राजनीति के अखाड़े में अरविंद केजरीवाल को उस शख्स ने गहरी चोट दी, जिसे वह खुद अपनी संगठनात्मक ताकत का ‘चाणक्य’ मानते थे। राघव चड्ढा पर कार्रवाई के बाद पार्टी में संभावित टूट को लेकर जब मंथन चल रहा था, तब केजरीवाल ने अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों मनीष सिसोदिया और संजय सिंह से पूछा था कि पार्टी की कमजोर कड़ी कौन साबित हो सकती है या कौन पाला बदल सकता है।
आम आदमी पार्टी के भीतर मची इस हलचल ने न सिर्फ आम लोगों को चौंकाया, बल्कि खुद केजरीवाल भी हैरान रह गए। वजह यह थी कि जिस नेता पर सबसे ज्यादा भरोसा किया जा रहा था, वही आखिरकार पूरे खेल का सबसे अहम किरदार निकलकर सामने आया। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के भीतर पहले ही स्वाति मालीवाल और राघव चड्ढा को लेकर असंतोष के संकेत मिल चुके थे। हरभजन सिंह को लेकर भी पार्टी नेतृत्व सतर्क था, इसलिए आलाकमान इन नामों को लेकर पहले से सावधानी बरत रहा था।
बताया जा रहा है कि राघव चड्ढा पर कार्रवाई के बाद जब संभावित खतरे को लेकर चर्चा हुई, तो केजरीवाल ने सिसोदिया और संजय सिंह से साफ पूछा कि कौन-कौन पार्टी छोड़ सकता है। इसी दौरान यह भरोसा दिलाया गया कि कम से कम चार सांसद ऐसे हैं जो किसी भी स्थिति में पार्टी का साथ नहीं छोड़ेंगे। इनमें संजय सिंह, एन.डी. गुप्ता, संदीप पाठक और एक और नाम शामिल बताया गया। उस वक्त केजरीवाल को लगा कि पार्टी की स्थिति नियंत्रण में है।
लेकिन घटनाक्रम ने अचानक करवट ले ली। राज्यसभा में AAP के 10 सांसदों में से पहले से ही राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल बगावती रुख अपना चुके थे। बाकी सांसदों को लेकर यह माना जा रहा था कि यदि उनमें से कुछ और लोग भी राघव चड्ढा के साथ जाते, तब भी पार्टी को बड़ा नुकसान नहीं होता, क्योंकि दो-तिहाई संख्या के लिए सात सांसदों का टूटना जरूरी था। यदि संख्या उससे कम रहती, तो संसदीय सदस्यता पर तत्काल संकट नहीं बनता।
यहीं से पूरा खेल बदला। 24 अप्रैल को वह दिन आया जब अरविंद केजरीवाल के लिए सबसे बड़ा झटका तैयार था। इसी दिन सामने आया कि जिन संदीप पाठक को वह अपने संगठन की रीढ़ मानते थे, वही राघव चड्ढा के साथ खड़े नजर आए। यही वह पल था जब केजरीवाल को अहसास हुआ कि पार्टी के भीतर जिस ‘सातवें सांसद’ को लेकर उन्हें भरोसा था, वही सबसे अहम मोड़ पर दूसरा रास्ता अपना चुका था।
सूत्रों के मुताबिक, संदीप पाठक और राघव चड्ढा के बीच लगातार संपर्क बना हुआ था। एक तरफ केजरीवाल संदीप पाठक पर पूरी तरह भरोसा कर चुके थे, दूसरी तरफ पाठक उनसे मिलकर यह जानकारी लेते रहते थे कि पार्टी की आगे की रणनीति क्या होगी और राघव चड्ढा के खिलाफ क्या कदम उठाए जाएंगे। आरोप है कि केजरीवाल जो भी रणनीतिक बातें साझा करते, वे आगे राघव चड्ढा तक पहुंचाई जा रही थीं। यह सिलसिला बगावत से ठीक एक दिन पहले तक चलता रहा।
