एक महिला ने अपना पति खो दिया…
दो मासूम बेटियों ने अपने पिता को खो दिया…
एक परिवार ने अपना बेटा खो दिया…
लेकिन इस देश का एक हिस्सा ऐसा भी निकला, जिसने इस दर्द में भी नफरत ढूंढ ली।
सोचिए उस औरत के बारे में…
जो हजारों किलोमीटर दूर एक कार्यक्रम में थी…
लेकिन उसका मन बार-बार अपने बीमार पति के पास लौट रहा था…
जो रात भर फोन पर उनकी तबीयत पूछती रही…
जिसे अचानक खबर मिली कि अब वो आवाज कभी वापस नहीं आएगी…
फिर शुरू हुआ एक लंबा सफर…
असम से दिल्ली… दिल्ली से लखनऊ…
और उस पूरे रास्ते में शायद उसकी आंखों के सामने सिर्फ दो चेहरे रहे होंगे —
अपनी बेटियों का चेहरा…
और उस इंसान का चेहरा, जिसके साथ उसने 14 साल बिताए थे।
लेकिन सोशल मीडिया पर बैठे कुछ पत्थरदिल लोगों ने उस दर्द को भी नहीं छोड़ा।
किसी ने उसे “डायन” कहा…
किसी ने मौत को “साजिश” बता दिया…
किसी ने उसकी राजनीति, उसके रिश्ते, उसके निजी जीवन तक को नंगा करके तमाशा बना दिया।
क्या इतनी सस्ती हो गई है हमारी इंसानियत?
हाँ, रिश्तों में दूरियाँ होती हैं…
पति-पत्नी में मतभेद होते हैं…
राजनीति लोगों को अलग रास्तों पर ले जाती है…
लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि किसी महिला के दुख को भी शक और नफरत के तराजू में तौला जाए?
प्रतीक यादव लंबे समय से एक गंभीर बीमारी — Pulmonary Embolism — से जूझ रहे थे।
इलाज चल रहा था…
पूजा-पाठ हो रहे थे…
हवन हो रहे थे…
दुआएँ मांगी जा रही थीं…
लेकिन शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था।
और आज, जब एक पत्नी अपने जीवन का सबसे बड़ा दुख झेल रही है…
जब दो बेटियाँ अपने पिता की तस्वीर देखकर रो रही होंगी…
तब हम में से कुछ लोग मोबाइल स्क्रीन पर बैठकर फैसले सुना रहे हैं।
याद रखिए…
हर वायरल पोस्ट सच नहीं होती।
हर चुप्पी अपराध नहीं होती।
और हर टूटा रिश्ता नफरत का कारण नहीं होता।
आज अगर आपके भीतर इंसानियत जिंदा है…
तो किसी के दुख को राजनीति का अखाड़ा मत बनाइए।
क्योंकि मौत पर भी जो लोग नफरत बोते हैं, वो सिर्फ किसी व्यक्ति को नहीं… समाज की संवेदनाओं को मारते हैं।














