दूसरे चरण में करीब 31 हजार संपत्तियों पर नोटिस जारी होने की बात सामने आई है।
इसलिए इन दोनों आंकड़ों को सीधे एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। प्राधिकरण को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कुल कितने नोटिस जारी हुए, वे किन श्रेणियों में हैं और वर्तमान में कितने मामले लंबित हैं।
यही आंकड़े इस विवाद की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।
छोटी आपत्ति, लेकिन पूरी संपत्ति की प्रक्रिया पर असर
आवंटियों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि कई मामलों में निर्माण से जुड़ी छोटी आपत्तियां पूरी संपत्ति की प्रशासनिक प्रक्रिया को प्रभावित कर देती हैं।
नाली को कवर करना, बालकनी का मामूली विस्तार, घर के बाहर रैंप या स्लैब बनाना जैसी निर्माण संबंधी आपत्तियों का उल्लेख शिकायतों में किया गया है।
आवंटियों का कहना है कि ऐसी आपत्तियों के कारण संपत्ति की फाइल आगे नहीं बढ़ती। इसका असर सिर्फ निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि क्रय-विक्रय, नामांतरण और बैंक ऋण जैसी प्रक्रियाओं पर भी पड़ सकता है।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या हर तरह की निर्माण संबंधी आपत्ति के लिए एक जैसी प्रक्रिया होनी चाहिए या छोटी और सुधार योग्य कमियों के लिए अलग सरल व्यवस्था बनाई जा सकती है।
विधायक का जोर—जनता की समस्या का हो व्यावहारिक समाधान
विधायक पंकज सिंह लगातार जनसंवाद के माध्यम से स्थानीय समस्याओं को सामने लाने की बात करते रहे हैं। उनके जनसंवाद कार्यक्रमों में सड़क, बिजली, पानी, सीवर, अतिक्रमण और अन्य नागरिक समस्याओं के साथ प्राधिकरण से जुड़े मुद्दे भी उठते रहे हैं।
मई 2026 के एक जनसंवाद कार्यक्रम में भी स्थानीय निवासियों ने अपनी समस्याएं अधिकारियों के सामने रखी थीं।
धारा-10 के मामलों के संदर्भ में विधायक का जोर इस बात पर रहा है कि अधिकारी जनता की वास्तविक परेशानियों को समझें और समस्याओं का समाधान केवल फाइलों तक सीमित न रहे।
उनकी ओर से अधिकारियों के जनता के बीच पहुंचकर समस्याओं को समझने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
प्राधिकरण की जिम्मेदारी भी कम नहीं
हालांकि इस पूरे मामले का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। नोएडा प्राधिकरण के लिए भवन नियमों और लीज शर्तों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है। अनधिकृत निर्माण या नियमों के उल्लंघन की स्थिति में कानून के तहत कार्रवाई का प्रावधान है।
उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 की धारा-10 के तहत निर्धारित परिस्थितियों में प्राधिकरण को स्थल या भवन के हस्तांतरी अथवा अधिभोगी को नोटिस देने की शक्ति प्राप्त है। कानून में ऐसी स्थिति का उल्लेख है, जहां स्थल या भवन की दशा अथवा उसका उपयोग क्षेत्र के नियोजन, सुविधा या सामान्य जनता के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा हो या डालने की संभावना हो।
इसलिए समाधान का रास्ता ऐसा होना जरूरी है जिसमें नियमों का पालन भी हो और सुधार योग्य कमियों के मामलों में आवंटियों को व्यावहारिक राहत भी मिले।
पंकज सिंह के सामने रखे गए सवाल अब प्राधिकरण से जवाब मांग रहे
विधायक पंकज सिंह द्वारा मामला मुख्यमंत्री के सामने उठाए जाने के बाद अब निगाहें नोएडा प्राधिकरण पर हैं।
आवंटियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल हैं:
कितने धारा-10 नोटिस जारी किए गए?
कितने मामलों का निस्तारण हो चुका है?
कितनी फाइलें अभी लंबित हैं?
कितने नोटिस वापस लिए गए?
कितनी संपत्तियों पर कार्रवाई हुई?
कितने आवंटियों को नामांतरण और बिक्री की अनुमति मिली?
कितने मामलों में बैंक ऋण प्रभावित हुआ?
क्या छोटे और सुधार योग्य निर्माण के लिए सरल नीति बनाई जा सकती है?
क्या परिवार के भीतर होने वाले नामांतरण को ऐसे मामलों से अलग रखने की व्यवस्था हो सकती है?
इन सवालों के जवाब प्राधिकरण की ओर से आधिकारिक और अद्यतन आंकड़ों के साथ सामने आना जरूरी है।
नई नीति की मांग, समाधान की उम्मीद
आवंटियों की मांग है कि यदि किसी संपत्ति में निर्माण संबंधी कमी है और उसे सुधारा जा सकता है तो पहले उसे ठीक करने का अवसर दिया जाए। जहां नियम अनुमति दें, वहां निर्धारित शुल्क या जुर्माने के जरिए समाधान अथवा नियमितीकरण की व्यवस्था पर भी विचार किया जाए।
दिसंबर 2025 में चेतना मंच ने भी धारा-10 के नोटिसों से जुड़ी शिकायतों को प्रमुखता से उठाया था। उस समय सेक्टर-22 के प्रतिनिधिमंडल ने विधायक पंकज सिंह से मुलाकात कर नई नीति बनने तक नए धारा-10 नोटिसों पर रोक लगाने की मांग की थी।
इससे संकेत मिलता है कि यह मुद्दा लंबे समय से आवंटियों के बीच चिंता का विषय बना हुआ है।
अब सवाल सिर्फ नोटिस का नहीं, निस्तारण की समयसीमा का है
नोएडा तेजी से विकसित हो रहा है। जेवर एयरपोर्ट, फिल्म सिटी, औद्योगिक निवेश और नए आवासीय क्षेत्रों के विस्तार के बीच शहर की प्रशासनिक व्यवस्था से भी पारदर्शिता और समयबद्धता की अपेक्षा बढ़ी है।
ऐसे में धारा-10 का मामला केवल नोटिस पाने वाले आवंटियों की समस्या नहीं रह जाता। यह सवाल बन जाता है कि नागरिकों और प्राधिकरण के बीच संपत्ति संबंधी प्रक्रियाएं कितनी सरल, स्पष्ट और जवाबदेह हैं।
विधायक पंकज सिंह के स्तर से मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचने के बाद अब असली परीक्षा प्राधिकरण की है। आवंटियों को यह जानना है कि वर्षों से लंबित मामलों का समाधान कब होगा और किस नीति के तहत होगा।
अब प्राधिकरण से स्पष्ट रोडमैप की उम्मीद
धारा-10 के मामलों में आगे की राह केवल नोटिस जारी करने या फाइलों को एक विभाग से दूसरे विभाग तक भेजने से नहीं निकलेगी। जरूरत है कि प्राधिकरण कुल मामलों, निस्तारित फाइलों और लंबित मामलों का स्पष्ट आंकड़ा सार्वजनिक करे, साथ ही समाधान की समयसीमा भी तय करे।
पंकज सिंह द्वारा इस मुद्दे को मुख्यमंत्री के सामने उठाए जाने के बाद अब नोएडा के हजारों आवंटियों की निगाहें प्राधिकरण की अगली कार्रवाई पर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—31 हजार संपत्तियों पर जारी धारा-10 के नोटिसों में कितनी फाइलें निस्तारित हुईं और कितने आवंटी आज भी अपनी ही संपत्ति के कागज लेकर प्राधिकरण के चक्कर लगा रहे हैं?