सूत्रों के अनुसार, 24 अप्रैल को दोपहर लगभग 1:30 बजे केजरीवाल को बगावत की खबर मिली। तब तक वह समझ चुके थे कि पार्टी का एक और सांसद उनके हाथ से निकल चुका है। उन्होंने सबसे पहले मनीष सिसोदिया को फोन किया, जो उस समय गुजरात में थे। केजरीवाल ने कहा कि सात सांसद अलग हो रहे हैं। जब सिसोदिया ने पूछा कि सातवां कौन है, तो जवाब आया—संदीप पाठक। यह सुनकर दोनों कुछ देर तक चुप रहे और प्रेस कॉन्फ्रेंस का इंतजार करने लगे।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में जैसे ही राघव चड्ढा ने बीजेपी में विलय की घोषणा की, मनीष सिसोदिया ने गुजरात से ही पार्टी के कोर व्हाट्सएप ग्रुप में संदेश भेजा: “मुबारक हो, ये लोग बीजेपी में जा रहे हैं।” पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अगर ये सांसद अलग-अलग दल या गुट बनाते, तो स्थिति पार्टी के लिए और मुश्किल होती। बीजेपी में विलय की स्थिति में उनकी सांसदी पर सवाल उठना तय था, क्योंकि नियमों के मुताबिक इस तरह की प्रक्रिया को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा 2 अप्रैल से लिखनी शुरू हो गई थी, जब राघव चड्ढा को राज्यसभा उपनेता पद से हटाकर अशोक मित्तल को यह जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद माना जा रहा है कि राघव चड्ढा ने दूसरे सांसदों को अपने साथ जोड़ने की कोशिशें शुरू कर दीं। पहले से बगावती रुख अपनाए स्वाति मालीवाल को इस खेमे में शामिल करना अपेक्षाकृत आसान बताया गया, क्योंकि वह पहले से ही बीजेपी के संपर्क में थीं।
अशोक मित्तल को लेकर भी लगातार कोशिशें होती रहीं, लेकिन शुरुआती दौर में वे इस गुट में शामिल होने को तैयार नहीं थे। 14 अप्रैल को घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया, जब अशोक मित्तल के ठिकानों पर ईडी की रेड हुई। इसके बाद उद्योगपति सांसदों विक्रम साहनी और राजेंद्र गुप्ता पर भी दबाव बढ़ने की बात कही जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक, 22 अप्रैल को एक साथ कई सांसदों से संपर्क साधकर उन्हें बीजेपी में शामिल कराने की कोशिशें तेज कर दी गईं। मुंबई में हरभजन सिंह के घर बीजेपी नेता विनोद तावड़े को भेजा गया और कहा गया कि यदि वह नहीं माने, तो उनके बीसीसीआई से जुड़े करारों पर असर पड़ सकता है। इसी तरह, अमेरिका में इलाज करा रहे राजेंद्र गुप्ता से भी कुछ ओवरसीज बीजेपी पदाधिकारियों की मुलाकात कराई गई और यह संदेश दिया गया कि दबाव बढ़ सकता है।
इसी दिन विक्रम साहनी ने 95 लोधी एस्टेट में केजरीवाल से मुलाकात की। सूत्रों का दावा है कि वह केजरीवाल को गुमराह कर रहे थे और साथ ही दूसरी तरफ अपनी भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने ही केजरीवाल को जानकारी दी कि अशोक मित्तल, राजेंद्र गुप्ता और हरभजन सिंह ने अलग गुट के समर्थन वाली चिट्ठी पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके अगले दिन, 23 अप्रैल को संदीप पाठक फिर से केजरीवाल से मिले और दोनों के बीच करीब डेढ़ घंटे तक बातचीत हुई। आरोप है कि केजरीवाल ने विक्रम साहनी से मिली जानकारी भी पाठक से साझा कर दी।
इसके बाद संदीप पाठक ने ही अशोक मित्तल को केजरीवाल के आवास पर बुलवाया। इस दौरान अशोक मित्तल की तरफ से केजरीवाल को यह भरोसा दिया गया कि उन पर दबाव जरूर है, लेकिन वे पार्टी के साथ बने रहेंगे। केजरीवाल को तब तक इस बात का अंदाजा नहीं था कि संदीप पाठक खुद उस प्लान का हिस्सा हैं, जिसने पूरी पटकथा बदल दी।
आखिर तक केजरीवाल को भरोसे में रखा गया। यहां तक कि 24 अप्रैल की शाम 7 बजे विक्रम साहनी की केजरीवाल से मीटिंग तय थी। लेकिन उससे पहले ही सुबह 11 बजे सभी बागी सांसदों ने राज्यसभा के सभापति को चिट्ठी सौंप दी, जिसमें आम आदमी पार्टी से अलग होकर बीजेपी में विलय की बात कही गई।














